गरुड़ पुराण: मृत्यु के समय मुंह में क्यों डाला जाता है तुलसी और गंगाजल? जानें रहस्य 

Edited by Neha Kumari
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गरुड़ पुराण की सांकेतिक तस्वीर (एआई)

Garud Puran: मृत्यु के अंतिम क्षणों में आखिर व्यक्ति के मुख में तुलसी और गंगाजल क्यों डाला जाता है? क्या इसके पीछे केवल एक परंपरा है या कोई गहरा धार्मिक रहस्य छिपा है? आइए, इस लेख के माध्यम से इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानते हैं.

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Garud Puran: शास्त्रों में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है, जिनमें अंतिम अर्थात 16वां संस्कार अंत्येष्टि संस्कार कहलाता है. हिंदू धर्म में व्यक्ति की मृत्यु से पहले और मृत्यु के बाद कई परंपराएं निभाई जाती हैं. इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण परंपरा है मृत्यु के अंतिम क्षणों में व्यक्ति के मुख में गंगाजल की बूंदें डालना और तुलसी का पत्ता रखना. हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथ गरुड़ पुराण में इस अनुष्ठान के पीछे के गहरे आध्यात्मिक, धार्मिक और व्यावहारिक महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है. आइए जानते हैं कि आखिर क्यों जीवन की अंतिम सांस के समय मुख में तुलसी और गंगाजल डालना अत्यंत शुभ और आवश्यक माना गया है.

यमदूतों के भय से मुक्ति

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के समय जब जीवात्मा शरीर त्यागने वाली होती है, तब उसे अपने कर्मों के अनुसार यमराज के दूत (यमदूत) दिखाई देने लगते हैं, जिससे वह भयभीत हो जाती है.

तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इसलिए इसे ‘हरिप्रिया’ भी कहा जाता है. ग्रंथ के अनुसार, जिस व्यक्ति की मृत्यु के समय उसके मुख, सिर या छाती पर तुलसी का पत्ता रखा होता है, उसके समीप यमदूत नहीं आ सकते. ऐसे व्यक्ति के पास भगवान विष्णु के दूत (विष्णुदूत) आते हैं और उसकी आत्मा को सम्मानपूर्वक भगवान के परमधाम अर्थात वैकुंठ ले जाते हैं.

पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति

सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल एक नदी नहीं, बल्कि साक्षात पतित-पावनी मां गंगा माना गया है. शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि गंगाजल भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न हुआ और भगवान शिव की जटाओं से होकर पृथ्वी पर अवतरित हुआ. गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि मृत्यु के समय किसी व्यक्ति के कंठ से गंगाजल नीचे उतर जाता है, तो उसके जीवनभर के कायिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हो जाते हैं. यह पवित्र जल आत्मा को सांसारिक मोह-माया के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करता है. मान्यता है कि इससे जीव को यमलोक की कठोर यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता.

इस पावन परंपरा के महत्व को दर्शाते हुए शास्त्रों में एक प्रसिद्ध श्लोक भी वर्णित है:

तुलसीदलयुक्तं जलं यो पिबेत् मरणे काले.
स गच्छति परं धाम यत्र न म्रियते पुनः..

अर्थ: जो व्यक्ति मृत्यु के समय तुलसी युक्त जल का सेवन करता है, वह परम धाम (वैकुंठ) को प्राप्त करता है, जहां पहुंचने के बाद उसे जन्म और मृत्यु के चक्र में दोबारा नहीं आना पड़ता

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नेहा कुमारी प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. वे धर्म, ज्योतिष, राशिफल, व्रत-त्योहार, पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन करती हैं. उनकी विशेष रुचि धार्मिक परंपराओं, ज्योतिषीय विश्लेषण और दैनिक राशिफल को सरल, सटीक और पाठक-हितैषी भाषा में प्रस्तुत करने में है. नेहा का उद्देश्य पाठकों तक विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुंचाना है, ताकि वे धर्म, संस्कृति और ज्योतिष से जुड़े विषयों को आसानी से समझ सकें. उनकी लेखन शैली शोध-आधारित, सरल और स्पष्ट है, जो जटिल विषयों को भी सहज और रोचक बना देती है. वे राशिफल, ग्रह-गोचर, व्रत-त्योहार, धार्मिक मान्यताओं, वास्तु, पौराणिक प्रसंगों और भारतीय रीति-रिवाजों से संबंधित विषयों पर नियमित रूप से लेख लिखती हैं. डिजिटल पत्रकारिता में उनकी रुचि पाठकों की जरूरतों को समझते हुए जानकारीपूर्ण, SEO-अनुकूल और प्रभावी कंटेंट तैयार करने में है.

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