संघर्ष और सफलता की मिसाल हैं संत जॉन मेरी वियानी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Aug 2019 3:39 PM
दुर्जय पासवान, गुमला पुरोहितों (फादरों) के संरक्षक संत जॉन मेरी वियानी का आज (चार अगस्त) पर्व दिवस है. उनकी संघर्ष और सफलता की एक बेमिसाल कहानी है. 24 में 18 घंटे वे सिर्फ काम करते थे. जैसे मधुमक्खियां मधु जमा करने के लिए हर फूल पर मंडराती है और मधु लाकर छत्ते में भर देती […]
दुर्जय पासवान, गुमला
पुरोहितों (फादरों) के संरक्षक संत जॉन मेरी वियानी का आज (चार अगस्त) पर्व दिवस है. उनकी संघर्ष और सफलता की एक बेमिसाल कहानी है. 24 में 18 घंटे वे सिर्फ काम करते थे. जैसे मधुमक्खियां मधु जमा करने के लिए हर फूल पर मंडराती है और मधु लाकर छत्ते में भर देती है, उसी प्रकार का व्यक्तित्व जॉन मेरी वियानी का था.
कौन जानता था कि फ्रांस में आठ मई, 1786 को एक साधारण परिवार में जन्मा बालक संत बनने वाला है. इस बालक ने बुराई में जकड़े आर्स गांव (आर्स पल्ली) को बदल डाला. बुराइयों से लड़े, बिना किसी से डरे. वह अपनी माता से बेहद प्रभावित थे. बचपन में प्रार्थना की जो किरणें उन्हें मिलीं, उसे उन्होंने जीवन भर संजोकर रखा. यही वजह रही कि उन्होंने जो भी संकल्प लिया, उसे पूरा किया.
उनकी आत्मा प्रभु में इस कदर लीन हो गयी कि उन्होंने अपने जीवन को आर्स के एक छोटे-से गांव में रहकर प्रभु को समर्पित कर दिया. आर्स में उन दिनों बुराई चरम पर थी. उन्होंने वहां सुधार के कई प्रयास किये. उन्होंने देखा कि गांव में युवक-युवतियों, विवाहित जोड़ों और बच्चों के लिए धार्मिक शिक्षा व संस्कार ग्रहण करने का कोई अवसर नहीं था. इससे वे बेहद दुखी हुए.
उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि वे इन सभी का उत्थान करेंगे. सेमिनरी की पढ़ाई में वे बहुत कमजोर थे. इसलिए उन्हें सेमिनरी से निकाल दिया गया था. लेकिन, कड़ी मेहनत के बूते उन्होंने अपने लक्ष्य को हासिल किया. जॉन मेरी वियानी ने देखा कि आर्स गांव में लोग सांसारिक भोगा-विलास का जीवन बिता रहे थे, लेकिन धार्मिक लोगों की मदद से उन्होंने पूरे आर्स का वातावरण बदल दिया.
उन्होंने कड़े शब्दों में विलासितापूर्ण जीवन बिताने वाले और पाप कर्म करने वालों की आलोचना की. घर-घर जाकर युवकों को शिक्षित किया. जॉन मेरी वियानी को कई बार गांव छोड़ने के लिए विवश किया गया. लेकिन, संत टेरेसा के कथनों ने उनके कठिन व कड़वे अनुभवों को मीठे अनुभवों में बदल दिया. आखिरकार जॉन मेरी वियानी की पहल रंग लायी.
ईश्वर में पूर्ण विश्वास व आस्था की वजह से दूसरे लोगों के प्रति उनके मन में प्रेम की भावना जागी और आर्स गांव शांति व प्रेम का स्थान बन गया. ईसा कहते हैं, ‘भला गड़ेरिया मैं हूं, मैं अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देता हूं.’ और यही बात संत जॉन मेरी वियानी के हृदय में रम गयी. सो, उन्होंने भले गड़ेरिया के समान आर्स गांव के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिये. विनम्रता की मूर्ति व आदर्श पुरोहित जॉन मेरी वियानी की मृत्यु चार अगस्त 1859 को हुई. वे हमेशा कहते थे कि अपने जीवन में जो कुछ हो सका, वही मैंने किया.
संत जॉन मेरी वियानी कहते थे, ‘पुरोहित का जीवन अपने लिए नहीं. दूसरों के लिए है. पुरोहित की पहचान अपने लोगों के प्रति प्रेम, सदभावना, दया एवं विनम्रता जैसी भावनाओं से प्रकट होती है.’ जॉन मेरी के अदभुत कार्य के कारण ही संत पिता पियुस 11वें ने उन्हें संत घोषित किया. संत पिता पियुस ने कहा था कि सभी देशों के पल्ली पुरोहित उनका अनुसरण करें. एक पल्ली पुरोहित पल्ली का केंद्र है. जिस प्रकार परिवार में बच्चों का चरित्र निर्माण करना माता-पिता का कर्म है, उसी प्रकार पल्ली के अध्यात्म का केंद्र पल्ली पुरोहित है.
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