स्ट्राबेरी के हब बनेंगे औरंगाबाद के कई गांव : डॉ सहाय

Published at :14 Apr 2016 8:34 AM (IST)
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स्ट्राबेरी के हब बनेंगे औरंगाबाद के कई गांव : डॉ सहाय

कृषि वैज्ञानिकों की टीम ने अंबा के चिल्हकी बिगहा पहुंच कर स्ट्राबेरी की खेती का लिया जायजा अंबा (औरंगाबाद) : अंबा के पास चिल्हकी बिगहा गांव में नयी तकनीक से खेती आज जिले का चर्चा का केंद्र बन गयी है. गांव के किसान नये तरीके से नयी खेती के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. इस […]

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कृषि वैज्ञानिकों की टीम ने अंबा के चिल्हकी बिगहा पहुंच कर स्ट्राबेरी की खेती का लिया जायजा
अंबा (औरंगाबाद) : अंबा के पास चिल्हकी बिगहा गांव में नयी तकनीक से खेती आज जिले का चर्चा का केंद्र बन गयी है. गांव के किसान नये तरीके से नयी खेती के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. इस गांव ने स्ट्राबेरी की खेती से कृषि विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. मंगलवार को कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर से डाॅ संजय सहाय, स्ट्राबेरी विषेशज्ञ डाॅ रूबी रानी, सब्जी व फूल विभाग के डाॅ रणधीर, कृषि विज्ञान केंद्र सिरिस के समन्वयक डाॅ नित्यानंद, बीएओ यदुनंदन प्रसाद यादव, कोऑर्डिनेटर मोहन कुमार, मनीष कुमार व हरिनाथ सिंह आदि ने उक्त गांव का दौरा किया. सभी पदाधिकारियों ने गांव पहुंच कर किसान बृज किशोर मेहता तथा रघुपत मेहता द्वारा की गयी स्ट्राबेरी की खेती का मुआयना किया.
कृषि विशेषज्ञों की टीम ने किसानों से कहा कि स्ट्राबेरी की खेती देख कर प्रसन्न हैं. अब आवश्यकता है कि औरंगाबाद जिले को स्ट्राबेरी की खेती के हब के रूप में विकसित करने की. स्ट्राबेरी विशेषज्ञ डाॅ रूबी रानी ने कहा कि राज्य में इतने बड़े पैमाने पर उक्त फसल की खेती करना जज्बे का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि आनेवाले वर्षों में जिले के अन्य स्थानों पर भी स्ट्राबेरी की खेती से किसान को जोड़ने की कोशिश करेंगे. जिले में स्ट्राबेरी की अधिक उपज के लिए इसे हब के रूप में विकसित किया जायेगा. स्ट्राबेरी की खेती को हरियाणा के हिसार से बिहार के औरंगाबाद लानेवाले पहले किसान बृजकिशोर ने बताया कि इस बार वे लगभग एक बीघे में इसकी खेती की थी. इससे सात लाख 50 हजार रुपये की आमदनी हुई है.
दूसरे किसान रघुपत मेहता ने तीन बीघे जमीन में खेती कर 21 लाख रुपये की स्ट्राबेरी बेचने की बात स्वीकार की. कृषि विशेषज्ञों की टीम ने कहा कि माइक्रो स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई से पौधे का सही विकास होता है. इसके बाद कृषि वैज्ञानिकों ने बृजकिशोर के स्क्रीन नेट के अंदर लगी खीरे की फसल को देखा. खीरे के पौधे में कीड़े का प्रकोप देख उन्होंने बताया कि इसका कारण है स्क्रीन नेट पॉली हाउस को बंद रखना. उन्होंने कहा कि सुबह में मित्र कीट पौधे पर पहुंच कर परागन कराते हैं.
उन्होंने किसान से दरवाजा खोल कर रखने को कहा. उन्होंने कहा कि शाम में पौधे को नुकसान पहुंचाने वाले कीट अंदर प्रवेश कर पौधे के परागन को प्रभावित करते हैं. इसलिए, शाम को दरवाजा बंद कर दें. कीट से प्रभावित पौधे पर सलफेक्स का छिड़काव करने को कहा. साथ ही बताया गया कि फिमेल व मेल पौधे में परागन के बाद ही फल लगता है.
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