श्रद्धा और अश्रद्धा

Published at :05 Jan 2016 2:17 AM (IST)
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श्रद्धा और अश्रद्धा

किसी ने मुझसे पूछा-जब बुद्धि असफल हो जाती है, तो क्या हम श्रद्धा का सहारा लें. मैंने कहा- श्रद्धा भी बुद्धि है. श्रद्धा बौद्धिक होती है. हम समझते हैं कि अश्रद्धा बौद्धिक होती है और श्रद्धा बौद्धिक नहीं होती है. अश्रद्धा भी बौद्धिक होती है, श्रद्धा भी बौद्धिक होती है. जो मानता है कि मैं […]

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किसी ने मुझसे पूछा-जब बुद्धि असफल हो जाती है, तो क्या हम श्रद्धा का सहारा लें. मैंने कहा- श्रद्धा भी बुद्धि है. श्रद्धा बौद्धिक होती है. हम समझते हैं कि अश्रद्धा बौद्धिक होती है और श्रद्धा बौद्धिक नहीं होती है.

अश्रद्धा भी बौद्धिक होती है, श्रद्धा भी बौद्धिक होती है. जो मानता है कि मैं ईश्वर को मानता हूं, वह किस चीज से मान रहा है ईश्वर को? बुद्धि से मान रहा है? जो कहता है, मैं ईश्वर को नहीं मानता, वह किससे नहीं मान रहा है? वह बुद्धि से नहीं मान रहा है. धार्मिक लोगों ने एक उलझाव पैदा कर दिया है. वे सोचते हैं कि श्रद्धा तो बौद्धिक नहीं है, अश्रद्धा बौद्धिक है. मेरे अनुसार दोनों बौद्धिक हैं. अगर आपकी बुद्धि बिलकुल असफल हो जाये कुछ खोजने में, तो न वह बुद्धि श्रद्धा करेगी न अश्रद्धा, क्योंकि श्रद्धा भी खोज है और अश्रद्धा भी खोज है.

जो कह रहा है- ईश्वर नहीं है, उसने कुछ खोज लिया. जो कह रहा है- ईश्वर है, उसने भी खोज लिया. लेकिन अगर बुद्धि टोटल फेल्योर हो जाये, तो ही आपको सत्य मिलेगा. अगर बुद्धि यह कह दे कि मैं कुछ भी नहीं खोज पा रही, और बुद्धि पर से आपकी आस्था उठ जाये, तो आपके भीतर प्रज्ञा का जागरण हो जायेगा. बुद्धि की असफलता बड़ा सौभाग्य है.

– आचार्य रजनीश ओशो

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