उठने लगी है पनार नदी को डॉल्फिन अभयारण्य घोषित करने की मांग

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गंगा के बाद सबसे अधिक डॉल्फिन पनार में पायी जाती है. बीबीसी भी कर चुकी है पनार के डॉल्फिन पर विशेष स्टोरी. डॉल्फिन अभयारण्य घोषित करने की मांग उठ रही है. अररिया : जिले से होकर बहने वाली सबसे प्रमुख नदी पनार की एक बड़ी विशेषता है कि ये नदी दशकों से जलीय प्राणी डॉल्फिन […]

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गंगा के बाद सबसे अधिक डॉल्फिन पनार में पायी जाती है. बीबीसी भी कर चुकी है पनार के डॉल्फिन पर विशेष स्टोरी. डॉल्फिन अभयारण्य घोषित करने की मांग उठ रही है.

अररिया : जिले से होकर बहने वाली सबसे प्रमुख नदी पनार की एक बड़ी विशेषता है कि ये नदी दशकों से जलीय प्राणी डॉल्फिन का स्थायी पनाहगाह बना हुआ है. पर्यावरणविदों की मानें तो पनार नदी को अगर डॉलफिन अभयारण्य घोषित कर दिया जाये तो ये नदी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन सकती है. पनार नदी में पहली बार वर्ष 1992 में डॉल्फिन देखा गया था. पनार नदी में डॉल्फिन देखे जाने की चर्चा यहां तक पहुंची कि बीबीसी ने इस पर एक विशेष स्टोरी की.
कब देखा गया पहला डॉल्फिन
जिले की पनार नदी में मौजूद डॉल्फिन के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पर्यावरणविद सूदन सहाय कहते हैं कि वर्ष 1992 पहली बार डॉल्फिन देखा गया था. अजीबो गरीब जलीय प्राणी को पटेगना पलासी के दोमहना घाट पर लोग देख कर हैरत में पड़ गये थे. ग्रामीणों भीड़ ने उसे राकस यानी राक्षस का नाम देते हुए मार डाला था. पर सूचना मिलने पर वे तत्कालीन वन पदाधिकारी व सिल्क बोर्ड के अधिकारी एसएस राणा जब वहां पहुंचे तब डॉल्फिन की पहचान हुई. श्री राणा ने डॉल्फिन पर ही पीएचडी की थी.
पलायन कर नहीं आये हैं डॉल्फिन
पनार नदी में रहने वाले डॉल्फिन की विशेषता ये है कि ये गांगेय प्रजाति के डॉल्फिन तो हैं, पर कहीं से संयोगवश पलायन कर नहीं आये हैं. पनार के ही मूल जलीय प्राणी हैं. श्री सहाय कहते हैं कि देश के डॉल्फिन मैन कहे जाने वाले व वर्तमान में नालंदा ओपन विश्वविद्यालय के उप कुलपति डा आरके सिन्हा इसकी पुष्टि कर चुके हैं. बताया गया कि डा सिन्हा ने जिले में पनार नदी में मौजूद डॉल्फिन को खुद अपनी नजरों से देखा था.
भारत नामा में बीबीसी ने किया था प्रसारण : जिले के पनार नदी में डॉल्फिन की मौजूदगी ने देश ही नहीं विदेश के डॉल्फिन विशेषज्ञों व मीडिया का ध्यान खींचा था. श्री सहाय कहते हैं कि जब नीदरलैंड में अररिया के डॉल्फिन पर उनका शोध पत्र पढ़ा तो बीबीसी ने भी इसे महत्व दिया. वरिष्ठ मीडिया कर्मी मधुकर उपाध्याय के नेतृत्व में बीबीसी की टीम ने अररिया पहुंच कर पनार के डॉल्फिन पर विशेष स्टोरी की. इसका प्रसारण बीबीसी ने भारत नामा कार्यक्रम के तहत किया था.
तीन दर्जन से अधिक डॉल्फिन
राज्य वाइल्ड लाइफ बोर्ड के पूर्व सदस्य सूदन सहाय कहते हैं कि वे अपने स्तर से पनार में डॉल्फिन की सर्वे का काम पिछले कई दशकों से कर रहे हैं. 2015 में कराये गये अंतिम सर्वे के मुताबिक पनार नदी में जोगबनी के मटियारी से लेकर पूर्णिया के अमौर तक लगभग 39 डॉल्फिन अब भी जीवित हैं, जबकि विभिन्न कारणों से सात मर चुके हैं.
डॉल्फिन 2009 में घोषित हुआ राष्ट्रीय जलीय प्राणी
राज्य वाइल्ड लाइफ बोर्ड के पूर्व सदस्य सूदन सहाय कहते हैं कि सरकार ने डॉल्फिल को वर्ष 2009 में राष्ट्रीय जलीय प्राणी घोषित किया. इस मामले में जिला स्तर से भी सरकार से काफी बार पत्राचार किया गया था.
पनार को डॉल्फिन अभयारण्य घोषित करना जरूरी
डॉल्फिन संरक्षण के लिए पनार नदी को डॉल्फिन अभयारण्य घोषित करना जरूरी है. पर बार-बार मांग व पत्राचार के बाद भी ऐसा नहीं किया जा रहा है. श्री सहाय कहते हैं कि वन व पर्यावरण विभाग द्वारा डॉल्फिन का सर्वे भी कराया जाना चाहिए. फंड उपलब्ध है, पर ऐसा हो नहीं रहा है.
राष्ट्रीय डॉल्फिन रिसर्च सेंटर का मामला लटकाया जाना दुखद
पटना में राष्ट्रीय डॉल्फिन रिसर्च सेंटर की स्थापना का मामला लटकाया जाना दुखद है. सरकार ने बड़ी राशि का आवंटन भी कर दिया है, पर पटना विश्वविद्यालय जमीन नहीं उपलब्ध करा रहा है. हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर करने की तैयारी है. वैसे जिले वासियों में डॉल्फिन संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ी है. यही वजह है कि 1992 के बाद किसी डॉल्फिन को लोगों ने नहीं मारा है. मछुआरों व स्कूली बच्चों के साथ नियमित रूप से जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन करते हैं.
सूदन सहाय, राज्य वाइल्ड लाइफ बोर्ड के पूर्व सदस्य
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