आस्था का अटूट केंद्र है अररिया का ऐतिहासिक शंकरपुर शिव मंदिर: कुदाल लगने से निकला था खून, सावन और शिवरात्रि में उमड़ती है भारी भीड़
Published by : Divyanshu Prashant Updated At : 22 May 2026 7:35 AM
शंकरपुर शिव मंदिर
अररिया जिले के फारबिसगंज प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत सैफगंज पंचायत का शंकरपुर गांव आज अपनी अनूठी धार्मिक पहचान के लिए पूरे सीमांचल में विख्यात है. यहां स्थित ऐतिहासिक और प्राचीन शंकरपुर शिव मंदिर न केवल स्थानीय ग्रामीणों, बल्कि आसपास के कई जिलों के शिव भक्तों के लिए अगाध आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है. मान्यता है कि इस दरबार में जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से माथा टेकता है, भोलेनाथ उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं.
मंदिर का गौरवशाली इतिहास: जब शेर से लड़ते हुए शहीद हुए थे साहसी बद्री मंडल
शंकरपुर शिव मंदिर की स्थापना और इसके प्राकट्य की कहानी बेहद चमत्कारी और रोंगटे खड़े कर देने वाली है. स्थानीय बुजुर्ग ग्रामीण गोपाल मंडल ने अपने पूर्वजों के हवाले से बताया कि सैकड़ों वर्ष पहले इस पूरे क्षेत्र में घना और डरावना जंगल हुआ करता था. एक बार इस जंगल में एक आदमखोर शेर आ धमका, जिससे पूरे इलाके में दहशत फैल गई. डर के मारे कोई भी ग्रामीण शेर का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. ऐसे विकट समय में गांव के ही एक परम पराक्रमी और साहसी व्यक्ति बद्री मंडल ने हिम्मत दिखाई. वे अपने आधा दर्जन वफादार पालतू शिकारी कुत्तों को साथ लेकर शेर को खदेड़ने के लिए घने जंगल के भीतर प्रवेश कर गए. जंगल में पहुंचते ही खूंखार शेर ने बद्री मंडल पर सीधा जानलेवा हमला बोल दिया. अपने मालिक को संकट में देख वफादार कुत्तों ने भी शेर पर चौतरफा धावा बोल दिया. अंत में, साहसी बद्री मंडल और शेर के बीच घंटो आमने-सामने की खूनी जंग हुई, जिसमें लड़ते-लड़ते दोनों की मौके पर ही मौत हो गई.
जंगल की कटाई के दौरान शिवलिंग पर लगी कुदाल, बहने लगा था खून
इस हृदयविदारक घटना के बाद जब गांव के लोगों की भारी भीड़ जंगल में जुटी, तो उस खूंखार शेर के आतंक को हमेशा के लिए समाप्त करने के उद्देश्य से जंगल की कटाई शुरू की गई. झाड़ियों को साफ करने और खुदाई करने के दौरान एक मजदूर की कुदाल जमीन के अंदर दबे एक काले पत्थर से जोर से टकराई. कुदाल टकराते ही उस पत्थर से अचानक इंसानी खून की तरह लाल रक्त की धारा बहने लगी. यह अलौकिक दृश्य देखकर खुदाई कर रहे लोगों में हड़कंप मच गया और वे डर के मारे पीछे हट गए. बाद में जब वहां के प्रबुद्ध नागरिकों की मौजूदगी में उस स्थान की बेहद सावधानी से पवित्र खुदाई की गई, तो भूमि के गर्भ से एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक शिवलिंग प्रकट हुआ. इस चमत्कार के बाद ग्रामीणों ने इसे साक्षात महादेव का रूप मानकर वहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना और जलाभिषेक का सिलसिला शुरू कर दिया, जो आज तक अनवरत जारी है.
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त्रिशूल का दाग देकर बछड़ों को मुक्त करने की है अनूठी परंपरा
शंकरपुर महादेव मंदिर की एक और अद्भुत और अनोखी विशेषता यह है कि यहां हर वर्ष दर्जनों की संख्या में बछड़ों (सांड) को भगवान शिव के त्रिशूल का पवित्र दाग देकर पूरी तरह स्वतंत्र (मुक्त) कर दिया जाता है. इन बैलों या सांडों को समाज में ‘महादेव का सांड’ माना जाता है और कोई भी व्यक्ति इन्हें कभी प्रताड़ित नहीं करता है. क्षेत्र के किसानों और पशुपालकों का दृढ़ विश्वास है कि भगवान भोलेनाथ हर विकट परिस्थिति में उनकी और उनके जान-माल की रक्षा करते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि चाहे भीषण बाढ़ की विभीषिका हो, सूखाड़ की मार हो या फिर कोरोना जैसी जानलेवा वैश्विक महामारी, शंकरपुर के बाबा भोलेनाथ ने हमेशा ढाल बनकर पूरे इलाके की रक्षा की है.
समय के साथ बदला स्वरूप, भव्यता देख झूम उठते हैं भक्त
प्रारंभिक दौर में इस पवित्र शिवलिंग की पूजा-अर्चना फूस और खपरैल के एक बेहद छोटे से घर में शुरू हुई थी. इसके बाद ग्रामीणों के सहयोग से एक छोटा सा मंदिर ढांचा तैयार किया गया. लेकिन समय के साथ भक्तों की बढ़ती भीड़ और स्थानीय जनप्रतिनिधियों व दानदाताओं के सामूहिक प्रयास से आज इस मंदिर ने एक बेहद भव्य और आकर्षक स्वरूप अख्तियार कर लिया है. हाल के दिनों में मंदिर परिसर की सुरक्षा और सुंदरीकरण को ध्यान में रखते हुए इसके चारों तरफ एक मजबूत चहारदीवारी (बाउंड्री वॉल) का निर्माण भी कराया जा चुका है. महाशिवरात्रि और पवित्र सावन मास के प्रारंभ होते ही यहां रोजाना सैकड़ों और सोमवार को हजारों की संख्या में श्रद्धालु पवित्र गंगाजल लेकर जलाभिषेक करने पहुंचते हैं. इस दौरान यहां लगने वाले पारंपरिक मेले की भव्यता देखते ही बनती है.
परवाहा (अररिया) से रवीन्द्र कुमार यादव की रिपोर्ट:
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