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'हिंदी बेल्ट' की संकल्पना को विस्तार देने के लिए केरल में आयोजित हुई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

Updated at : 12 Dec 2024 6:10 PM (IST)
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राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्‌घाटन करते हुए प्रो रवि भूषण

Hindi Literature : हिंदी भाषा और साहित्य का प्रचार-प्रसार कुछ भूले-बिसरे गिरमिटिया द्वारा भी होता है. भारत में गिरमिटिया साहित्य को लेकर केरल के सेंट पीटर्स कॉलेज में ही पहली बार एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी हुई. भारत से बाहर काम करने या अन्य कारणों से अस्थाई रूप से गए देश से बाहर गए हुए लोगों का साहित्य प्रवासी साहित्य है.

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Hindi Literature :’हिंदी बेल्ट’ की संकल्पना का विस्तार करते हुए, ‘अहिंदी भाषी के प्रयोग को गलत साबित करते हुए केरल के सेंट पीटर्स कॉलेज में तीन दिसंबर को एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और 4, 5, 6 दिसंबर को तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. राष्ट्रीय संगोष्ठी महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टयम के छात्र सेवा विभाग के सहयोग से और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी भारत सरकार के भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के सहयोग से आयोजित हुई. 

दोनों संगोष्ठियां भारतीय लोकतंत्र पर आधारित थीं. ‘भारतीय लोकतंत्र और साहित्य: हिंदी और मलयालम साहित्य का संदर्भ’  राष्ट्रीय संगोष्ठी का और ‘भारतीय गिरमिटिया और आदिवासी साहित्यः लोकतांत्रिक संवाद और सांस्कृतिक पहचान’ अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय रहा. संविधान लागू होने के इतने साल बाद उसकी यथार्थ स्थिति को परखना दोनों संगोष्ठियों का लक्ष्य था.

1964 से दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जा रही है हिंदी

ईसा मसीह के शिष्य सेंट पीटर के नाम पर स्थापित सेंट पीटर्स महाविद्यालय की स्थापना 1964 में हुई थी. कोलेंचेरी एक छोटा शहर है, जहां एक मेडिकल कॉलेज है, निकटवर्ती प्रदेशों में इंजीनिरिंग, डेंटल कॉलेजों के साथ-साथ कई उच्च माध्यमिक महाविद्यालय भी हैं, जो इस बात का साक्षी है कि इस इलाके में शिक्षा को कितना महत्व दिया गया था. कोलेंचेरी शहर के मध्य में ही स्थित इस महाविद्यालय में कई विषयों पर शोध कार्य चल रहा है. इस विश्व विद्यालय में हिंदी 1964 से दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जाती थी. विभाग के प्राध्यापकों के उत्साह से छ दिसंबर 1999 को यहां स्नातक स्तर पर मुख्य भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाने की अनुमति मिल गई. 2024 हिंदी विभाग की रजत जयंती का साल है. रजत जयंती के सिलसिले में राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन हुआ.  यहा के हिंदी विभाग ने देश-विदेश के कई हिंदी प्रेमियों और विद्वानों के सहयोग से कोरोना काल में लगातार वेब गोष्ठियां आयोजित की थीं. छात्रों में स्नातक स्तर से ही हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति रुचि पैदा करने में इन संगोष्ठियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

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एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन रांची विश्वविद्यालय के भूतपूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो रवि भूषण ने किया. उद्घाटन भाषण में प्रो रवि भूषण जी ने ‘भारतीय साहित्य और भारतीय लोकतंत्र पर अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए. हिंदी और मलयालम साहित्य को लेकर ‘साहित्य की लोकतांत्रिक उन्मुखताएं विषय पर महत्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्रति कुलपति प्रोए अरविंदाक्षन ने मुख्य भाषण दिया. हिंदी और मलयालम साहित्य में लोकतंत्र की स्थितियों पर चर्चाएं हुईं. भारतीय लोकतंत्र, वंचित समाज और हिंदी कविता, कविता का लोकतंत्रीय पाठ, मलयालम कविता की प्रतिपक्षधर्मिता और भारतीय लोकतंत्र और साहित्य मैं महिलाओं की भूमिका विषयों पर भाषण भी हुआ. 

गिरमिटिया साहित्य ने भी किया हिंदी का विस्तार

गिरमिटिया साहित्य पर संगोष्ठी का आयोजन

हिंदी भाषा और साहित्य का प्रचार-प्रसार कुछ भूले-बिसरे गिरमिटिया द्वारा भी होता है. भारत में गिरमिटिया साहित्य को लेकर केरल के सेंट पीटर्स कॉलेज में ही पहली बार एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई. भारत से बाहर काम करने या अन्य कारणों से अस्थाई रूप से गए देश से बाहर गए हुए लोगों का साहित्य प्रवासी साहित्य है. अस्थाई स्थानांतरण ‘प्रवासी’ है, जबकि स्थाई स्थानांतरण ‘अप्रवासी’ है. 12 वीं, 20 वीं शताब्दी में अनुबंधित श्रमिक के रूप में भारत से उपनिवेशों में ले जाए गए लोगों को ही गिरमिटिया’ कहा जाता है. अनुज लुगुन की कविता ‘अघोषित उलगुलान’ की पंक्तियों हैं ‘दांडू जाए तो कहाँ जाए / कटते जंगल में/ या बढ़ते जंगल में… ?’

गिरमिटिया लोग न कटते जंगल में रह सके हैं, जहां उनका सहारा खतम हो रहा है, और न बढ़ते जंगल में, जहां वे अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं. इन दोनों स्थितियों की वजह से गिरमिटिया और आदिवासी साहित्य पर चर्चा करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय चुन लिया गया. ‘आधुनिकता के संदर्भ में अप्रवासी साहित्य पर विचार रखते हुए रेडियो बर्लिन इंटर्नेशनल, जर्मनी के भूतपूर्व वरिष्ठ संपादक  उज्ज्वल कुमार भट्टाचार्य ने इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन किया. ‘इस कार्यक्रम में सभी इस बात पर एकमत हुए कि अहिंदी कोई नहीं है. हर क्षेत्र की अपनी भाषा और साहित्य है और सबका अपना महत्व है. कोई मुख्यधारा का साहित्य नहीं है. भारत को अखंड बनाने में सबका अपना महत्व है.

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