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धर्मवीर भारती के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी दो कविताएं

Updated at : 25 Dec 2017 11:46 AM (IST)
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धर्मवीर भारती के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी दो कविताएं

धर्मवीर भारती को आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि और नाटककार थे. वे धर्मयुग के प्रधान संपादक भी रहे थे. उन्होंने ‘गुनाहों का देवता’, सूरज का सातवां घोड़ा, अंधा युग को रचा, ‘कनुप्रिया’ भी उन्हीं की रचना है. धर्मवीर भारती अद्‌भुत रचनाकार थे. उन्होंने विचारोत्तेजक कविताएं लिखीं, तो श्रृंगारिक रचनाएं भी आज इनके जन्मदिन […]

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धर्मवीर भारती को आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि और नाटककार थे. वे धर्मयुग के प्रधान संपादक भी रहे थे. उन्होंने ‘गुनाहों का देवता’, सूरज का सातवां घोड़ा, अंधा युग को रचा, ‘कनुप्रिया’ भी उन्हीं की रचना है. धर्मवीर भारती अद्‌भुत रचनाकार थे. उन्होंने विचारोत्तेजक कविताएं लिखीं, तो श्रृंगारिक रचनाएं भी आज इनके जन्मदिन पर पढ़ें इनकी दो कविताएं –

मुनादी
ख़लक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का…
हर ख़ासो–आम को आगह किया जाता है कि
ख़बरदार रहें
और अपने अपने किवाड़ों को अंदर से
कुंडी चढ़ा कर बंद कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी
अपनी कांपती कमज़ोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है!
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले अहसान फ़रामोशो!
क्या तुम भूल गये कि
बाश्शा ने एक खूबसूरत महौल दिया है जहां
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नज़र आते हैं
और फुटपाथों पर फ़रिश्तों के पंख रात–भर
तुम पर छांह किये रहते हैं?
तुम्हें इस बुद्ढे के पीछे दौड़ कर
भला और क्या हासिल होने वाला है?
आखिर क्या दुशमनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भले मानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठ–बैठे मुल्क की भलाई के लिये
रात–रात जागते हैं
और गांव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकिया, लंदन की ख़ाक
छानते फ़कीरों की तरह भटकते रहते हैं.
तोड़ दिये जाएंगे पैर
और फोड़ दी जाएंगी आंखें
अगर तुमने अपने पांव चल कर
महल–सरा की चहारदीवारी फलांग कर
अंदर झांकने की कोशिश की!
नासमझ बच्चों नें पटक दिये पोथियां और बस्ते
फैंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर–फरद भागते चले आ रहे हैं.
खबरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहां हो वहीं रहो
यह बग़ावत नहीं बरदाश्त की जायेगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुंचो.
केलिसखी (कनुप्रिया)
आज की रात
हर दिशा में अभिसार के संकेत क्यों हैं?
हवा के हर झोंके का स्पर्श
सारे तन को झनझना क्यों जाता है?
और यह क्यों लगता है
कि यदि और कोई नहीं तो
यह दिगन्त-व्यापी अँधेरा ही
मेरे शिथिल अधखुले गुलाब-तन को
पी जाने के लिए तत्पर है
और ऐसा क्यों भान होने लगा है
कि मेरे ये पांव, माथा, पलकें, होंठ
मेरे अंग-अंग – जैसे मेरे नहीं हैं-
मेरे वश में नहीं हैं-बेबस
एक-एक घूंट की तरह
अंधियारे में उतरते जा रहे हैं
खोते जा रहे हैं
मिटते जा रहे हैं
और भय,
आदिम भय, तर्कहीन, कारणहीन भय जो
मुझे तुमसे दूर ले गया था, बहुत दूर-
क्या इसी लिए कि मुझे
दुगुने आवेग से तुम्हारे पास लौटा लावे
और क्या यह भय की ही कांपती उंगलियां हैं
जो मेरे एक-एक बन्धन को शिथिल
करती जा रही हैं
और मैं कुछ कह नहीं पाती!
मेरे अधखुले होठ कांपने लगे हैं
और कण्ठ सूख रहा है
और पलकें आधी मुंद गयी हैं
और सारे जिस्म में जैसे प्राण नहीं हैं
मैंने कस कर तुम्हें जकड़ लिया है
और जकड़ती जा रही हूं
और निकट, और निकट
कि तुम्हारी सांसें मुझमें प्रविष्ट हो जायें
तुम्हारे प्राण मुझमें प्रतिष्ठित हो जायें
तुम्हारा रक्त मेरी मृतपाय शिराओं में प्रवाहित होकर
फिर से जीवन संचरित कर सके-
और यह मेरा कसाव निर्मम है
और अन्धा, और उन्माद भरा; और मेरी बांहें
नागवधू की गुंजलक की भांति
कसती जा रही हैं
और तुम्हारे कन्धों पर, बांहों पर, होठों पर
नागवधू की शुभ्र दन्त-पंक्तियों के नीले-नीले चिह्न
उभर आये हैं
और तुम व्याकुल हो उठे हो
धूप में कसे
अथाह समुद्र की उत्ताल, विक्षुब्ध
हहराती लहरों के निर्मम थपेड़ों से-
छोटे-से प्रवाल-द्वीप की तरह
बेचैन-
उठो मेरे प्राण
और कांपते हाथों से यह वातायन बंद कर दो
यह बाहर फैला-फैला समुद्र मेरा है
पर आज मैं उधर नहीं देखना चाहती
यह प्रगाढ़ अँधेरे के कण्ठ में झूमती
ग्रहों-उपग्रहों और नक्षत्रों की
ज्योतिर्माला मैं ही हूँ
और अंख्य ब्रह्माण्डों का
दिशाओं का, समय का
अनन्त प्रवाह मैं ही हूँ
पर आज मैं अपने को भूल जाना चाहती हूँ
उठो और वातायन बन्द कर दो
कि आज अंधेरे में भी दृष्टियां जाग उठी हैं
और हवा का आघात भी मांसल हो उठा है
और मैं अपने से ही भयभीत हूं
लो मेरे असमंजस!
अब मैं उन्मुक्त हूं
और मेरे नयन अब नयन नहीं हैं
प्रतीक्षा के क्षण हैं
और मेरी बांहें, बांहें नहीं हैं
पगडण्डियां हैं
और मेरा यह सारा
हलका गुलाबी, गोरा, रुपहली
धूप-छांव वाला सीपी जैसा जिस्म
अब जिस्म नहीं-
सिर्फ एक पुकार है
उठो मेरे उत्तर!
और पट बन्द कर दो
और कह दो इस समुद्र से
कि इसकी उत्ताल लहरें द्वार से टकरा कर लौट जाएं
और कह दो दिशाओं से
कि वे हमारे कसाव में आज
घुल जाएं
और कह दो समय के अचूक धनुर्धर से
कि अपने शायक उतार कर
तरकस में रख ले
और तोड़ दे अपना धनुष
और अपने पंख समेट कर द्वार पर चुपचाप
प्रतीक्षा करे-
जब तक मैं
अपनी प्रगाढ़ केलिकथा का अस्थायी विराम चिह्न
अपने अधरों से
तुम्हारे वक्ष पर लिख कर, थक कर
शैथिल्य की बाँहों में
डूब न जाऊं…..
आओ मेरे अधैर्य!
दिशाएँ घुल गयी हैं
जगत् लीन हो चुका है
समय मेरे अलक-पाश में बँध चुका है.
और इस निखिल सृष्टि के
अपार विस्तार में
तुम्हारे साथ मैं हूं – केवल मैं-
तुम्हारी अंतरंग केलिसखी!
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