आध्यात्मिक नियम

Published at :08 Feb 2017 1:17 AM (IST)
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आध्यात्मिक नियम

आध्यात्मिक अनुभव की कुछ झलक मिलते ही आप अपनी साधना बंद न करें. जब तक आप परम ब्रह्म में स्थित नहीं हो जाते, अपना अभ्यास जारी रखें. यदि आप अभ्यास बंद करके संसार में विचरण करेंगे, तो पतन की पूरी संभावना रहेगी. मात्र एक झलक से आप पूर्णत: सुरक्षित नहीं रह सकते. आप नाम और […]

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आध्यात्मिक अनुभव की कुछ झलक मिलते ही आप अपनी साधना बंद न करें. जब तक आप परम ब्रह्म में स्थित नहीं हो जाते, अपना अभ्यास जारी रखें. यदि आप अभ्यास बंद करके संसार में विचरण करेंगे, तो पतन की पूरी संभावना रहेगी. मात्र एक झलक से आप पूर्णत: सुरक्षित नहीं रह सकते. आप नाम और यश से उन्मत्त न हों.
आप पत्नी, बच्चे, माता-पिता, घर, मित्र एवं संबंधियों का परित्याग कर सकते हैं, किंतु प्रतिष्ठा और प्रसिद्धी का त्याग करना अत्यधिक कठिन है. मैं आपको यह गंभीर चेतावनी देता हूं. सांसारिक आदमी के लिए संसार अति महत्वपूर्ण है, किंतु एक ब्रह्मज्ञानी के लिए यह तिनके के समान है. तुच्छ सांसारिक चीजों पर ध्यान न दें, अपने अभ्यास में नियमित रहें.
पूर्ण ब्राह्मी चेतना में निरंतर स्थिति प्राप्त होने तक अविराम साधना करते रहें. प्रत्येक प्रलोभन का निवारण, बुरे विचार का निरोध, इच्छा का शमन कीजिये. प्रत्येक उत्कृष्ट आकांक्षा को प्रोत्साहन दीजिये एवं उदात्त विचारों का पोषण कीजिये. आपके द्वारा की गयी साधना का प्रत्येक अंश निश्चित रूप से आपकी अदृश्य चेतना में अंकित होता है. कोई भी साधना व्यर्थ नहीं जाती. इसका प्रत्येक अंश आपके विकास में सहायक होता है. यह निश्चित नियम है. नकारात्मक विचारों को अपने मन में न आने दें. शांतिपूर्वक, नियमित रूप से अपनी साधना करते रहें. आध्यात्मिक अभ्यास के बिना आपका एक दिन भी न बीते.
कभी-कभी साधक अटक जाता है. वह अपने मार्ग पर आगे नहीं बढ़ पाता है. वह अपने रास्ते से भटक कर किसी अन्य दिशा में जाने लगता है. उसका लक्ष्य दृष्टि से ओझल हो जाता है. यदा-कदा वह प्रलोभनों एवं विरोधी तत्वों का शिकार होता है. कभी-कभी उसे गलत संतुष्टि का अनुभव होता है. वह सोचता है कि उसे अपना लक्ष्य मिल गया है, अत: वह सभी साधनाएं रोक देता है. यदा-कदा वह लापरवाह, आलसी और अकर्मण्य हो जाता है.
वह कोई भी अभ्यास नहीं कर सकता. इसलिए सतत् सतर्क बने रहें. आध्यात्मिक मार्ग बाधाओं से भरा हुआ है. एक बाधा पर विजय प्राप्त करते ही दूसरी प्रकट हो जाती है. आध्यात्मिक मार्ग पर अपार धैर्य, अध्यवसाय, सावधानी एवं निर्भयता की नितांत आवश्यकता है.
– स्वामी शिवानंद सरस्वती
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