ब्रह्मांड और प्रकृति
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :10 Jan 2017 6:40 AM (IST)
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इस पूरे ब्रह्मांड को हमारे संत महात्मा रहस्यमय ब्रह्मांड कहते हैं; क्योंकि जिस प्रकार यह विश्व ब्रह्मांड चल रहा है, वह स्वयं में एक रहस्य है, एक महाआश्चर्य है. अनादि काल से यह जगत गतिमान है. इसे न कोई चलानेवाला दिखता है और न कोई ऐसी व्यवस्था दिखती है, जिस व्यवस्था से अंतरिक्ष के सारे […]
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इस पूरे ब्रह्मांड को हमारे संत महात्मा रहस्यमय ब्रह्मांड कहते हैं; क्योंकि जिस प्रकार यह विश्व ब्रह्मांड चल रहा है, वह स्वयं में एक रहस्य है, एक महाआश्चर्य है. अनादि काल से यह जगत गतिमान है. इसे न कोई चलानेवाला दिखता है और न कोई ऐसी व्यवस्था दिखती है, जिस व्यवस्था से अंतरिक्ष के सारे ग्रह, नक्षत्र, तारे एक ही गति से चलते चल रहे हैं.
इस रहस्य को विज्ञान समझने का प्रयास अवश्य कर रहा है, लेकिन अभी तक कोई भी परिणाम हाथ नहीं आ सका है. इसका मूल कारण यह है कि विज्ञान केवल पदार्थ की गति और भाषा समझता है, पदार्थ के अतिरिक्त विज्ञान कुछ भी पकड़ नहीं पाता. स्पष्ट है कि इस जगत को चलानेवाली कोई ऐसी शक्ति है, जो अनुभवगम्य नहीं है. हमारे शास्त्रों में अणु और विभु दो बड़े ही महत्वपूर्ण शब्द आये हैं. अणु का अर्थ है- पदार्थ और विभु का अर्थ है- अपदार्थ यानी पदार्थ के अतिरिक्त और सभी कुछ. विभु भाव-रूप है, इसलिए यह दिव्य है.
इसे कोई पकड़ नहीं सकता, छू नहीं सकता. कोई अनुभव कर सकता है, जो लोग इस विभु का अनुभव कर लेते हैं, वे आसानी से इस निसर्ग-प्रकृति को समझने लगते हैं. प्रकृति का अर्थ है, प्र-कृति. जो कृति पहले से है, जो अस्तित्व है. इस अस्तित्व का कभी लोप नहीं होता. उसी अस्तित्व से यह प्रकृति अथवा जीव-जगत चलता रहता है. नक्षत्र, ग्रह और तारों में जो गति है, वह इसी अस्तित्व के कारण है. अस्तित्व ही प्राण है, शक्ति तेज है, जिसकी चुंबकीय शक्ति से यह पूरा ब्रह्मांड अनंतकाल से समान दूरी पर नाचते हुए गतिमान हो रहा है. वह एक ही शक्ति है, जो विभिन्न रूपों में दृश्यमान हो रही है. ब्रह्मांड के मूल में एक ही तेज है, जो विभिन्न आकार-प्रकार में प्रकट होता है और फिर विलीन हो जाता है.
यह सत्य है कि हमारी आंखों में उतनी शक्ति नहीं है, कि हम उन परिवर्तनों को देख सकें. इसलिए प्रकृति के बदलते हुए स्वरूप को हम नया मानने लगते हैं. जिस प्रकार कलाकार मिट्टी से खिलौना बनाता है, हाथी-घोड़ा आदि बनाता है. हाथी और घोड़ा बन कर तैयार भी हो जाता है और हम उसे सही भी मान लेते हैं, लेकिन जब उस मिट्टी के घोड़े को तोड़ा जाता है, तो वह फिर मिट्टी बन जाता है, इस जगत की सभी प्रक्रिया उसी प्रकार चल रही है.
आचार्य सुदर्शन
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