जहां प्रभु, वहीं वृंदावन

Published at :03 Mar 2016 12:04 AM (IST)
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जहां प्रभु, वहीं वृंदावन

भक्तियोग में भक्त कृष्ण के अतिरिक्त और कोई इच्छा नहीं करता. शुद्धभक्त न तो स्वर्गलोग जाना चाहता है और न ब्रह्मज्योति से तादात्म्य या मोक्ष या भवबंधन से मुक्ति ही चाहता है. शुद्धभक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं करता. चैतन्यचरितामृत में शुद्धभक्त को निष्काम कहा गया है. उसे ही पूर्ण शांति का लाभ होता […]

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भक्तियोग में भक्त कृष्ण के अतिरिक्त और कोई इच्छा नहीं करता. शुद्धभक्त न तो स्वर्गलोग जाना चाहता है और न ब्रह्मज्योति से तादात्म्य या मोक्ष या भवबंधन से मुक्ति ही चाहता है. शुद्धभक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं करता. चैतन्यचरितामृत में शुद्धभक्त को निष्काम कहा गया है. उसे ही पूर्ण शांति का लाभ होता है.

उन्हें नहीं जो स्वार्थ में लगे रहते हैं. एक ओर जहां ज्ञानयोगी, कर्मयोगी या हठयोगी का अपना-अपना स्वार्थ रहता है, वहीं पूर्णभक्त में भगवान को प्रसन्न करने के अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा नहीं होती. अत: भगवान कहते हैं कि जो एकनिष्ठ भाव से उनकी भक्ति में लगा रहता है, उसे वे सरलता से प्राप्त होते हैं. शुद्धभक्त सदैव कृष्ण के विभिन्न रूपों में से किसी एक की भक्ति में लगा रहता है. कृष्ण के अनेक स्वांश तथा अवतार हैं.

यथा राम तथा नृसिंह. जिनमें से भक्त किसी एक रूप को चुन कर उसकी प्रेमाभक्ति में मन को स्थिर कर सकता है. ऐसे भक्त को उन अनेक समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता, जो अन्य योग के अभ्यासकर्ताओं को झेलनी पड़ती है. भक्तियोग अत्यंत सरल शुद्ध तथा सुगम है. इसका शुभारंभ हरेकृष्ण जप से किया जा सकता है.

भगवान सब पर कृपालु हैं, किंतु जो अनन्य भाव से उनकी सेवा करते है, वे उनके ऊपर विशेष कृपालु रहते हैं. वेदों (कठोपनिषद) में कहा गया है- येमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम, अर्थात् जिसने पूरी तह से भगवान की शरण ले ली है और जो उनकी भक्ति में लगा हुआ है, वही भगवान को यथारूप में समझ सकता है. गीता में भी कहा गया है- ददामि बुद्धियोगं तम. ऐसे भक्त को भगवान पर्याप्त बुद्धि प्रदान करते हैं, जिससे वह उन्हें भगवद्धाम में प्राप्त कर सकें.

शुद्धभक्त का बड़ा गुण यह है कि वह देश-काल का विचार किये बिना अनन्य भाव से कृष्ण का ही चिंतन करता रहता है. कुछ लोगों का कहना है कि भक्तों को वृंदावन जैसे पवित्र स्थानों में या किसी पवित्र नगर में, जहां भगवान रह चुके हैं, रहना चाहिए किंतु शुद्धभक्त कहीं भी रह कर अपनी भक्ति से वृंदावन जैसा वातावरण उत्पन्न कर सकता है. श्री अद्वैत ने चैतन्य महाप्रभु से कहा था- हे प्रभु! आप जहां भी हैं, वहीं वृंदावन है.Àस्वामी प्रभुपाद

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