काले पत्थरों से तराशा देव सूर्य मंदिर बिखरे रहा मनोरमा छटा

Published at :15 Nov 2015 6:59 PM (IST)
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काले पत्थरों से तराशा देव सूर्य मंदिर बिखरे रहा मनोरमा छटा

काले पत्थरों से तराशा देव सूर्य मंदिर बिखरे रहा मनोरमा छटाबिहार सहित पूरे देश में प्रसिद्धिदेव छठ मेला से संबंधित खबर औरंगाबाददेव का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर अपनी परंपरागत कहानी के दर्पण में अब भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले था. काले पत्थरों को तराश कर बनाया गया यह मंदिर अपनी मनोरमा छटा के लिए […]

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काले पत्थरों से तराशा देव सूर्य मंदिर बिखरे रहा मनोरमा छटाबिहार सहित पूरे देश में प्रसिद्धिदेव छठ मेला से संबंधित खबर औरंगाबाददेव का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर अपनी परंपरागत कहानी के दर्पण में अब भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले था. काले पत्थरों को तराश कर बनाया गया यह मंदिर अपनी मनोरमा छटा के लिए आज भी बिहार सहित पूरे देश में प्रसिद्ध है. वैसे भी देश में सूर्य मंदिरों का श्रृंखलाबद्ध इतिहास रहा है. ओडिशा के कोणार्क, काशी का लोलार्क, अयोध्या का दर्शनाक व देव का यह सूर्य मंदिर देवार्क इसी परंपरा की एक कड़ी है. औरंगाबाद जिला मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर दक्षिण-पूरब में स्थित देव का यह सूर्य मंदिर लगभग एक सौ फुट ऊंचा है. इसकी कालात्मक इतनी मनोरम व आकर्षक है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती. कहते हैं कि किसी फूल की महक उसकी संस्कृति होती है, जिसे देखा नहीं जा सकता सिर्फ महसूस किया जा सकता है. संस्कृति और सभ्यता ये दोनों ही एक-दूसरे से रिश्तों में इस तरह गूंथे होते हैं कि इन्हें अलग-अलग पहचानना मुश्किल होता है. छठ के मौके पर यहां कुछ वैसा ही समां बांधता है. संस्कृति का प्रतीक यहां स्थित सूर्यकुंड को गवाह बनाकर लोग जब छठ मइया और सूर्यदेव की आराधना इस मंदिर में करते हैं तो लगता है कि सभ्यता कुछ नया करने को आतुर है. कतारबद्ध लाखों अनुशासित आस्थावान लोगों का हुजूम दृढ़संकल्प के साथ धैर्यवान बना उसकी आराधना के क्षण संस्कृति सभ्यता के गूंथे रिश्तों को ही अभिव्यक्ति देने लगते हैं. सूर्य मंदिर का द्वार पूरब के बजाय पश्चिमाभिमुख : यहां कार्तिक व चैत मास में लगनेवाले मेले में कोई जाति, उपजाति, धर्म, मजहब व शास्त्रीय कर्मकांड का बंधन नहीं रहता है. सभी अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा-अर्चना में मशगूल रहते हैं. किसी का किसी से द्वेष नहीं, बल्कि सामर्थ्य भर सभी एक-दूसरे को मदद करने को आतुर दिखते हैं. इतिहास के पत्रों पर नजर डालने पर ज्ञात होता है कि यहां आदि काल में अनार्य (असुर) सम्राट वृणपर्वा की राजधानी थी, जहां दैत्य राजा के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी ने क्षत्रिय कुमार ययाति को वरण किया और वृणपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा दहेज में दी गयी. देवयानी के नाम पर ही इस स्थान का नाम देव पड़ा. यहां कोढ़ ठीक होने के कारण प्रयाग के राजा ऐल ने तालाब व मंदिर बनवाया. बाद में उमगा के चंद्रवंशी राजा भैरवेंद्र ने देवकुंड व उमगा में विशाल मंदिर बनवाया. देश में स्थित सूर्य मंदिरों का द्वार पूरब दिशा में ही होता है, पर देव के सूर्य मंदिर का द्वार पूरब के बजाय पश्चिमाभिमुख है. इस संबंध में बताया जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब अपने शासन काल में अनेक मूर्तियां व मंदिरों को ध्वस्त करता हुआ देव पहुंचा. मंदिर तोड़ने की योजना बना ही रहा था कि वहां भीड़ एकत्रित हो गयी. लोगों ने ऐसा करने से मना किया, किंतु वह इससे सहमत नहीं हुआ और लोगों की बातों पर जोर-जोर से हंसने लगा. वह धर्म को चुनौती देते हुए कहा कि अगर तुम्हारे देवताओं में इतनी ही शक्ति है तो मंदिर का प्रवेश द्वार पूरब से पश्चिम हो जाये तो मैं इसे छोड़ दूंगा. अन्यथा कल मैं इसे ध्वस्त कर दूंगा. लेकिन भगवान की महिमा को लोगों को मानना पड़ा. दूसरे दिन पूरब का द्वार पश्चिमाभिमुख हो गया. तबसे यह प्रवेश द्वार उसी रूप में विद्यमान है. सूर्यकुंड तालाब में स्नान करने से कुष्ठ रोग से मिलती है मुक्ति : औरंगाबाद जिला के विशाल आंगन में अपनी साहित्य, संगीत व कला की किलकारियों से समृद्ध भगवान सूर्य की स्थली देव अपने हृदय में संजोयी हुई ऐतिहासिक संपदाओं व समृद्ध लोक संस्कृति के कारण पर्यटकों को सदैव ही आकर्षित करती रही है. देव में स्थित त्रेतायुगीन विशाल सूर्य मंदिर इस जिले के लिए धार्मिक आस्था व विश्वास का केंद्र है. इसके दर्शन व पवित्र सूर्यकुंड तालाब में स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है. ऐेसी मान्यता है. भगवान सूर्य की स्थली देव प्राचिनता व पवित्रता की धरोहर है. देव से संबंधित चर्चा अनेक धार्मिक ग्रंथों व पुराणों में भी मिली है. अनेक महत्वपूर्ण श्रेष्ठ व कल्याणकारी परम पवित्र ऐतिहासिक साक्ष्य दबे छिपे पड़े हैं. जिसकी कोई गिनती नहीं है. सचमुच में देव से संबंधित उन सभी धार्मिक दृष्टि से पवित्र स्थलों को साक्ष्यपूर्वक उजागर कर दिया जाये तो आज देव सूर्य नगरी काशी, मथुरा व अयोध्या से तनिक भी कम न रहे. इस स्थल से संबंधित प्राचीन कथा अनेक ग्रंथों व जन श्रुतियों के अनुसार इस प्रकार है. छठ गीतों से झलकते हैं लोक संस्कृति के रंगदेव के सुप्रसिद्ध मेले में आस्था के साथ-साथ गाये जाने वाले गीतों में लोक संस्कृति के रंग भी अनायास ही इतनी सहजता से घुल-मिल गये हैं कि इनसे मगध की सुदीर्घ सांस्कृतिक विरासत की भव्यतापूर्ण अभिव्यक्ति हो जाती है. छठ पूजा के विभिन्न चरणों को जिस सहजता से गीतों में पिरोया गया है वह तमाम भाषा शास्त्रीयप्रवीणताओं को भी चकित कर देता है. तमाम धार्मिक आडंबरों से परे इस लोक पर्व में मगही के साथ-साथ अन्य भाषाओं को जिस सरलता से इन गीतों में आत्मसात किया गया है व चौका देता है. छठ पूजा की तैयारी में रत किसी महिला की आस्था व समर्पण भाव को जिस खूबसूरत अंदाज में इस गीत में उतारा गया है वह अद्वितीय है.”अंगना में पोखरा खनाइब, छठी मइया अयतन आज”अंचरा से अंगना बहारब, छठी मइया अयतन आज”इसी प्रकार सूर्य के उदय होने की व्याकुलता को जिन चंद शबें में अभिव्यक्ति दी गयी है वह बरबस आकर्षित कर लेती है.”हाली हाली उग हो सुरूज देव, भइले अरग के बेर””मालिनी बेटी फूल ले के खाड़ हे, उग हो सुरूज देव अरग के बेर”भगवान सूर्य के उद्याम सौंदर्य पर न जाने कितने कवियों ने समस्त प्रतिभा उड़ेल दी पर छठ गीतों में जो सौंदर्य बोध है उसकी सहज संप्रेषणीयता व बिंब सिर्फ उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं में ही पाये जा सकते हैं. ”कंधे जनेउआ ए आदित्यमल, सोहे तिलक लिलार”सोने के खड़उआ ए आदित्यमल, तोहे अरग दियाए”लोक संस्कृति की सुरभी समेटे इस महापर्व में छठ व्रतियों की आरजू व मन्नते भी बेहद सीधी-सादी है, जिन्हें बेहद सरल व सहज रूप में गीतों की शक्ल में पिरोया गया है, जिसकी सादगी अनुपम है. ” घोड़वा चढ़न के बेटा मांगीला, पढ़ल पंडितवा दमाद”रूनकी-झुनकी बेटी मांगीला, घरवा में अन्न धन भंडारअपना ला मांगीला अटल सिंघोरवा, जनम जनम अहिवात छठी मइया”यहां तक कि छठ पूजा के विभिन्न चरणों तक को गीतों में सुंदरता से पिरोया गया है. जैसे पूजा सामग्री से लदी बहंगी के घाट तक पहुंचाए जाने की प्रक्रिया ने भी छठ गीतों में अपने सुर व लय तालाश लिये हैं.” कांचे ही बांस के बहंगिया, बहंगी सुरूज देव के जाए”कांचे ही बांसके बहंगिया, बहंगी लचकत जाए””छठी माई के करब हम पूजनिया,गंगा घाटे सिरनाय”देहब हम आदित के अरगीया, आदितमल होईह सहाय” ” उगी-उगी दीनानाथ पूरब के ओरिया हो, करि जानी देर भइले अरग के बेरिया हे, उगी-उगी….”छोटी-मुटी सुनर बिटियवा के सुनर दिह वर, राम जइसन दिह दुल्हवा लक्ष्मण जइसन देवर”

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