एक धार्मिक मन

Published at :22 Mar 2016 6:15 AM (IST)
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एक धार्मिक मन

एक धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो भगवान को ढूंढ रहा है. धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो असंख्य रीति-रिवाजों-परंपराओं को मानता है. धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो निर्बाध रूप से बिना किसी अंत के गीता, बाइबिल या कुरान की व्याख्या में लगा हुआ है, या निर्बाध रूप से जप कर […]

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एक धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो भगवान को ढूंढ रहा है. धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो असंख्य रीति-रिवाजों-परंपराओं को मानता है. धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो निर्बाध रूप से बिना किसी अंत के गीता, बाइबिल या कुरान की व्याख्या में लगा हुआ है, या निर्बाध रूप से जप कर रहा है, संन्यास धारण कर रखा है- ऐसा करनेवाले सारे व्यक्ति तथ्य से पलायन कर रहे हैं, भाग रहे हैं. धार्मिक व्यक्ति का संबंध संपूर्ण रूप से समाज को समझनेवाले व्यक्ति से है. वह समाज से अलग नहीं है.

वह परिस्थितियों पर निर्भर नहीं, यद्यपि वह स्वयं परिस्थितियों का परिणाम है- अर्थात् जो भोजन वह खाता है, जो किताबें वह पढ़ता है, जिन धार्मिक प्रपंचों, विश्वासों, रिवाजों और इस तरह के सभी गोरखधंधों में वह लगा है.

वह जिम्मेवार है, क्योंकि वह स्वयं को अनिवार्यतः समझता है, कि वह समाज का उत्पाद है, जिस समाज को उसने स्वयं बनाया है. इसलिए अगर यथार्थ को खोजना है, तो उसे यहीं से शुरू करना होगा. किसी मंदिर में नहीं, किसी छवि से बंध कर नहीं. अन्यथा कैसे वह कुछ खोज सकता है, जो संूपर्णतः नया है, यथार्थतः एक नयी अवस्था है.

क्या हम खुद में धार्मिक मन की खोज कर सकते हैं? एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में वास्तव में वैज्ञानिक होता है. वह अपनी राष्ट्रीयता, अपने भय-डर, अपनी उपलब्धियों से गर्वोन्नत, महत्वाकांक्षाओं और स्थानिक जरूरतों के कारण वैज्ञानिक नहीं होता. प्रयोगशाला में वह केवल खोज कर रहा होता है, पर प्रयोगशाला के बाहर वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही होता है.

धार्मिक मन रीति-रिवाजी मन नहीं होता, वह किसी चर्च-मंदिर-मसजिद-ग्रंथ, किसी समूह, किसी सोच के ढर्रे का अनुगमन नहीं करता. धार्मिक मन वह मन है, जो अज्ञात में प्रवेश करता है. लेकिन आप पूरी तरह हिसाब लगा कर बड़ी सावधानीपूर्वक अज्ञात में प्रवेश नहीं कर सकते. धार्मिक मन ही वास्तव में क्रांतिकारी मन होता है, और क्रांतिकारी मन ‘जो है’ उसकी प्रतिक्रिया नहीं होता. धार्मिक मन वास्तव में विस्फोटक ही है, सृजन है. यहां ‘सृजन’ का अर्थ कविता, सजावट, वास्तुशिल्प, संगीत आदि से नहीं है.

– जे कृष्णमूर्ति

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