मुजफ्फरपुर, बिहार में जन्मी और केरल में रह रहीं डाॅ अनामिका अनु एक युवा कवयित्री हैं, जिन्होंने समकालीन साहित्य जगत में अपनी खास पहचान बनाई है. भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (2020), राजस्थान पत्रिका वार्षिक सृजनात्मक पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ कवि, प्रथम पुरस्कार, 2021),रजा फेलोशिप (2022) ,2023 का ‘महेश अंजुम युवा कविता सम्मान’ (केदार न्यास) और 2025 का प्रतिभा सम्मान (केरल हिंदी प्रचार सभा) प्राप्त कर इन्होंने पूर ठसक के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. उनके प्रकाशित काव्यसंग्रहों के नाम हैं ‘इंजीकरी’ (वाणी प्रकाशन) और मैं दीवारों पर खिड़कियाँ लिख रही हूं. आइए उनकी कुछ खास कविताओं का आनंद यहां लेते हैं. 1.राधाकृष्णन राधाकृष्णन अट्ठावन साल का हैगैस के सिलिंडर को कन्धे पर लादकर आता हैऔर धीरे से रखता है रसोई की फर्श पर उसकी आंखें बड़ी-बड़ी और थकी-थकी-सी हैंदो इडली और थोड़ी-सी चम्मन्दी खाकर कभी-कभी बसयूं ही चमकती हैंउसके बाल और दाढ़ी पके हुए हैंवह पसीने से तर-बतर रहता है वह राख-सा आदमी आग हो जाने का सामान बांटता हैपीला पड़ चुका राधाकृष्णन हर रोज लाल सिलिंडर बांटता है वह आ जाता है महीने दो महीने में एक बारईंधन का खत्म होनाउसका धूप में पकना साथ-साथ होता है उसकी लाल कमीज का रंग फीका हो गया हैसिलिंडर का अब भी टुह-टुह लाल वह थकान की किताब परएक कप मीटर-चाय रखता हैजरा-सा सुस्ताता हैयेसुदास का कोई गीत गुनगुनाता हैफिर सिलिंडर उठाता हैऔर धूप में धूप सा फैल जाता है सिलिंडर और उसके भीतर आग हैजिसे बाजार और समाज ने ईंधन बना दिया है सिलिंडर उठाते वक्त चिंगारी-सा सुलगता हैटूटती टहनी-सी कड़कड़ाती हैं बांहें उसकी थकान से जरूरत का सामान मोलता हैबूढ़ा हो रहा राधाकृष्णन कुछ नहीं बोलता है कई बदल चुकी सरकारों और बदल चुकी कीमतों के साथवह चालीस साल से सिलिंडर ढो रहा हैएक बुझा आदमी ईंधन ढो रहा है. 2.वह मौत को एक खतरनाक कविता की तरह जी जायेगा बेरोजगारी और भुखमरी उसे मार न देइसलिए वह चुपचाप धूल और कोयला फांकेगानाइट्रोजन ऑक्साइड सांस में लेगातुम वसन्त, खुशबू, मन्द-मीठी हवा की बात करोगेवह धुआं, तपती जमीन, खांसी और मौत कोएक खतरनाक कविता की तरह जी जायेगा 3.पानी पीकर माटी धीरे-धीरे रंभाती है बत्तखों के झुण्ड-सा आ जाती हैएक के बाद एक याद तुम्हारीपानी पीकर माटी धीरे-धीरे रंभाती हैमैं थके किसान-सा लेटा माटी परबोये हुए खेत-सा दिखता है नभ ऊपरसांझ के जाते-जातेउसमें उग आता है तुम्हारा चेहरा 4.वह सबकुछ भूल गया वह सबकुछ भूल गयाउसे याद नहीं रहींविरह की सर्दियाँचुम्बनों का घरस्पर्शकी भाषामिलन की हँसीविदाई का कुआँदुःख का चापाकलऔर सुख की गौरैया 5.तुम स्वयं सम्भावना हो हर ज़ख़्म एक दरवाज़ा हैहर खरोंच एक खिड़की हैतुम्हारा चेहरा, एक सम्पन्न दुनिया हैजिसमें आज़ादी का दरवाज़ा हैरोशन खिड़कियाँ हैंतुम स्वयं सम्भावना हो 6.सलगी सिल गयी सलगी सिलते-सिलते शरद की धूप में सो चुकीस्त्रियों की देह पर धूप की घास उग आयी हैऔर उनके गालों पर गोल शीशे के फूल खिले हैंचिथड़ों से तोशक-सलगी बनाती स्त्रियाँजीवन को नहीं टाँक पाने का सब मलालकजरी सिलते वक़्त निकालती हैंइतने कलात्मक तरीक़े से दुःख या तोपृथ्वी सिलती हैया कविता 7.मेरा कोई घर नहीं है मेरा जन्म ही विरोध हैमुझे न चाहे जाने कीतमाम साजिशों काईश्वर मुझसे इस कदर डरे हुए हैंसामने नहीं आतेजबकि वे हर जगह हैंमेरी देह को घर लौटने केतमाम रास्तों का पता हैमेरा कोई घर नहीं हैक्या उसे पता है? 8.मछलियों ने नयी जमीन तलाश ली है जल के देवता से मछलियों ने राड़ ठानी हैउखाड़ फेंका है उन्होंने अपने गलफड़ों कोवे फेफड़े उगा चुकी हैंअब वे किसी के जल में नहीं तैरेंगीअब वे किसी जाल में नहीं फँसेंगीउनकी बाहें अब बलिष्ठ हो गयी हैंउनकी हाथों में क़लम और जलता हुआ मशाल हैकुएँ और पोखर के मेंढकों की टर्टराहट अचानक से बढ़ गयी हैमछलियों ने नयी ज़मीन तलाश ली है 9.चाह औरतें बुरांश के फूल नहीं होना चाहतींवे नहीं चाहतींपिसना, शरबत बननाऔर देव अर्पित होना।वे पत्तियाँ होना चाहती हैंवह भी उस वृक्ष काजो अब तक खोजा और जाना नहीं गया हैबेनाम, जिसकी कोई जाति-प्रजाति तय नहीं हैजो कहीं भी, कभी भी उग आयेऔर जिसे किसी खर-पतवार का डर न होजिसका कोई रक्षक-संरक्षक न होऔर जो अपनी उम्र जी कर माटी हो जाये। 10.जैसे ही मुझे प्रेम होगा जैसे ही मुझे प्रेम होगाओस के जुगनूओं से पंख निकल आयेंगेसूरज डालडा के पीले डिब्बे-सा उगेगादिन नील और कलफ़ लगी शर्ट-सा चमक उठेगापेट में चलने लगेंगी शक्कर भरी नावें 11.सियोलिज़्म उसके सियोलिज़्म से प्रेम भी आहत हुआ।वह मुझे कम जानता था,और मेरे बारे में बहुत बताता रहा। मेरे जानने वालों के बीचवह अनवरत बोलता रहा।उनकी चुप्पी अबउसके लिए प्राणघातक थी। 12.उसने कहा उसने कहा,“तुम बहुत प्यारी हो, अना,”और पृथ्वी सिकुड़करएक शब्द बन गई। उसने होंठों पर उँगलियाँ फेरीं,नदी सिकुड़करएक लकीर बन गई। उसने बालों को सहलाया,सारी पत्तियाँ झड़करएक पंक्ति बन गईं। उसने “हाँ” कहा,उपेक्षाओं का पूरा आकाशएक विलुप्त भाषा बन गया। फिर एक दिनउसने उँगली उठाई।उस दिनसूरज-चाँद,बादल-आकाश—सब उठकरऊपर चले गए। —————————————————————————————–