शिक्षा किसे कहते हैं?

मैं परिभाषाएं देने के विरुद्ध हूं. परंतु शिक्षा के संबंध में यह कहा जा सकता है कि सच्ची शिक्षा वह है, जिसे मनुष्य की मानसिक शक्तियों का विकास हो. वह शब्दों को रटना मात्र नहीं है. वह व्यक्ति की मानसिक शक्तियों का ऐसा विकास है, जिससे वह स्वयमेव स्वतंत्रतापूर्वक विचार कर ठीक-ठीक निश्चय कर सके. […]
मैं परिभाषाएं देने के विरुद्ध हूं. परंतु शिक्षा के संबंध में यह कहा जा सकता है कि सच्ची शिक्षा वह है, जिसे मनुष्य की मानसिक शक्तियों का विकास हो. वह शब्दों को रटना मात्र नहीं है. वह व्यक्ति की मानसिक शक्तियों का ऐसा विकास है, जिससे वह स्वयमेव स्वतंत्रतापूर्वक विचार कर ठीक-ठीक निश्चय कर सके.
शिक्षा का मतलब यह नहीं कि तुम्हारे मन-मस्तिष्क में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूस दी जायें कि अंतर्द्वंद्व होने लगे और तुम्हारा मन-मस्तिष्क उन्हें जीवन भर पचा न सके. जिस शिक्षा से हम अपना जीवन-निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र-गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है. यदि तुम पांच ही भावाें को पचा कर तद्नुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो, तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरे पुस्तकालय को कंठस्थ कर रखा है. शिक्षा किसे कहते हैं? क्या वह पठन मात्र है? नहीं! क्या वह नाना प्रकार का ज्ञानार्जन है? नहीं, यह भी नहीं. जिस संयम के द्वारा इच्छा-शक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है.
अब सोचो, शिक्षा क्या वह है, जिसने निरंतर इच्छा-शक्ति को बलपूर्वक पीढ़ी-दर-पीढ़ी रोक कर प्राय: नष्ट कर दिया है, जिसके प्रभाव से नये विचारों की बात ही जाने दो, पुराने भी एक-एक करके लुप्त होते चले जा रहे हैं- क्या वह शिक्षा है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे यंत्र बना रही है? जो स्वयंचालित यंत्र के समान सुकर्म करता है, उसकी अपेक्षा अपनी स्वतंत्र इच्छा-शक्ति और बुद्धि के बल से अनुचित कर्म करनेवाला मेरे विचार से श्रेयस्कर है.
शिक्षा स्वयं दरवाजे-दरवाजे क्यों न जाये? यदि खेतिहर लड़का शिक्षा तक नहीं पहुंच पाता, तो उसके हल के पास या कारखाने में अथवा जहां भी हो, वहीं क्यों न शिक्षा पहुंचायी जाये. हमारे बच्चे जो शिक्षा पा रहे हैं, वह बड़ी निषेधात्मक है. स्कूल के लड़के कुछ भी नहीं सीखते, बल्कि जो कुछ उनका अपना है, उसका भी नाश हो जाता है. और, इसका परिणाम होता है-
श्रद्धा का अभाव.
-स्वामी विवेकानंद
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