जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें.
आदिशक्ति सीताजी-7
अयोध्याकांड से अरण्यकांड तक सीताजी स्थितिकारिणी, करुणामयी क्षमास्वरूपा हैं, तो लंकाकांड में संहारकारिणी हैं. यहां सीताजी निशिचर कुल को नाश करने के लिए कालरात्रि बनकर लंका में प्रवेश करती हैं. रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने सीताजी के इस रूप का वर्णन करते हुए लिखा है-
कालरात्रि निसिचर कुल केरी । तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ।।
यहां कालरात्रि शब्द संहारकारिणी सीताजी का परिचायक है. श्री दुर्गासप्तशती में जहां देवी के अष्टोत्तरशतनाम की चर्चा है, वहां भी कालरात्रि शब्द सांकेतिक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है—
अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी ।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी ।।
वस्तुतः लंका में सीताजी का प्रवेश कालरात्रि के रूप में हुआ है. नारायणी रौद्रमुखी बनकर अग्निज्वालात्मक रूप से लंका में निवास कर रही हैं. उन्हें उचित अवसर की प्रतीक्षा है, जिसमें भद्रकाली कराली बनकर पापपुरी लंका का संहार कर सकें. विभीषण इस तत्व से परिचित हैं, अतः वे रावण को समझाकर कहते हैं कि शक्तिस्वरूपा सीताजी को लाकर मानो तुमने कालरात्रि (मृत्युदेवी) को निमंत्रण दे दिया है.
अब लंका में कोई भी जीवित नहीं बचेगा. महारानी मंदोदरी भी रावण से कहती हैं कि सीता शीतनिशा (कालरात्रि) के रूप में लंका में आयी हैं. जब तक इन्हें श्रीराम को लौटा नहीं दोगे, तब तक ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते-
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई । सीता सीत निसा सम आई ।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें । हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ।।
जैसे तुषारपात से कमल-वन विनष्ट हो जाता है उसी प्रकार निशिचरकुल के संहार के लिए सीताजी का आगमन लंका में हुआ है.
(क्रमशः) प्रस्तुतिः डॉ एनके बेरा