अपनी विवादित पुस्तक ‘द्विखंडितो’ की वजह से विरोध-प्रदर्शनों के बाद कोलकाता छोड़ने पर मजबूर हुईं बांग्लादेशी लेखिका तसलीम नसरीन ने बृहस्पतिवार को कहा कि लंबे समय बाद अपनी पहली सार्वजनिक उपस्थिति के लिए शहर (कोलकाता) लौटना ‘अपने देश’ में लौटने जैसा है. उन्होंने उम्मीद जतायी कि यह दौरा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति की आवाजों की सुरक्षा के महत्व की पुनः पुष्टि करेगा. नसरीन एक अगस्त को यहां एक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और मशहूर लेखक शीर्षेंदु मुखोपाध्याय के भी शामिल होने की संभावना है.निर्वासन ने मुझे मजबूत बनाया है, लेकिन इसने मुझे ऐसे जख्म भी दिये हैं, जिन्हें यह मजबूती मिटा नहीं सकती. इसने मुझे सिखाया कि घर सिर्फ कोई इमारत या पता नहीं होता. -तसलीमा नसरीन2007 के बाद पहली बार कोलकाता लौटीं तसलीमावर्ष 2007 के बाद कोलकाता में नसरीन की यह पहली सार्वजनिक उपस्थिति होगी. उस समय उनकी आत्मकथा के खिलाफ हुए विरोध-प्रदर्शनों के कारण उन्हें वह शहर छोड़ना पड़ा था, जिसे उन्होंने बांग्लादेश छोड़ने के एक दशक बाद अपना घर बनाया था.ये भी पढ़ें: 20 साल बाद कोलकाता लौट रहीं तसलीमा नसरीन, 1 अगस्त को कट्टरपंथ-विरोधी कार्यक्रम में होंगी शामिल‘द्विखंडितो’ पर विवाद के बाद बंगाल छोड़ना पड़ा था नसरीन कोपश्चिम बंगाल सरकार ने वर्ष 2003 में तसलीमा नसरीन की किताब ‘द्विखंडितो’ (दो हिस्सों में बंटी) पर कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के कारण प्रतिबंध लगा दिया था. नसरीन ने कोलकाता में कहा कि उनके लिए कोलकाता केवल रहने की जगह नहीं थी. एक ऐसा शहर था, जिसने उन्हें अपनापन महसूस कराया और इतने वर्षों तक दूर रहने के बावजूद उनका पश्चिम बंगाल से जुड़ाव कम नहीं हुआ.मैं खुशी के साथ-साथ दर्द भी महसूस कर रही हूं. कोलकाता सिर्फ वह शहर नहीं था, जहां मैं रहती थी. वहां मेरा घर, दोस्त और पाठक होने के साथ अपनापन था. मेरे जीवन के लगभग 19 साल मुझसे छीन लिये गये और घर वापसी उन खोये हुए सालों को वापस नहीं ला सकती. मैं किसी अजनबी या मेहमान की तरह नहीं लौट रही हूं. मैं एक ऐसी इंसान के तौर पर लौट रही हूं, जिसने हमेशा खुद को बंगाल का ही हिस्सा माना है. मेरे दिल में बंगाल कभी भी किसी सीमा या कंटीले तार की बाड़ से बंटा नहीं रहा. बंगाल के पूर्वी हिस्से का दरवाजा मेरे लिए बंद है, इसलिए अभी के लिए बंगाल का यही हिस्सा मेरा घर है. -तसलीमा नसरीन, लेखिका‘मैंने अपनी मर्जी से कोलकाता नहीं छोड़ा’नसरीन ने कहा कि उन्होंने कभी अपनी मर्जी से कोलकाता नहीं छोड़ा. उन्हें हमेशा उम्मीद थी कि वह एक दिन वापस आयेंगीं. उन्होंने कहा- उस समय की पश्चिम बंगाल सरकार ने मुझे राज्य छोड़ने पर मजबूर किया था. अपनी वापसी को सिर्फ घर लौटने से कहीं अधिक बताते हुए, उन्होंने कहा कि यह एक लेखक के आजादी से बोलने के अधिकार के लिए एक बड़े संघर्ष का प्रतीक है.ये भी पढ़ें: तस्लीमा नसरीन ने ट्विटर पर डाली अपने ब्वॉयफ्रेंड की तसवीरतसलीमा को अवास्तविक लगता है कोलकाता लौटनानसरीन ने कहा कि लगभग 19 साल बाद लौटना और कोलकाता के बीचों-बीच सार्वजिनक रूप से बोलना लगभग अवास्तविक लगता है. मेरे लिए, यह एक ऐसी आवाज की वापसी का प्रतीक है, जिसे कट्टरपंथियों ने कभी चुप कराने की कोशिश की थी. उस मंच पर मेरी मौजूदगी इस बात की पुष्टि करेगी कि धमकियां और फतवे किसी लेखक को कुछ समय के लिए देश से बाहर (निर्वासित) कर सकते हैं, लेकिन वे उसके विचारों को मिटा नहीं सकते.युवा पाठकों और लेखकों से मेरा संदेश यही होगा- हर चीज पर सवाल उठाओ. धर्म, परंपरा, सत्ता, राजनीति और यहां तक कि उन विचारों पर भी सवाल उठाओ, जिन्हें तुम सबसे अधिक पसंद करते हो. किसी और के पूर्वाग्रहों को अपनाकर उन्हें अपनी पक्की राय मत समझो. -तसलीमा नसरीनबंगाल वापसी से उत्साहित हैं ‘द्विखंडितो’ की लेखिकालेखिका ने कहा कि वापसी के आमंत्रण को वह एक उत्साहजनक संकेत मानती हैं. उन्होंने अपनी यात्रा को संभव बनाने के लिए आयोजकों और सरकार का आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा- मैं निश्चित रूप से अपनी वापसी को एक उत्साहजनक संकेत मानती हूं. मैं उन आयोजकों की आभारी हूं, जिन्होंने इसे संभव बनाया और सुरक्षा देने के लिए सरकार की भी शुक्रगुजार हूं. मैं मुख्यमंत्री अधिकारी की उस इच्छा की बहुत सराहना करती हूं, जिसके तहत उन्होंने एक अलग राय रखने वाले लेखक की आजादी का सम्मान और सुरक्षा करने का फैसला किया, भले ही वह लेखक की हर बात से सहमत न हों.नसरीन ने बताया- क्या हो अभिव्यक्ति की आजादी का पैमानानसरीन ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का असली पैमाना उन विचारों की रक्षा करने की क्षमता है, जो शायद लोकप्रिय न हों या असहज करने वाले हों. एक लेखक की स्वतंत्रता और सुरक्षा किसी सरकार की उदारता, किसी राजनीतिक दल की विचारधारा या किसी धार्मिक समूह की अनुमति पर निर्भर नहीं होनी चाहिए. उनकी रक्षा मौलिक अधिकारों के रूप में की जानी चाहिए.भारत की उदारता से प्रभावित हैं नसरीननसरीन ने कहा- भले ही मैं भारत की नागरिक नहीं हूं, लेकिन मैं उस देश की उदारता से बहुत प्रभावित हूं, जिसने मुझ जैसी सतायी गयी लेखक को शरण दी है. मुझे दिये गये समर्थन और सुरक्षा के लिए मैं पश्चिम बंगाल की मौजूदा सरकार की तहे दिल से शुक्रगुजार हूं. नसरीन ने कहा कि प्रौद्योगिकी ने लेखकों के लिए मौके तो बढ़ाये हैं, लेकिन साथ ही डराने-धमकाने के नये तरीके भी दिये हैं.टेक्नोलॉजी और बांग्लादेश पर तसलीमा के विचारप्रौद्योगिकी ने लेखकों को अपनी बात कहने के कई और तरीके दिये हैं, लेकिन इसने संगठित समूहों को भी उन्हें धमकाने, परेशान करने और चुप कराने के भी कई और तरीके दिये हैं.बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष सोच, धार्मिक आलोचना और ईमानदार बौद्धिक बहस की गुंजाइश खतरनाक रूप से कम हो गयी है.बांग्लादेश में स्वतंत्र विचारकों की हत्या की गयी है, उन्हें जेल में डाला गया है, छिपने पर मजबूर किया गया है या देश छोड़ने पर मजबूर किया गया है.बांग्लादेश जैसे देश में भय अब अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगाने का एक जरिया बन गया है.दक्षिण एशिया में जटिल हुईं चुनौतियांलंबे समय से धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ व महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाती रहीं तसलीमा नसरीन ने कहा कि दक्षिण एशिया के सामने चुनौतियां और जटिल हो गयीं हैं. धार्मिक कट्टरपंथ को नयी राजनीतिक ताकत और प्रचार के आधुनिक तरीके मिल गये हैं. धर्म, संस्कृति, परिवार की इज्जत और परंपरा के नाम पर आज भी महिलाओं को नियंत्रित किया जाता है. जो लोग कट्टरपंथ का विरोध करते हैं, उन पर अक्सर पूरे समुदाय का विरोध करने का झूठा आरोप लगाया जाता है.युवा पीढ़ी को लेकर आशान्वित हैं नसरीनतसलीमा नसरीन ने कहा कि वह आशान्वित रही हैं, क्योंकि युवा पीढ़ी असमानता और पुरानी मान्यताओं को चुनौती देती रहती है. उन्होंने कहा- मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है. अधिकतर युवा खासकर महिलाएं, पुरानी मान्यताओं पर सवाल उठा रही हैं और असमानता को अपनी किस्मत मानने से इनकार कर रही हैं. सामाजिक प्रगति कभी भी सीधी रेखा में नहीं चलती, हर प्रगति के साथ विरोध भी होता है. मैं इसलिए आशावादी नहीं हूं कि मुझे लगता है कि प्रगति निश्चित है. मैं इसलिए आशावादी हूं, क्योंकि लोग इसके लिए लड़ते रहते हैं. चुप्पी हार की गारंटी है, विरोध बदलाव को संभव बनाता है.