जरा याद इन्हें भी कर लो... जिन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष में दिया अमूल्य योगदान

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गणतंत्र दिवस: 25 में से 23 स्वतंत्रता सेनानियों की हो चुकी है मौत, दो की जुबां पर अब भी याद है आजादी का संघर्ष अररिया : भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे अररिया जिले में आजादी के संघर्ष का इतिहास सुनहरा रहा है. सन 1857 की पहली जंग-ए-आजादी से लेकर 1942 की अगस्त क्रांति तक अररिया […]

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गणतंत्र दिवस:

25 में से 23 स्वतंत्रता सेनानियों की हो चुकी है मौत, दो की जुबां पर अब भी याद है आजादी का संघर्ष
अररिया : भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे अररिया जिले में आजादी के संघर्ष का इतिहास सुनहरा रहा है. सन 1857 की पहली जंग-ए-आजादी से लेकर 1942 की अगस्त क्रांति तक अररिया के सपूतों ने हर मौके पर अपनी शहादत दी और देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने में उल्लेखनीय योगदान दिया. सन 1947 में मिली स्वतंत्रता के बाद सन 1950 में 26 जनवरी को देश में नया संविधान लागू हुआ. जिलावासी इस बार देश का 69वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में हैं.
इतिहास के अनुसार सन 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल बजा तो जलपाइगुड़ी व ढाका में तैनात भारतीय जवानों ने अररिया जिले के नाथपुर में अंग्रेजों को धूल चटाते हुए नेपाल के चतरागद्दी में कोसी पार किया. इसके बाद तराई के जंगल मार्ग से अवध की बेगम हजरत महल का साथ देने के लिए आगे बढ़ गये. हालांकि इस दौरान कोसी की तेज धारा में उन्हें अपने कई घोड़े व सामान गंवाने पड़े. लेकिन इस पार खड़ा मेजर रिचर्डसन उनका बाल भी बांका नहीं कर पाया. अगस्त क्रांति के मौके पर अररिया के सेनानियों ने अंग्रेजी बंदूकों का डटकर सामना किया. द्विजदेनी जी गिरफ्तार हो गये.
भागलपुर सेंट्रल जेल में पुलिस ने उन्हें इतना पीटा गया कि वे शहीद हो गये. 20 सितंबर 1942 को फारबिसगंज में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जुलूस निकल रहा था. पुलिस ने जुलूस पर गोली चला दी. बताया जाता है कि इस गोलीबारी में सुंदरलाल ततमा मौके पर ही शहीद हो गये. रानीगंज थाना पर स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा तिरंगा फहराने की कोशिश में काली दास व जगतू हाजरा ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, लेकिन सेनानियों के हौसले पस्त नहीं हुए. जिले में सेनानियों की फौज जोर-शोर से उभरी.
पूर्व के वरिष्ठ सेनानी पंडित रामाधार द्विवेदी, कन्हैया लाल वर्मा, कमलानंद विश्वास, धनुषधारी चौधरी, हरिलाल झा, नागेश्वर झा, बुद्धिनाथ ठाकुर, सूर्यानंद साह, फणीश्वर नाथ रेणु, बोधनारायण सिंह, गणेश लाल वर्मा, कलानंद सिंह, भृगुनाथ शर्मा, रामानंद सिंह आदि ने आजादी का संघर्ष जारी रखा.
सहते रहे अंग्रेजों का जुल्म, लेकिन देश को स्वाधीनता दिलाने तक नहीं रोका अपना कदम
आजादी दिलाने के बाद गणतंत्र भारत के अररिया में बचे तीन स्वतंत्रता सेनानियों में से एक रानीगंज प्रखंड के बरबन्ना गांव दीवान टोला के स्वतंत्रता सेनानी कलानंद सिंह की कुछ दिनों पूर्व ही मृत्यु हो गयी. उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध छेड़े जंग का खामियाजा भी भुगता, लेकिन अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके. वे पूर्णिया व भागलपुर जेल में तीन वर्षों से अधिक दिनों का समय काटा. बाद में कर्पूरी ठाकुर के सानिध्य में आजादी की लड़ाई जारी रखी. बचे दो स्वतंत्रता सेनानियों की जुबां पर आज भी आजादी के संघर्ष की गाथा मुजबानी याद है. आज की भावी पीढ़ी को वे इन अमर गाथाओं को ऊर्जा से लबरेज होकर सुनाते हैं. उनमें से एक इंडो- नेपाल सीमा के जोगबनी के पास बसे भृगुनाथ शर्मा जो सारण जिले के पिवौरी गांव के मूल निवासी हैं. वे वशिष्ठ नारायण शर्मा के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध रणनीति तैयार करने में जुट गये. जेल से निकलने के बाद वे अररिया में भी अंग्रेजों के विरुद्ध जंग छेड़ दी. इनके बाद फारबिसगंज के स्वतंत्रता सेनानी रामानंद सिंह ने भी देश की आजादी के लिए संघर्ष करते हुए अंग्रेजों के जुल्म का शिकार होते रहे, लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. आखिरकार देश छोड़कर अंग्रेजों को जाना ही पड़ा. आज इन वीर सपूतों की ही देन है कि हम गणतंत्र दिवस की 69वीं वर्षगांठ मना रहे हैं.
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