मानवमात्र का अस्तित्व

Published at :19 Jan 2017 6:10 AM (IST)
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मानवमात्र का अस्तित्व

इतने सारे लोग हैं दुनिया में, जब वे दुनिया से चले जायेंगे, तो लोग उन्हें पहचानेंगे कैसे? क्या उसने अपनी कोई पहचान बनायी? वह तो जीवनभर दिग्भ्रमित होता रहा और ऐसे ही एक दिन उसकी सांसे बंद हो गयीं. आप शून्य से आये थे और शून्य में ही चले गये. न तो आपके किसी कार्य […]

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इतने सारे लोग हैं दुनिया में, जब वे दुनिया से चले जायेंगे, तो लोग उन्हें पहचानेंगे कैसे? क्या उसने अपनी कोई पहचान बनायी? वह तो जीवनभर दिग्भ्रमित होता रहा और ऐसे ही एक दिन उसकी सांसे बंद हो गयीं. आप शून्य से आये थे और शून्य में ही चले गये. न तो आपके किसी कार्य की चर्चा हो रही है और न ही कोई आपको स्वीकृति दे रहा है. ऐसी परिस्थिति में आपके जीवन का क्या होगा? आप चाहते हैं कि जीवन में एक स्टेपनी बन कर रहें या आप समाज की मुख्यधारा में रह कर समाज और अपना नेतृत्व करें. आपको बहुत कुछ देना है, लेकिन आपके पास रहेगा तभी तो दे सकेंगे. हम लोग तो हमेशा इसी चिंता में पड़े रहते हैं कि हम सुखी कैसे रहें? हमारे पास धन कैसे हो? जो जितना सक्षम होगा, उसका अस्तित्व उतने ही लंबे समय के लिए कायम रहेगा. मृत्यु के पश्चात दुनिया उन्हें ही याद करती है, जिन्होंने समाज को कुछ दिया. जिन्होंने लोकहित के लिए कुछ त्याग किया.

हममें से ज्यादातर लोग चल तो रहे हैं, लेकिन किस दिशा में यह उन्हें खुद पता नहीं. ठीक वैसे ही जैसे किसी ने भीड़ के एक व्यक्ति से पूछा कि किधर जा रहे हो, तो उसने कहा कि जिधर नेताजी जा रहे हैं. उसी व्यक्ति ने भीड़ के अंतिम व्यक्ति से सवाल किया कि भाई आप कहां जा रहे हैं, तो उसने कहा कि जिधर भीड़ जा रही है. हममें से ज्यादातर लोगों की स्थिति आज यही है. हम कर्म अच्छे करते नहीं और अच्छे फल की आकांक्षा रखते हैं. हम भूल जाते हैं कि परमात्मा के दरबार में अच्छे और बुरे कर्मो का लेखा-जोखा मौजूद है. सही मायने में स्वर्ग और नर्क कहीं और नहीं, बल्कि इसी दुनिया में यहीं हैं.

जो लोग सिर्फ स्वयं की जेब भरने में लगे रहते हैं, उन्हें यह बात समझ लेनी चाहिए कि उनका अस्तित्व आज इसलिए कायम है, क्योंकि उन्होंने पहले कुछ अच्छा किया होता है. गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे अर्जुन! तुम्हें कर्म करने का अधिकार है. तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है कर्म करना. प्रतिक्षण कर्मशील बने रहो. इस सिद्धांत को हमेशा याद रखें कि ‘विस्तार ऋजुता का होता है, वक्रता का नहीं.’ जब तक तुम्हारे पास वक्रता रहेगी, तुम टेढ़े रहोगे, तब तक तुम्हारा विस्तार हो ही नहीं सकता है. अस्तित्व उसी का रहता है, जो स्वयं फिट है.

आचार्य सुदर्शन

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