Paramahansa Yogananda Jayanti 2026: “यदि मैं आपसे नहीं मिलता हूं, तो याद रखें कि मैं किसी अन्य स्थान पर आपके लिए कार्य कर रहा हूं. मेरा हर समय आपसे मिलना आवश्यक रूप से आपके लिए सहायक नहीं होगा. आपको गहन और नियमित ध्यान करने से अधिक लाभ प्राप्त होगा. मैं यहां केवल इस जन्म में ही नहीं अपितु इस जीवन के परे भी आपकी सहायता करने के लिए आया हूं.”— श्री श्री परमहंस योगानन्द
गुरु-शिष्य संबंध: देह से परे आत्मिक बंधन
आज, श्री श्री परमहंस योगानन्दजी के आविर्भाव दिवस पर उनके ये शब्द हमें यह आश्वासन प्रदान करते हैं कि गुरु और शिष्य के बीच सच्चा सम्बन्ध गहन ध्यान, विश्वास और दैवीय कृपा से निरन्तर बना रहता है, जो शारीरिक उपस्थिति और यहाँ तक कि इस पार्थिव जीवन से भी परे है.
एक दिव्य आत्मा का जन्म और आध्यात्मिक वातावरण
योगानन्दजी का जन्म 5 जनवरी, 1893 को भारत में गोरखपुर में हुआ था. उनके माता-पिता, भगवती चरण घोष और ज्ञान प्रभा घोष, आध्यात्मिक रूप से समर्पित थे. योगानन्दजी बचपन से ही प्रार्थना और ध्यान में रूचि रखते थे, और उन्हें गहन आन्तरिक अवस्थाओं का अनुभव होता था, जिनमें दिव्य प्रकाश के दर्शन भी सम्मिलित थे. बाद में उन्होंने अपनी पुस्तक योगी कथामृत में अपने अनुभवों के उन क्षणों का वर्णन किया है, जिनके कारण उनके मन में प्रत्येक अन्य वस्तु की तुलना में सर्वोपरि ईश्वर की खोज करने का स्थायी दृढ़संकल्प उत्पन्न हुआ.
हिमालय की ओर आकर्षण और साधक की तपस्या
जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, उनकी यह लालसा ईश्वर को प्राप्त करने की एक गहन खोज में परिवर्तित होती गई. इस विश्वास के साथ कि महान् सन्त हिमालय में निवास करते हैं और उनके आध्यात्मिक साक्षात्कार में उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं, मुकुन्द ने अपनी किशोरावस्था में ही अनेक बार हिमालय की यात्रा करने का दृढ़ संकल्प किया और असफल प्रयास भी किये. यद्यपि बाह्य रूप से ये यात्राएं सफल नहीं हुईं, उन्होंने उनके विश्वास और संकल्प को दृढ़ किया.
गुरु श्रीयुक्तेश्वर से मिलन: जीवन का निर्णायक क्षण
सन् 1910 में, सत्रह वर्ष की आयु में, उनकी प्रार्थना साकार हुई जब वे ईश्वर द्वारा नियुक्त अपने गुरुदेव स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी से मिले. उनके कठोर परन्तु प्रेमपूर्ण मार्गदर्शन में, मुकुन्द ने अनेक वर्षों तक कठिन आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्राप्त किया. आज्ञापालन, ध्यान और समर्पण के माध्यम से, उन्हें उनके जीवन के लक्ष्य के लिए तैयार किया गया. बाद में, उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और परमहंस योगानन्द नाम अपनाया, जो ईश्वर के साथ एकत्व से प्राप्त होने वाले सर्वोच्च आनन्द को दर्शाता है.
संन्यास और ‘परमहंस योगानन्द’ नाम का अर्थ
योगानन्दजी ने हमें यह शिक्षा प्रदान की है कि मनुष्य के सभी प्रयास यथार्थ में ईश्वर की खोज ही हैं. उन्होंने कहा है कि, “मानव जाति ‘कुछ और’ की निरन्तर खोज में व्यस्त है, जिससे उसे आशा है कि सम्पूर्ण एवं असीम सुख मिल जाएगा. उन विशिष्ट आत्माओं के लिए जिन्होंने ईश्वर की खोज की और उन्हें प्राप्त कर लिया है, यह खोज समाप्त हो चुकी है : ईश्वर ही वह ‘कुछ और’ हैं.”
योगदा सत्संग सोसाइटी की स्थापना
सन् 1917 में, उन्होंने वैज्ञानिक ध्यान के अभ्यास और सन्तुलित आध्यात्मिक जीवन जीने की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए राँची में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इण्डिया (वाईएसएस) की स्थापना की. सन् 1920 में, उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा की और लॉस एंजेलिस में सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप (एसआरएफ) की स्थापना की. इन दोनों संस्थाओं के माध्यम से, उन्होंने व्याख्यानों, केन्द्रों और गृह-अध्ययन पाठमाला के द्वारा सम्पूर्ण विश्व में क्रियायोग और ध्यान की शक्तिशाली शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया.
ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव पाने का संदेश
तीस से अधिक वर्षों तक, श्री श्री परमहंस योगानन्द ने पश्चिम में अथक रूप से शिक्षा प्रदान की और ईश्वर के प्रति भक्ति, नियमित ध्यान और सभी सच्चे धर्मों की एकता पर बल दिया. उन्होंने साधकों को केवल ईश्वर में विश्वास करने के स्थान पर ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया.
आविर्भाव दिवस पर दिव्य उपस्थिति का अनुभव
उनके आध्यात्मिक गौरव ग्रन्थ योगी कथामृत ने लाखों हृदयों को स्पर्श किया है और और अभी भी निरन्तर अनेकों आत्माओं को ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग की ओर आकर्षित कर रही है. उनकी दो अन्य प्रमुख रचनाएं, ईश्वर-अर्जुन संवाद—श्रीमद्भगवद्गीता और द सेकंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट, पूर्वी और पश्चिमी आध्यात्मिक परम्पराओं द्वारा साझा किए गए सार्वभौमिक सत्यों को और भी अधिक प्रकट करती हैं. आज, योगानन्दजी के आविर्भाव दिवस के अवसर पर उन सच्चे साधकों को उनकी उपस्थिति का अनुभव होता है जो उनके दिव्य मार्गदर्शन का आह्वान करते हैं. भक्ति, अनुशासन और ईश्वर की कृपा के माध्यम से, वे हमें आश्वासन प्रदान करते हैं कि सच्चे सुख की खोज केवल ईश्वर-प्राप्ति से ही पूर्ण होती है.
लेखिका : रेणु सिंह परमार

