Kalashtami 2026: आज 10 जनवरी 2026 को कालाष्टमी मनाई जा रही है. इस दिन भगवान शिव के उग्र स्वरूप कालभैरव की पूजा की जाती है. इस अवसर पर भक्त विशेष रूप से निशिता काल में साधना, पूजा और मंत्र-जप करते हैं. शास्त्रों में निशिता काल को अत्यंत शक्तिशाली अवधि माना गया है. आइए जानते हैं निशिता काल में पूजा करने के महत्व के बारे में विस्तार से.
निशिता काल क्या है?
निशिता काल वह समय होता है, जो मध्यरात्रि के आसपास आता है. यह काल दिन और रात के संधिकाल के बाद का सबसे उत्तम और पवित्र समय माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार, निशिता काल में दैवी और तांत्रिक ऊर्जा अपने चरम पर होती है.
कालभैरव और निशिता काल का संबंध
शास्त्रों में भगवान कालभैरव को रात्रि के देवता कहा गया है. मान्यता है कि वे निशिता काल में पृथ्वी पर भ्रमण करने आते हैं और अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं. इसी कारण कालाष्टमी की रात, विशेषकर निशिता काल में की गई पूजा से भय और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है. साथ ही शत्रु बाधाएं समाप्त होती हैं, अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं से रक्षा मिलती है तथा जीवन में स्थिरता और आत्मबल बढ़ता है.
तांत्रिक दृष्टि से क्यों है निशिता काल विशेष?
तांत्रिक शास्त्रों में निशिता काल को सिद्धि काल माना गया है. इस समय वातावरण में सत्त्व, रज और तम मतलब ज्ञान, कर्म और अज्ञान तीनों गुणों का संतुलन होता है, जिससे साधना के फल पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. कालाष्टमी की रात यह प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है.
निशिता काल में करें ये उपाय
- कालाष्टमी के दिन कालभैरव मंत्र “ॐ कालभैरवाय नमः” का 108 बार जाप करना चाहिए. इससे भगवान कालभैरव प्रसन्न होते हैं.
- इस दिन पूजा करते समय सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए.
- कालाष्टमी पर दान का विशेष महत्व है. इस दिन जरूरतमंदों को काले तिल और उड़द का दान करना चाहिए.
- कुत्ते को कालभैरव की सवारी माना जाता है. ऐसे में इस दिन कुत्तों को भोजन कराना अत्यंत फलदायक होता है. माना जाता है कि ऐसा करने से भगवान कालभैरव का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
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