शिव का वास्तविक अर्थ क्या है? जानिए गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर से

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गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर के अनुसार शिव का अर्थ और महत्व

Gurudev Sri Sri Ravi Shankar: गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर के अनुसार शिव कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि सत्य, चेतना और आनंद का अनुभव हैं, जिन्हें ध्यान, तड़प और विश्राम से महसूस किया जा सकता है।

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आज का समय उपलब्धियों और डिग्रियों से भरा हुआ है. हर चीज को योग्यता से आंका जाता है, यहां तक कि आध्यात्मिकता को भी. बहुत लोग मानते हैं कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए कठिन तपस्या, गहरी विद्वत्ता या संत जैसा जीवन जरूरी है. लेकिन सच्चाई इससे अलग है. हर व्यक्ति की क्षमता अलग होती है—कोई गड़रिया है, कोई विद्वान, कोई साधक। फिर भी दिव्यता का अनुभव सभी कर सकते हैं.

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ईश्वर के निकट होने की एक सरल पहचान है—जब आप दिल से प्रसन्न होते हैं या गहरे दुःख में भी भीतर कोई जुड़ाव महसूस करते हैं, तब आप ईश्वर के करीब होते हैं. हम दुनिया को अच्छे-बुरे, उजाले-अंधेरे में बांटते हैं, पर यह विभाजन केवल हमारी सोच है. वास्तव में सब कुछ उसी एक अनंत सत्ता का हिस्सा है.

शिव: जो दिखे और जो न दिखे

शिव इसी सत्य का प्रतीक हैं. वे व्यक्तिगत भी हैं और सर्वव्यापक भी. जो दिखाई देता है, वह भी शिव है और जो नहीं दिखाई देता, वह भी. रात इसका सुंदर उदाहरण है. अंधेरे में ही आकाश की अनंतता और तारों की विराटता दिखाई देती है.

रात हमें शांत करती है, थामती है और विश्राम देती है. ध्यान और समाधि भी ऐसे ही हैं. जब मन भीतर उतरता है, तब गहरा सुकून मिलता है. यही शिवरात्रि का भाव है—भीतर जाग्रत रहना और स्वयं में विश्राम करना.

इच्छा नहीं, तड़प से मिलते हैं ईश्वर

ईश्वर की प्राप्ति समय या योग्यता से नहीं, बल्कि तड़प की तीव्रता से होती है. कहा जाता है कि फूल तोड़ने में समय लग सकता है, पर ईश्वर से मिलने में नहीं. जब व्यक्ति समझ लेता है कि उसे कुछ नहीं चाहिए, तभी भीतर अपनापन पैदा होता है. यही अपनापन तड़प को जन्म देता है.

इच्छा दिमाग की बेचैनी है, जबकि तड़प दिल की पुकार है. जब यह पुकार सच्ची होती है, तब दूरी मिट जाती है.

सच्ची भक्ति: सबमें एक ही चेतना देखना

जो पूरे ब्रह्मांड से प्रेम करता है, वही सच्चा भक्त है. किसी को बुरा कहना आसान है, पर सच्चाई यह है कि बुरे लोग नहीं होते. लोग अज्ञान, पीड़ा या भीतर की चोट के कारण गलत कार्य करते हैं.

जहां मन में लालसा और द्वेष हो, वहां गहरा विश्राम संभव नहीं. और जहां विश्राम नहीं, वहां ध्यान नहीं. इसलिए शांति पाने के लिए पहले मन को हल्का करना जरूरी है.

अंगुलिमाल की कथा: परिवर्तन संभव है

बुद्ध के शिष्य अंगुलिमाल की कथा इसका प्रमाण है. जिसने सैकड़ों हत्याएं कीं, वही ध्यान और करुणा से बदल गया. उसके भीतर की शांति ने उसके आसपास के लोगों को भी प्रभावित किया.

शांति बाहर से नहीं लाई जाती, वह भीतर से फैलती है. एक शांत व्यक्ति अपने आसपास भी शांति का वातावरण बना देता है.

‘ॐ नमः शिवाय’: भीतर की जागृति

सिर्फ एक मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ मन को हल्का कर सकता है. डर कम होता है, थकान मिटती है और भीतर आनंद शेष रह जाता है. शिव सत्य हैं, चेतना हैं और आनंद हैं.

ईश्वर को प्रसन्न या अप्रसन्न करने की चिंता छोड़ दें. ईश्वर कोई बाहर बैठी सत्ता नहीं, वही हमारे भीतर और चारों ओर है. जब हम छोड़ना सीखते हैं, तब पाते हैं. जब मन विश्राम में जाता है, तब शिव प्रकट होते हैं.

और तब समझ आता है—जिसे हम खोज रहे थे, वह हमेशा से हमारे भीतर ही था.

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