अध्यात्म का कैप्सूल
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :08 Mar 2016 6:33 AM (IST)
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कई बार दवाई की एक छोटी गोली भी दवाई की बड़ी गोली से ज्यादा असरदार होती है. अपनी भारतीय संस्कृति में बहुत-सी ऐसी विधियां हैं, जो मनुष्य के जीवन से सारे दुखों को दूर करने में सहायक हैं और सुख-शांति एवं समृद्धि लाने में भी बहुत सहायक होती हैं. लेकिन, हम लोग आधुनिकता के सम्मोहन […]
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कई बार दवाई की एक छोटी गोली भी दवाई की बड़ी गोली से ज्यादा असरदार होती है. अपनी भारतीय संस्कृति में बहुत-सी ऐसी विधियां हैं, जो मनुष्य के जीवन से सारे दुखों को दूर करने में सहायक हैं और सुख-शांति एवं समृद्धि लाने में भी बहुत सहायक होती हैं. लेकिन, हम लोग आधुनिकता के सम्मोहन में धीरे-धीरे इन सारी परंपराओं को भूल रहे हैं.
जिस दिन हम अपनी परंपराओं को भूल जायेंगे, उस दिन हमारी संस्कृति, हमारा समाज नष्ट हो जायेगा. भारत की ऊर्जा उसकी आध्यात्मिक शक्ति में निहित है. बाकी सब क्षेत्रों में भारत अन्य देशों से कमजोर हो सकता है, लेकिन अध्यात्म के क्षेत्र में पूरा विश्व भारत की ओर ही देखता है. अगर संसार में किसी को अध्यात्म की शिक्षा चाहिए, तो वह फ्रांस, चीन, रूस, अमेरिका, इंग्लैंड या जापान नहीं जाता, अपितु वह भारत आता है. मानव जीवन बहु-आयामी है. केवल पदार्थ के स्तर पर हम जीवित रहते हैं, ऐसी बात तो नहीं है.
पदार्थ के अतिरिक्त मनुष्य का संबंध उसकी श्रद्धा, आस्था और विश्वास के माध्यम से किसी परम तत्व से भी जुड़ा है, जिसका अनुभव अवश्य किया जा सकता है. आज के युग में अपनी श्रद्धा और भक्ति को सुरक्षित रखना और उसे एक दिशा प्रदान करना, यह हम लोगों के जीवन की आवश्यकता है. हमारी संस्कृति की यही शिक्षा है कि न केवल हम संसार में अच्छे तरीके से सुख-समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि ईश्वर को भी अपने साथ लेकर चल सकते हैं.
इस चतुर्मास अनुष्ठान में अपनी संस्कृति के जो छोटे-छोटे पर बेहद उपयोगी टैब्लेट और कैप्सूल हैं, उन्हें आप लोगों को खिलायेंगे. जैसे दवाई खाने से शरीर स्वस्थ हो जाता है, वैसे ही इन कैप्सूलों को खाने से आपका जीवन स्वस्थ होगा, आपके जीवन में आनंद आयेगा. हमारे गुरुजी कहते थे कि जीवन में भौतिक चेतना की तरह ही आध्यात्मिक चेतना की भी प्राप्ति हो जाये, तो वह हमारे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है. इसे उन्होंने समझाया वेदांत के एक सूत्र- आत्मभाव से. आत्मभाव मन की एक शांत अवस्था है, जिसमें आंतरिक सौम्यता प्रकट होती है.
-स्वामी निरंजनानंद सरस्वती
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