देवकुंड धाम में हजार वर्ष से प्रज्वलित है अग्नि

देवकुंड धाम में हजार वर्ष से प्रज्वलित है अग्नि देवकुंड (औरंगाबाद)जिस तरह खूबसूरत मोरनी अपने पैरों को देख कर मायूस हो जाती है, ठीक उसी प्रकार मैं अभी दुखी हूं, क्या वे अद्भूत पल थे, जब त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने कर्मनाशा नदी पार करके देवकुंड आये थे. यहां 108 देवताओं द्वारा स्थापित […]
देवकुंड धाम में हजार वर्ष से प्रज्वलित है अग्नि देवकुंड (औरंगाबाद)जिस तरह खूबसूरत मोरनी अपने पैरों को देख कर मायूस हो जाती है, ठीक उसी प्रकार मैं अभी दुखी हूं, क्या वे अद्भूत पल थे, जब त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने कर्मनाशा नदी पार करके देवकुंड आये थे. यहां 108 देवताओं द्वारा स्थापित सहस्त्रो धारा तालाब में स्नान कर उन्होंने च्यवन ऋषि का दर्शन किया था. उसके बाद अपने हाथों से बाबा दुधेश्वरनाथ के शिवलिंग की स्थापना की थी. उस समय वहां घनघोर जंगल था, जिसका कुछ अंश आज भी देखने को मिलता है. रास्ते दुर्गम थे, लेकिन यह स्थान सुंदरता से परिपूर्ण था. सुंदरता ऐसी की देखते ही समझ में आ जाता है कि यह कितना वीरान है. यहां की गौरव गाथा सुनने के बाद ही पता चलता है कि देवकुंड धाम कितना महत्वपूर्ण है. पदम पुराण पताल भृगु संहिता के रचनाकार भृगु व च्यवन ऋषि द्वारा पांच हजार वर्ष पहले स्थापित बताया है. हजारों वर्ष से प्राकृतिक आपदा सहन करते हुए आज भी कुंड से अग्नि प्रज्वलित हो रही है. सुकन्या ने की छठ पर्व की शुरुआत पुरानी कथाओं व आनंद रामायण के अनुसार च्यवन ऋषि तपस्या में लीन थे, उसी समय वन में विचरण कर रही सर्याति राजा की पुत्री सुकन्या वहां पहुंची. देखा कि तपस्या में लीन ऋषि के शरीर में दीमक लग गये है. साथ में मिट्टी दब गये है. शरीर मिट्टी में इतना दबा हुआ था कि केवल उनकी आंख ही चमक रहा था. सुकन्या ने चमकीले पदार्थ समझ कर जैसे ही उसमें तृण से दबाया वैसे ही लहू निकलने लगा. उसी समय आकाशवाणी हुई कि पुत्री ये च्यवन ऋषि तपस्या में लीन है. तुम्हारे द्वारा तृण से दबाने पर उनका आंख फूट गया है. यह सुन कर सुकन्या ने भूल का प्रायश्चित करने के लिए च्यवन ऋषि को पत्नी के रूप में सेवा करने लगी व मन्नत मांगी की अगर इनका शरीर कंचन हो जायेगा तो मैं इसी तालाब में स्नान कर छठ पर्व करूंगी ,फिर क्या था सुकन्या की सेवा से ऋषि का शरीर कंचन हो गया व आंखों में रोशन आ गयी. उसी दिन सुकन्या ने सहस्त्रों धारा कुंड में स्नान कर उसी तालाब में भगवान भास्कर को अर्घ दान दिया. तब से छठ पर्व की शुरुआत हुई.
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