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सुप्रीम कोर्ट ने ठाकुर को बीसीसीआई अध्यक्ष और शिर्के को सचिव पद से हटाया

Updated at : 02 Jan 2017 11:53 AM (IST)
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सुप्रीम कोर्ट ने ठाकुर को बीसीसीआई अध्यक्ष और शिर्के को सचिव पद से हटाया

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने आज लोढ़ा समिति की सिफारिशों को ना मानने के कारण बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को उनके पद से हटा दिया है. कोर्ट ने कहा अध्यक्ष का काम बीसीसीआई का सबसे वरिष्ठ उपाध्यक्ष और सचिव का काम संयुक्त सचिव संभालेगा. लोढ़ा पैनल की सिफारिशों को मानने […]

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नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने आज लोढ़ा समिति की सिफारिशों को ना मानने के कारण बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को उनके पद से हटा दिया है. कोर्ट ने कहा अध्यक्ष का काम बीसीसीआई का सबसे वरिष्ठ उपाध्यक्ष और सचिव का काम संयुक्त सचिव संभालेगा. लोढ़ा पैनल की सिफारिशों को मानने से इनकार करने वाले बीसीसीआई और राज्य संघों के सभी पदाधिकारियों को अपना पद छोड़ना होगा. बीसीसीआई के सभी पदाधिकारियों और राज्य संघों को लोढ़ा समिति की सिफारिशों का पालन करने के लिए शपथपत्र देना होगा. इस मामले में अगली सुनवाई 19 जनवरी को होगी.कोर्ट के निर्णय के बाद जस्टिस लोढ़ा ने कहा कि यह एक तार्किक निर्णय है. उन्होंने कहा कि जब एक बार सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति की सिफारिशों को मान लिया था, तो उसके बाद इसकी सिफारिशों को ना मानना गलत था. उन्होंने निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह क्रिकेट की जीत है.

बीसीसीआई के विद्रोही तेवरों के प्रति कडा रवैया अपनाते हुए उच्चतम न्यायालय ने आज उसके अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को उनके पदों से हटा दिया और कहा कि उन्हें तुरंत प्रभाव से बोर्ड का कामकाज करना बंद कर देना चाहिए. शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही ठाकुर के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरु करने का भी फैसला किया. उनसे जवाब मांगा गया कि बीसीसीआई में सुधार लागू करने के अदालत के निर्देशों के क्रियान्वयन में बाधा पहुंचाने के लिए आखिर क्यों न उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि बीसीसीआई के कामकाज को प्रशासकों की एक समिति देखेगी और उसने वरिष्ठ अधिवक्ता फाली एस नरिमन और इस मामले में न्यायमित्र के रुप में सहायता कर रहे गोपाल सुब्रहमण्यम से प्रशासकों की समिति में ईमानदार व्यक्तियों को सदस्यों के रुप में नामित करने में अदालत की मदद करने का आग्रह किया.

इस पीठ में न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और डी वाई चंद्रचूड भी शामिल थे. पीठ ने कहा कि नरिमन और सुब्रहमण्यम दो सप्ताह में अपना काम पूरा करेंगे तथा प्रशासकों की समिति में व्यक्तियों के नामांकन के लिए निर्देश जारी करने संबंधी मसला अदालत 19 जनवरी को लाया जाएगा. यह भी स्पष्ट किया गया कि नये प्रशासक के बीसीसीआई का कामकाज संभालने तक अध्यक्ष का कामकाज बोर्ड का सबसे वरिष्ठ उपाध्यक्ष और सचिव का काम वर्तमान संयुक्त सचिव संभालेगा. शीर्ष अदालत ने कहा कि बीसीसीआई और राज्य संघों के सभी पदाधिकारियों को शपथपत्र देना होगा कि वे शीर्ष अदालत के निर्देशों का पालन करेंगे जिसने भारत के पूर्व मुख्य न्यायधीश आर एम लोढ़ा की अगुवाई वाले पैनल की सिफारिशों को स्वीकार किया है. इसके साथ ही आगाह किया गया है कि बीसीसीआई या राज्य संघों के जो पदाधिकारी शीर्ष अदालत द्वारा स्वीकार की गयी लोढा पैनल की शर्तों को मानने में नाकाम रहेंगे उन्हें अपना पद छोडना होगा.

यह भी स्पष्ट किया गया कि लोढा पैनल की सिफारिशों के अनुसार 70 साल से अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति, मानसिक तौर पर असंतुलित कोई व्यक्ति, मंत्री, सरकारी कर्मचारी, दोषी ठहराया जा चुका कोई व्यक्ति , नौ साल की संचित अवधि तक पद पर रह चुका व्यक्ति या फिर किसी अन्य खेल संघ से जुडा कोई व्यक्ति क्रिकेट संस्था का पदाधिकारी बनने के योग्य नहीं होगा.

उच्चतम न्यायालय ने 15 दिसंबर 2016 को ठाकुर के खिलाफ अवमानना और झूठी गवाही के मामले में कार्रवाई की धमकी दी थी. ठाकुर ने आईसीसी सीईओ से पत्र की मांग की थी लेकिन बाद में इससे इनकार कर दिया था. न्यायालय ने कहा था कि दोषी पाये जाने पर वह जेल भी जा सकते हैं.

अदालत ने बीसीसीआई प्रमुख को याद दिलाया कि ठाकुर ने बतौर बोर्ड अध्यक्ष आईसीसी सीईओ से यह पत्र मांगा था कि क्रिकेट संगठन में कैग के मनोनीत सदस्य की नियुक्ति स्वायत्ता से समझौता होगी और यह सरकारी हस्तक्षेप के जैसा होगा.

प्रधान न्यायाधीश की पीठ ने अदालत को गुमराह करने का प्रयास करने के लिए बीसीसीआई की खिंचाई की और ठाकुर को चेताया कि अगर शीर्ष अदालत झूठी गवाही की कार्यवाही के संबंध में अपना आदेश सुनाती है तो उन्हें जेल जाना पड़ सकता है.

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