भीतर का परमानंद

Published at :06 Jan 2017 6:20 AM (IST)
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भीतर का परमानंद

हम जिस किसी भी परिस्थिति में हो, हमें उसके अनुरूप सफलतापूर्वक उस भूमिका को निभाना चाहिए, फिर जीवन का रंगमय होना तय है. इस संकल्पना को प्राचीन भारत में वर्णश्रम कहते थे. इसका अर्थ था हर कोई यदि वह चिकित्सक, अध्यापक, पिता जो कोई भी या जो कुछ भी हो, उसे अपनी भूमिका को पूर्ण […]

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हम जिस किसी भी परिस्थिति में हो, हमें उसके अनुरूप सफलतापूर्वक उस भूमिका को निभाना चाहिए, फिर जीवन का रंगमय होना तय है. इस संकल्पना को प्राचीन भारत में वर्णश्रम कहते थे. इसका अर्थ था हर कोई यदि वह चिकित्सक, अध्यापक, पिता जो कोई भी या जो कुछ भी हो, उसे अपनी भूमिका को पूर्ण उत्साह से निभाना चाहिए. किसी भी दो व्यवसाय के मिलाप से हमेशा उचित परिणाम नहीं मिलते हैं. यदि किसी चिकित्सक को व्यापार करना है, तो वह उसे अलग से करना होगा और अपने व्यवसाय से अलग रखना होगा और अपने चिकित्सिक व्यवसाय को व्यापार नहीं बनाना होगा. मन के इन भावों को अलग और भिन्न रखना ही सफल और आनंदमय जीवन का रहस्य है. जब आपका मन साफ होता है और चेतना शुद्ध, शांतिपूर्ण, प्रसन्न और ध्यानस्थ होती है, तो फिर विभिन्न रंग और भूमिकाएं प्रकट होने लगती हैं.

फिर किसी भी विपरीत परिस्थिति के विरुद्ध हमें हर भूमिका को ईमानदारी से निभाने की शक्ति मिलती है. हमें समय-समय पर अपनी चेतना की गहन अनुभूति करनी चाहिए. यदि हम अपने भीतर को देखते हुए हमारे बाहरी रंगों या भूमिकाओं को निभायेंगे, तो सब कुछ निरर्थक प्रतीत होना निश्चित है. इसलिए हर भूमिका को ईमानदारी से निभाने के लिए दो भूमिका के मध्य में गहन विश्राम होना चाहिए. गहन विश्राम पाने में सबसे बड़ी बाधा इच्छा होती है. इच्छा का अर्थ तनाव है.

यहां तक छोटी इच्छाएं भी बड़ा तनाव उत्पन्न करती हैं. बड़े लक्ष इसकी तुलना में कम परेशानी देते हैं. कई बार इच्छाएं मन को परेशान करती हैं. इसका सिर्फ यह उपाय है कि इच्छा पर केंद्रित होकर उसे समर्पित कर दीजिये. सजगता के साथ इच्छा अपनी पकड़ छोड़ देती है और समर्पण संभव हो जाता है और फिर उसमें से अमृत प्रवाहित होता है.

गन्ने की डंठल इतनी कड़ी होती है कि उसकी मिठास पाने के लिए उसे निचोड़ना पड़ता है, जबकि फूल इतना कोमल होता है कि उससे अमृत निकालना सरल है. वास्तव में यही जीवन है, जिसमें दोनों का थोड़ा-थोड़ा मिश्रण है. भीतर के परमानंद को पाना ज्यादा सरल है बाहरी दुनिया के सुखों को हासिल करने की तुलना में, जिसके लिए अधिक प्रयासों की आवश्यकता होती है.

– श्री श्री रविशंकर

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