श्रावणी मेला : देवघर में ‘कामना लिंग’ के दर्शन से पूरी होती हैं मनोकामनाएं, यहां ऐसे पहुंचे थे भगवान भोलेनाथ

Updated at : 11 Jul 2019 7:08 PM (IST)
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श्रावणी मेला : देवघर में ‘कामना लिंग’ के दर्शन से पूरी होती हैं मनोकामनाएं, यहां ऐसे पहुंचे थे भगवान भोलेनाथ

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नवम ज्योतिर्लिंग हैं बाबा बैद्यनाथ. बाबा बैद्यनाथ का विश्वविख्यात मंदिर झारखंड के देवघर जिला में स्थित है. कहते हैं कि यहां आने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है. इसलिए इस शिवलिंग को ‘कामना लिंग’ कहा जाता है. कहते हैं कि बाबा भोलेनाथ अनाथों के नाथ हैं. वह औढ़र दानी […]

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द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नवम ज्योतिर्लिंग हैं बाबा बैद्यनाथ. बाबा बैद्यनाथ का विश्वविख्यात मंदिर झारखंड के देवघर जिला में स्थित है. कहते हैं कि यहां आने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है. इसलिए इस शिवलिंग को ‘कामना लिंग’ कहा जाता है. कहते हैं कि बाबा भोलेनाथ अनाथों के नाथ हैं. वह औढ़र दानी कहे जाते हैं. श्रद्धापूर्वक जो भी इनके द्वार पहुंचता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. कुछ लोग यहां अपनी मनोकामना मांगने आते हैं, तो कुछ अपनी मनोकामनापूर्ण होने पर शिव का आभार प्रकट करने.

बैद्यनाथ धाम में यूं तो सालों भर लोग शिव के नवम ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन सावन एवं आश्विन मास में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है. 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में कहा जाता है कि जहां-जहां साक्षात महादेव प्रकट हुए, वहां-वहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई. पुराणों में ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ की कथा प्रचलित है, जो लंकापति रावण से जुड़ी है. शिव पुराण में इसका वर्णन मिलता है.

शिव पुराण में कहा गया है कि लंकापति रावण भगवान भोले शंकर का परम भक्त था. उन्हें प्रसन्न करने के लिए रावण ने हिमालय पर्वत पर जाकर शिवलिंग की स्थापना की और घोर तपस्या करने लगा. वर्षों तक तप करने के बाद भी भगवान शंकर प्रसन्न नहीं हुए, तो रावण ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए अपने सिर की आहुति देने का निश्चय किया. विधिवत पूजा करते हुए दशानन एक-एक करके अपने नौ सिरों को काटकर शिवलिंग पर चढ़ाता गया. जब दसवां सिर काटने वाला था, तभी भगवान शिव प्रकट हुए और रावण को वरदान मांगने के लिए कहा.

तब रावण ने ‘कामना लिंग’ को ही लंका ले जाने का वरदान मांग लिया. रावण के पास सोने की लंका के अलावा तीनों लोकों में शासन करने की शक्ति थी. कई देवता, यक्ष और गंधर्वों को उसने कैद करके लंका में रखा था. इसलिए उसने इच्छा जतायी कि भगवान शिव कैलाश को छोड़कर लंका में ही रहें. महादेव ने उसकी इच्छा पूरी कर दी, लेकिन साथ में एक शर्त रख दी. उन्होंने कहा कि अगर तुमने शिवलिंग को रास्ते में कही भी रखा, तो मैं फिर वहीं रह जाऊंगा और नहीं उठूंगा. रावण ने उनकी शर्त मान ली.

भगवान शिव की कैलाश छोड़ने की बात सुनते ही सभी देवता चिंतित हो गये. इस समस्या के समाधान के लिए सभी भगवान विष्णु के पास पहुंचे. तब श्रीहरि ने एक लीला रची. भगवान विष्णु ने वरुण देव को आचमन के जरिये रावण के पेट में प्रवेश करने के लिए कहा. रावण आचमन करके शिवलिंग को लेकर लंका की ओर चला, तो देवघर के पास उसे जोर की लघुशंका लगी. लंकेश सोचने लगा कि लघुशंका करे तो कैसे! इसी बीच भगवान विष्णु एक ग्वाले के रूप में वहां प्रकट हुए.

रावण ने उस ग्वाले को तब तक शिवलिंग को संभाल कर रखने के लिए कहा, जब तक वह लघुशंका से नहीं लौट जाता. साथ ही हिदायत दी कि शिवलिंग को वह किसी भी सूरत में जमीन पर न रखे. कहते हैं कि रावण छह महीने तक लघुशंका करता रह गया. इस बीच, ग्वाला के रूप में प्रकट हुए भगवान विष्णु शिवलिंग को भूमि पर रखकर विलुप्त हो गये.

रावण जब लौटकर आया, तो लाख प्रयास के बावजूद लिंग को नहीं उठा सका. अंत में ने क्रोधित होकर उसने लिंग को जमीन में धंसा दिया और वहां से खाली हाथ लंका लौट गया. रावण के जाने के बाद स्वर्गलोक से सभी देवी-देवता वहां पहुंचे और लिंग की पूजा कर विधिवत रूप से शिवलिंग को स्थापित किया.

ऐसे शुरू हुई बाबाधाम में भगवान भोलेनाथ की पूजा

वर्षों के बाद बैजनाथ नामक एक चरवाहे को पशु चराते हुए सबसे पहले इस शिवलिंग के दर्शन हुए. इसी चरवाहे के नाम से यह ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ. मान्यता है कि बाबा बैद्यनाथ के मंदिरों का निर्माण स्वयं देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किया. कहा जाता है कि मां पार्वती के मंदिर के निर्माण के दौरान ही सूरज निकल आया और भगवान विश्वकर्मा को निर्माण कार्य बंद करना पड़ा. इसलिए पार्वती का मंदिर विष्णु एवं भगवान शिव के मंदिर से छोटा रह गया. इस प्रांगण में गंगा, भैरवनाथ सहित कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं. मंदिर के प्रांगण में एक प्राचीन कुआं भी है.

कांवड़ चढ़ाने का है बड़ा महत्व

देवघर में कांवड़ चढ़ाने का बड़ा ही महत्व है. भगवान भोलेनाथ के भक्त सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर लगभग 106 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए देवघर पहुंचते हैं. रास्ते में कई धर्मशालाएं हैं, जहां भक्त विश्राम करते हैं. फिर अपनी इच्छा से वहां से यात्रा शुरू करते हैं. बम कई प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं :

साधारण बम : सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पड़ावों पर ठहरते हुए जो भक्त देवघर की यात्रा करते हैं, उन्हें साधारण बम कहते हैं. ये लोग जगह-जगह धर्मशालाओं में रात्रि विश्राम करते हुए आगे बढ़ते हैं. इस दौरान भक्त सात्विक आहार ग्रहण करते हैं.

डाक बम : कुछ भक्त सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर डाक बम बनकर 24 घंटे में 106 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं. बैद्यनाथ धाम मंदिर में प्रवेश और जलाभिषेक करने के लिए इनके लिए विशेष व्यवस्था होती है.

प्रणामी बम : प्रणामी बम घोर परिश्रम से बाबाधाम तक पहुंचते हैं. ये ऐसे भक्त होते हैं, जो अपनी मन्नत पूरी करने के लिए अपने घर से ही दंड प्रणाम करते हुए देवघर तक की यात्रा करते हैं. इनकी यात्रा काफी कष्टकर एवं लंबी होती है.

पेड़ा, चूड़ा और इलाइचीदाना का प्रसाद

बाबा वैद्यनाथ के मंदिर के चारों तरफ बाजार है, जहां चूड़ा, पेड़ा, चीनी का बना इलाइची दाना, सिंदूर, माला आदि मिलता है. लोग प्रसाद स्वरूप इन चीजों को खरीदकर अपने घर ले जाते हैं. यहां से कुछ किलोमीटर दूर वासुकीनाथ के रास्ते में घोड़मारा नामक स्थान है, जहां का पेड़ा अति स्वादिष्ट होता है. आप बाबाधाम की यात्रा करते समय अपने परिवार एवं कुटुम्बों के लिए प्रसाद के तौर पर यहां से पेड़ा खरीद सकते हैं.

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