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Women Safety in India : ‘निर्भया’ का केस लड़ने वाली वकील सीमा ने कहा- बेटियों के लिए बेटों को पढ़ाना होगा

Updated at : 08 Sep 2024 12:44 PM (IST)
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special message from lawyer who fought Nirbhaya case

99 अपराधी छूट जायें, पर एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए, ये युक्ति अब पुरानी हो चुकी है. अपनी जांच एजेंसियों को इतना ट्रांसपेरेंस, टेक्निकल, इंटेलिजेंट बनाओ कि ना तो 99 अपराधी छूट पायें और ना ही किसी निर्दोष को सजा हो. घिसी -पिटी बातों से आगे सोचने की जरूरत है.

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women safety in india : पिछले दिनों कोलकाता में हुए अभया कांड के बाद से देश भर में उबाल है. हमने जगह-जगह धरना-प्रदर्शन देखा, जो अब भी जारी है. कुछ दिनों बाद शायद सबकुछ शांत हो जाये और फिर हम सब इस घटनाक्रम को भूल भी जायें, मगर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इसी चुप्पी के बीच फिर एक घटना की स्क्रिप्ट कोई लिख रहा होगा! सवाल है कि इन सबमें हम कितने दोषी हैं? आखिर खामियां कहां रह जा रही हैं? ऐसा फिर ना हो, इसमें हमारी भूमिका क्या होनी चाहिए? इन्हीं मुद्दों पर प्रखर नारीवादी, एक्टिविस्ट व सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील सीमा समृद्धि कुशवाहा से रजनीकांत पांडेय ने विशेष बातचीत की.

महिला सुरक्षा को लेकर पिछले दिनों पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ‘अपराजिता वीमेन एंड चाइल्ड बिल 2024’ लाया गया. इसे आप कितना प्रभावी मानती हैं?

ऐसे कानून तो हमारे पास पहले से हैं. यह नया बिल उनका संशोधन मात्र है. अभी इसे कानून बनने में कई अड़चनों को पार करना होगा. देखिए सिर्फ कानून बनाने से कुछ नहीं होता. कानून सख्त किये गये हैं किताबों में, लेकिन क्रिमनल माइंडसेट के लोगों को कैसे पता चलेगा कि वाकई कानून बहुत सख्त है. उन्हें तभी पता चलेगा जब कन्विक्शन रेट (दोषसिद्धि) बढ़ेगा. एनसीआरबी का डेटा कहता है कि 28 -30 फीसदी से ज्यादा कन्विक्शन रेट कभी नहीं गया. फिर इतनी बड़ी आबादी में जो बाकी अपराधी हैं, वे या तो बेल पर बाहर हैं या अंडर ट्रायल हैं, जेल में हैं. जो बेल पर हैं, वे समाज व पीड़ित के बीच में हैं. इससे जनसाधारण में ये संदेश दे रहे हैं कि कानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. यानी इनके अंदर किसी प्रकार का भय नहीं है. अगर यही कन्विक्शन रेट सौ फीसदी हो जाये, तो कोई भी अपराधी बचेगा नहीं. इससे लोगों में लॉ एंड ऑर्डर के प्रति डर होगा. कोई क्राइम करने से पहले सौ बार सोचेगा. एनसीआरबी का डेटा कहता है कि 2012 से पहले हर साल रेप के 25 हजार मामले एवरेज आते थे, जो 2016 में 39 हजार तक गया. जबकि 2012 में पॉक्सो एक्ट लाया गया, जिसमें पहले मौत की सजा नहीं थी. 2019 में संशोधन कर फांसी की सजा का प्रावधान किया गया. फिर भी देखिए कि रेप के मामले थम नहीं रहे. यानी आप कितना भी कानून बना लें, वे किताबों में ही रहेंगे, जब तक कि सख्ती से उनका अनुपालन न किया जाये.

भारत के नीति-निर्माताओं ने ये परिकल्पना की थी कि दोषी भले छूट जाये, पर निर्दोष को सजा न हो. कन्विक्शन रेट बढ़ाने में कहीं ये सोच बाधा तो नहीं?

मैं इस बात से पूरी तरह से इत्तेफाक रखती हूं कि निर्दोष को सजा न हो, लेकिन ये पूरी जिम्मेवारी तो संबंधित एजेंसी की है कि किसी मामले में वे त्वरित और सटीक कार्रवाई करे, दूध का दूध और पानी का पानी करे. अगर हमारी जांच एजेंसियां पूरी पारदर्शिता और सही तकनीकी तरीके से केस को कोर्ट में पेश करे, तो फिर निर्दोष को कैसे सजा हो जायेगी. अब अगर 99 फीसदी अपराधी इस वजह से छूट रहे हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां सही तरीके और समय पर काम नहीं कर पा रही हैं. कहीं न कहीं जांच में लूप होल रह जा रहा है.
अगर अभया केस (कोलकाता रेप व हत्याकांड) की बात करें, जो कोलकाता में उसके साथ हुआ, तो इसमें क्राइम सीन 14 घंटे तक कवर नहीं हुआ, क्योंकि जब तक एफआइआर नहीं होगी तब तक पुलिस कार्रवाई नहीं होगी. यहां जिम्मेवारी संबंधित विभाग व एजेंसी की है. ऐसी स्थिति में सबूत मिटाने के लिए अपराधी के पास पर्याप्त समय था. अब सबूत नहीं मिलने से अपराधी को निर्दोष मान लिया जायेगा. यहां फेल्योर जांच एजेंसी है.
रिपोर्ट बताती है कि 2022 के आखिर तक देशभर की अदालतों में रेप के लगभग दो लाख मामले लंबित थे. 2022 में इनमें से साढ़े 18 हजार मामलों में ही ट्रायल पूरा हुआ. इनमें भी 5 हजार मामलों में ही दोषी को सजा दी गयी. जबकि 12 हजार से ज्यादा मामलों में आरोपी बरी हो गये. मेरा ये कहना है कि 99 फीसदी अपराधी भी क्यों छूटें और एक भी निर्दोष को सजा क्यों हो? अगर आपके पास ट्रांसपेरेंसी, सही टेक्नोलॉजी, पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर आदि सारी चीजें होंगी, तो यकीनन ऐसा नहीं होगा. सरकार को चाहिए कि इन चीजों को दुरुस्त करे. मैं हमेशा जोर देती आयी हूं कि #ज्यूडिशियल रिफॉर्म# बहुत जरूरी है.

कन्विक्शन रेट कम होने की मुख्य वजह आप क्या मानती हैं?

कन्विक्शन रेट इसलिए कम है, क्योंकि बहुत सारे केसेज में जिन्हें डेथ पेनेल्टी दी गयी, लेकिन उसे एग्जीक्यूट नहीं किया गया, क्योंकि उसकी प्रक्रिया ही बहुत अलग और जटिल है. इसमें पूरी तरह राज्य सरकार की लापरवाही है. कई मामलों में मैंने देखा है कि पुलिस को खुद नहीं पता होता कि है कि ट्रायल कोर्ट से अगर फांसी की सजा सुना दी गयी है, हाइकोर्ट ने कंफर्म कर दिया तो, तो मैटर सुप्रीम कोर्ट में गया या नहीं, आगे क्या प्रोसीजर है, जेल मैन्यूअल क्या कहता है, सीआरपीसी क्या कहती है. ये मैंने निर्भया केस में भी फेस किया है. यहां बताना चाहूंगी कि जब सुप्रीम कोर्ट ने इसमें सभी अपराधियों की रिव्यू पिटीशन रिजेक्ट कर दी थी और उनके डेथ पैनल्टी को बरकरार रखा, तो मैं ट्रायल कोर्ट गयी, क्योंकि ट्रायल कोर्ट को ही इसे एग्जीक्यूट करने का अधिकार है. तब कहा गया कि ”नहीं-नहीं अभी तो इनकी मर्सी पिटीशन बाकी है, और भी कई प्रक्रिया में वे जा सकते हैं”. जबकि प्रोविजन ये है कि अगर उनकी कोई भी पिटीशन बाकी है और कहीं भी फाइल नहीं किया है या पेंडिंग नहीं है, तो कोर्ट एग्जीक्यूशन का ऑर्डर जारी कर देगी. यानी सजा देने की तारीख तय हो जायेगी. हमलोगों ने देखा कि साल 2006 के निठारी सीरियल हत्याकांड मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा सुरेंद्र कोली व मनिंदर सिंह पंढेर को बरी कर दिया गया था. उन्हें इस ग्राउंड पर बेनिफिट ऑफ डाउट मिला कि सीबीआइ ने जो जांच की थी, उसमें बहुत सारी खामियां थीं, गलत तथ्यों की भरमार थीं. जबकि सच ये है कि अपराध हुआ और ये लोग संदेह में पाये गये. वे जेल भी गये, मगर फिर छोड़ दिया गया. फिर इस पूरे प्रकरण में अपराधी कौन हुआ? तो वो सीबीआइ थी, जो मामले में फेल्योर रही. कोर्ट में सबूत, संबंधित तथ्यों को आरोपी से कड़ी दर कड़ी जोड़ने में वह नाकाम रही. ये पूरी तरह हमारे सिस्टम की नाकामी है, जो ‘अपराधी’ को अपराधी साबित नहीं कर पा रही है. तो क्या इन मामलों से देश के अपराधियों में ये संदेश नहीं जा रहा कि ‘ये कानून हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है’? यहां सवाल ये भी है कि देश की 140 करोड़ आबादी है, मगर उस अनुसार क्या हमारे पास कोर्ट हैं, डीएनए सैंपल की जांच के लिए पर्याप्त लैब, संसाधन हैं, पुलिस की संख्या बल है? इन चीजों को दुरुस्त किये बगैर न कोई कानून प्रभावी हो सकता है और न ही कन्विक्शन रेट बढ़ सकता है.

निर्भया से लेकर अभया तक कुछ नहीं बदला. अपराध होने पर, अपराधी को सजा देने से बेटियों को न्याय नहीं मिल जाता. बेटियों के साथ न्याय तब होगा जब वो सुरक्षित होंगी, आजाद होंगी, बेबाक होंगी, सशक्त होंगी. और जिस दिन वो पितृसत्तात्मक समाज की धज्जियां उड़ा देंगी, उस दिन से जानवर, बच्चे, स्त्रियां, प्रकृति सब सुरक्षित हो जायेंगे.

– सीमा समृद्धि कुशवाहा, (दिल्ली के निर्भया कांड में चार दोषियों को फांसी की सजा दिलवाने वाली सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील)

पैरेंटिंग में आप कहां सुधार की बड़ी गुंजाइश देखती हैं?

बचपन में किसी को जैसा माहौल मिलता है, उसी अनुसार वह जवानी तक ढलता जाता है. ह्यूमन माइंड एक पैटर्न रिकग्नाइजर है. हम चीजें देखते हैं और उन्हें नियम मान लेते हैं. बच्चा अपने माता-पिता को घर में हिंसा के जिस माहौल में देखता है, वह मान लेता है कि यह हर घर, हर स्थान पर होता है. वह इसी परिवार, समाज और परिवेश से ही सीख कर बड़ा होता है. अगर बच्चा देख रहा है कि घर में पापा उसकी मम्मी पर कभी भी हाथ उठा सकता है, किसी के साथ वर्कप्लेस पर कुछ भी आसानी से किया जा सकता है, तो वह हमसे क्या सीख रहा है. यहां तक कि बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ भी महिलाओं के प्रति ऐसे-ऐसे बयान दे रहे हैं, ऐसी गंदी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, जो बेहद शर्मनाक हैं. उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिज्ञ द्वारा एक मशहूर अभिनेत्री के बारे में क्या-क्या नहीं बोला गया! अब सोचिए कि उन्हें फॉलो करने वाला इंसान किसी महिला के प्रति क्या माइंडसेट रखेगा? जो आदमी अपनी पत्नी को घर से बाहर नहीं निकलने देना चाहता, कहता कि ‘तुम घर में रहो, तुम घर की लक्ष्मी हो, तुम्हें घर संभालना है…’ तो फिर क्यों कहा जाता है कि ‘महिलाओं को सशक्त बनाना है. वो तो देश भी संभाल लेंगी. वो आइएएस भी बनेंगी, डॉक्टर-इंजीनियर भी बनेंगी’. फिर जब ये महिलाएं बाहर निकलेंगी, तो उन्हें जिस पुरुष समाज को स्वीकार करना है, उन्हें हमने इसकी ट्रेनिंग ही नहीं दी. कभी-कभी लगता है कि सरकार की पॉलिसी और जो कानून हैं, उनमें कोई तारतम्यता ही नहीं.

बेटियों को लेकर हर माता-पिता की चिंता कैसे दूर हो?

परिवार, समाज में हमें बच्चों की परवरिश में ये ध्यान देना होगा कि ‘बेटा जितना तुम्हारा अधिकार है, उतना ही किसी और की घर की बेटी को भी है’. ऐसा नहीं कि आपकी बेटी घर से बाहर निकल रही है, तो उसकी चिंता ही आपको हो. अगर किसी और की बेटी भी घर से बाहर निकल रही है, तो उसकी चिंता भी होनी चाहिए कि वो भी सुरक्षित हो. इस बात को हर घर के बेटे को इंश्योर करनी होगी. इसमें माता-पिता की बड़ी भूमिका है. अगर बेटा कहीं जा रहा है, तो यह पूछकर निश्चिंत हो जाते हैं कि कब आओगे? जबकि ये चिंता नहीं होती कि किसी और की बेटी के साथ कुछ गलत तो नहीं कर रहा, किसी के साथ छेड़खानी तो नहीं करेगा! और हम बेटियों को कह रहे हैं, ‘जल्दी घर आ जाना, बाहर का माहौल खराब है’. हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि अगर हमारा बेटा रात में बाहर है, तो किसी और की बेटी उसके डर से घर में बंद न हो. ये हर घर में हर पुरुष को करना पड़ेगा, क्योंकि हर घर में एक स्त्री मौजूद है, चाहे वह मां हो, बहन या बेटी हो. ये लड़ाई बुराई के खिलाफ है, पुरुषों के खिलाफ नहीं है. इस लड़ाई को समाज में सभी लोगों को मिलकर लड़ना है. इसमें पुरुषों की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है कि वे आधी आबादी को सुरक्षित करें. अपनी आनेवाली पीढ़ी को भी इसी सोच के साथ विकसित करें. ये नहीं कि बेटे की गलती को इस तरह छुपायें कि ”अभी तो जवानी में कदम रखा है, ऐसी गलतियां हो जाती हैं”. सिर्फ कानून के भरोसे बदलाव नहीं आ सकता. इसकी शुरुआत हर घर से करनी होगी.

संक्षिप्त परिचय :
सीमा समृद्धि कुशवाहा प्रखर नारीवादी व सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील हैं. वे दिल्‍ली के निर्भया सामूहिक दुष्‍कर्म व हत्‍याकांड का मुकदमा लड़कर चर्चा में आयी थीं. निर्भया के न्याय के लिए हो रहे आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. सर्वोच्च न्यायालय में 2014 से वकालत की शुरुआत की. उसी साल 'निर्भया ज्योति ट्रस्ट' से बतौर कानूनी सलाहकार जुड़ीं. उत्तर प्रदेश के इटावा में 10 जनवरी, 1982 को जन्‍मीं सीमा ने साल 2005 में कानपुर विश्‍वविद्यालय से कानून में डिग्री ली, आगे राजर्षि टंडन खुला विश्‍वविद्यालय से पत्रकारिता में स्‍नातक किया. एमए करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू की. जिस वक्‍त निर्भया केस चर्चा में आया, सीमा प्रशिक्षु वकील थीं. इसी दौरान वे निर्भया मामले में वकील बनीं.

सेक्स एजुकेशन को लेकर तरह-तरह के तर्क दिये जाते हैं. आप इसे किस तरह से देखती हैं?

आज के समय में बहुत जरूरी है कि सभी बच्चों को सेक्स एजुकेशन दी जाये, तभी समाज में जागृति आयेगी. जर्नल ऑफ एडोलेसेंट हेल्थ में प्रकाशित एक स्टडी कहती है कि जिन अमेरिकी छात्रों ने यौन शिक्षा प्राप्त की थी, उनमें यौन उत्पीड़न की संभावना अपेक्षाकृत 56% कम थी, जिन्हें यौन शिक्षा नहीं दी गयी थी. अब हमारे पास एक ही विकल्प है, या तो यौन अपराधियों को बढ़ावा देते रहें या नयी पीढ़ी को सेक्स एजुकेशन के जरिये समानता, सुरक्षा और न्याय की शिक्षा देकर देश के लिए एक सुरक्षित भविष्य को आकार दें. देखिए, यौन अपराधी पैदा नहीं होते हैं, वे बनाये जाते हैं, जब हमारे सिस्टम में भारी कमी रह जाती है. हम हमेशा बेटियों के ही ड्रेसिंग सेंस पर टिप्पणी करते हैं. उन्हें सजने-संवरने को लेकर हिदायतें देते हैं, क्यों? क्या ये बातें बेटों में ये विश्वास नहीं भरतीं कि समाज में जो कुछ गलत है, वह महिलाओं से ही जुड़ा है. ऐसा नहीं कि सेक्स एजुकेशन को कोर्स में अनिवार्य रूप से शामिल करने के प्रयास नहीं किये गये, मगर कई राज्यों ने इसका विरोध भी किया है. यहां तक कि सिलेबस कंटेंट को बदल दिया है. कुछ स्कूलों ने तो कोर्स में ‘यौन’ शब्द को ‘किशोर’ से बदल दिया है. हमें इस माइंडसेट से बाहर आना होगा. बदलते समाज की बदलती जरूरत को मानना ही होगा.
बेटियों को बचाना है, तो बेटों को पढ़ाना होगा. उन्हें सही तालीम देनी होगी. उन्हें अच्छे संस्कार देने होंगे. बेटों को बताना होगा कि प्रेम-प्यार में भी किसी से जबरदस्ती न करे. अगर लड़की उसके प्रपोजल को ना कहती है, तो उसे स्वीकार करने आना चाहिए. जब शुरू से सेक्स एजुकेशन में उसे लैंगिग भेदभाव, सहित शारीरिक अंगों के बारे में सही जानकारी होगी, तो यकीनन उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. सेक्स एजुकेशन के जरिये हम ऐसी गलत धारणाओं, गलत प्रथाओं को तोड़ पाने में सफल होंगे. इन दिनों इंटरनेट पर पॉर्न फिल्मों, ओटीटी पर वेब सीरीज तक बच्चों, किशोरों की आसान पहुंच है. ऐसे में माता-पिता को कड़ाई से मॉनिटरिंग करनी होगी कि आपका बच्चा क्या देख रहा है. किन चीजों के संपर्क में है. सरकार को भी कड़ाई से इसका सही रेगुलेशन करना चाहिए, जो अभी नाकाफी है.

आप लंबे समय से ‘महिला सुरक्षा गारंटी अधिनियम’ बिल की वकालत करती रही हैं. इस बिल में क्या है?

मैं अपने ‘समृद्ध भारत ट्रस्ट’ संस्था के तहत छोटे-छोटे जागरुकता कार्यक्रम करती हूं. निर्भया केस के समय से ही हमलोग मांग कर रहे हैं कि सरकार ‘महिला सुरक्षा गारंटी अधिनियम’ बिल पास करे, ताकि महिलाओं व बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों को रोका जा सके. स्कूली स्तर से ही इसकी मॉनिटरिंग होगी. इसके तहत हर सरकार को महिलओं व बच्चों को उनकी सुरक्षा की गारंटी देनी होगी, साथ ही कानूनी मदद मुहैया करनी होगी, जिसके अभाव में गरीब व पीड़ित लोग तो कोर्ट-कचहरी तक पहुंच ही नहीं पाते. उनमें इस कानून के तहत न्याय मिलने की आस जगेगी. फिलहाल ‘निर्भया ज्योति ट्रस्ट’ के तहत पीड़ित महिलाओं को जरूरी मदद पहुंचाने की कोशिश हमलोग अपने स्तर से कर रहे हैं.

एक बेटी होने के नाते अपनी कामयाबी में अपने परिवार की भूमिका को कहां पाती हैं?

मेरे जीवन में पिताजी की बहुत बड़ी भूमिका रही है. वे गांव के प्रधान थे. बचपन से उनको सामाजिक कार्य करते देखा. वे हमेशा कहते थे कि ”हर बेटी को बेटों की तरह आगे बढ़ने का अधिकार है. अगर हमने जन्म लिया है, तो हमें अपने समाज को कुछ न कुछ देकर जाना चाहिए. किसी के साथ गलत हो रहा है, तो उसे सपोर्ट करना चाहिए”. इन्हीं माहौल में मैं बड़ी हुई, तो इन बातों का मुझ पर गहरा असर रहा. मेरे गांव (उगरपुर, इटावा जिला, उत्तर प्रदेश) में तो स्कूल ही नहीं था, कई किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल जाती थी. कक्षा-10 में दाखिला लेने वाली अपने गांव की पहली बेटी थी. आज खुशी है कि उस गांव में हर घर की बेटी पढ़ रही है. हालांकि आज भी मेरे गांव में स्कूल नहीं है और मेरी कोशिश है कि अपने गांव में एक अच्छा स्कूल खोल सकूं!

‘प्रभात खबर’ के जरिये अंत में यही कहना चाहूंगी कि बेटियों को किसी भी हाल में हिम्मत नहीं हारनी है. हम सिर्फ अपनी लड़ाई न लड़ें, दूसरों के लिए भी आगे आयें. जैसा कि बेटियां हर क्षेत्र में खुद को साबित करती आयी हैं. बेटों से कहूंगी कि महिलाओं का सम्मान करें. अपनी पत्नी, बहन को घर में कैद न रखें. आप उन्हें सशक्त बनायें. उन्हें ऐसा माहौल दें, जिसमें किसी भी बेटी को भय न हो, वो खुल कर जी सके. वो सपने देख सके कि मैं भी पिता और भाइयों की तरह राजनीति में आऊंगी, डॉक्टर-इंजीनियर बनूंगी. तब हमारा देश यकीनन वर्ल्ड इकोनॉमी में प्रथम बन जायेगा.

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Rajnikant Pandey

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By Rajnikant Pandey

Rajnikant Pandey is a contributor at Prabhat Khabar.

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