ध्यान कहीं भी कभी भी

Updated at :13 Aug 2015 12:08 AM
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ध्यान कहीं भी कभी भी

तुम्हारे मन पर सतत चारों तरफ से तरह-तरह के विचारों का आक्रमण होता है. स्वयं का बचाव करने के लिए हर मन ने बफर्स की एक सूक्ष्म दीवार खड़ी कर ली है, ताकि ये विचार वापिस लौट जाएं, तुम्हारे मन में प्रवेश न करें. उन्हें रोकने का वही तरीका है, जिस तरह तुम अपने स्वयं […]

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तुम्हारे मन पर सतत चारों तरफ से तरह-तरह के विचारों का आक्रमण होता है. स्वयं का बचाव करने के लिए हर मन ने बफर्स की एक सूक्ष्म दीवार खड़ी कर ली है, ताकि ये विचार वापिस लौट जाएं, तुम्हारे मन में प्रवेश न करें. उन्हें रोकने का वही तरीका है, जिस तरह तुम अपने स्वयं के विचारों को रोकते है.
सिर्फ अपने विचारों के साक्षी बनो. और जैसे-जैसे तुम्हारे विचार विलीन होने शुरू होंगे, इन विचारों को रोकने के लिए बफर्स की जरूरत नहीं पड़ेगी. जो आदमी ध्यान से परिचित है, वही सुनने की कला जानता है. किसी वृक्ष के पास बैठो या अपने बिस्तर पर बैठो, कहीं भी. सड़क पर चलनेवाली यातायात की आवाज सुनना शुरू करो, लेकिन समग्रता से, तन्मयता से, कोई निर्णय लिये बिना कि यह अच्छा है कि बुरा है.
तुम्हारे विचार कम हो जायेंगे और उसके साथ तुम्हारे बफर्स भी गिर जायेंगे. और अचानक एक द्वार खुलता है जो तुम्हें मौन और शांति में ले जाता है. सदियों से हर किसी के लिए यह एकमात्र उपाय रहा है स्वयं की वास्तविकता के और अस्तित्व के रहस्य के करीब आने का.
जैसे-जैसे तुम करीब आने लगोगे तुम्हें अधिक शीतलता महसूस होगी, और तब तुम प्रसन्न हो उठोगे, तुम आनंदित अनुभव करोगे. एक बिंदु आता है जब तुम आनंद से इतने भर जाते हो कि तुम पूरी दुनिया के साथ बांटने लगते हो और फिर भी तुम्हारा आनंद उतना ही बना रहता है.
आचार्य रजनीश ‘ओशो’
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