Potato Price : आलू की कीमत 40-50 रुपए प्रति किलो तक पहुंची, बंगाल को क्यों दोषी ठहरा रहे ओडिशा और झारखंड?

Edited by Rajneesh Anand
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परेशान कर रही है आलू की बढ़ती कीमत

Potato Crisis : भारत में आलू भले ही दक्षिण अमेरिका से आया हो, लेकिन इसका स्वाद भारतीयों की जीभ पर इस कदर चढ़ा है कि शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब रसोई में आलू ना पकाया जाता हो. दुनिया के तमाम देशों के बीच भारत आलू का चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है. लेकिन विगत कुछ महीनों से आलू की कीमत में बेहताशा वृद्धि हुई है. इस सीजन में जहां आलू की कीमत 15-20 रुपए प्रति किलो रहती थी, वो 40-50 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गयी है.

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Potato Price : आलू की बेतहाशा बढ़ती कीमतों की वजह से बंगाल सरकार से कई राज्य सरकारें नाराज दिख रही हैं, जिनमें झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं. ओडिशा सरकार ने तो सीधे तौर पर बंगाल की ममता सरकार पर निशाना साधा है और कहा है कि वे प्रदेश की बीजेपी सरकार को बदनाम करने के लिए आलू की नकली कमी की स्थिति उत्पन्न कर रही हैं. वहीं बंगाल सरकार की ओर से यह कहा गया है कि बंगाल के बाजारों में आलू की बढ़ती कीमत को नियंत्रित करने के लिए ही प्रदेश सरकार ने अन्य राज्यों को आलू नहीं देने का फैसला किया है. 

बंगाल सरकार के फैसले की वजह से झारखंड-बंगाल सीमा और ओडिशा-बंगाल सीमा पर कई ट्रकों को रोका गया और वहां से आलू को वापस भेज दिया गया. कई ट्रक अभी भी सीमा पर खड़े हैं, जिनमें आलू सड़ रहे हैं. क्या आलू का यह संकट महज दो विरोधी पार्टियों के बीच छिड़ा विवाद है, या इसके पीछे वजह कुछ और है? दरअसल ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों को आलू की आपूर्ति बंगाल से ही होती है, लेकिन बंगाल सरकार ने इन राज्यों को आलू देना बंद कर दिया है जिसकी वजह से यहां आलू का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है और कीमतें आसमान को छू रही हैं.

आलू का संकट क्यों उत्पन्न हुआ?

जनवरी 2024 से ही आलू की कीमत में तेजी

देश में आलू की कीमत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार आलू की कीमत में वृद्धि की शुरुआत इस साल के जनवरी महीने से ही हो गई थी और दिसंबर में स्थिति यह है कि 60 फीसदी तक आलू की कीमत में बढ़ोतरी हो गई है. आलू की कीमत में इजाफा क्यों हो रहा है यह जानने की कोशिश करने पर जो बात सबसे पहले सामने आती है वो है उत्पादन में कमी. 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार आलू के उत्पादन में वर्ष 2022-23 की तुलना में 5.6 प्रतिशत की गिरावट आई है. 2022-23 जहां आलू का उत्पादन 601 लाख मीट्रिक टन हुआ था, वह 2023-24 में घटकर 567 लाख मीट्रिक टन रह गया. चूंकि 2022-23 में आलू की कीमत कम रही थी इसलिए वर्तमान फसल वर्ष में किसानों ने इसकी खेती कम क्षेत्र में की थी, हालांकि क्षेत्र का यह अंतर बहुत अधिक नहीं था.

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भारत में आलू का उत्पादन कितना होता है?

सबसे लोकप्रिय सब्जी है आलू

विश्व के तमाम देशों में चीन के बाद भारत आलू का सबसे बड़ा उत्पादक है. आलू के उत्पादन में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है. सरकारी आंकड़ों की मानें तो 1991-92 से 2020-21 के बीच आलू की खेती 11 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 22 लाख हेक्टेयर में होने लगी है. वहीं उत्पादन में वृद्धि की बात करें तो इसमें तीन गुना वृद्धि हुई है. देश में आलू का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है और दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल है. ये दोनों राज्य मिलकर आधे देश में आलू की आपूर्ति करते हैं. 2022-23 से 2023-24 की तुलना करें तो दोनों ही राज्य में आलू के उत्पादन में कमी देखी गई है. उत्तर प्रदेश की अपेक्षा बंगाल में उत्पादन में ज्यादा कमी देखी गई. बंगाल में आलू का उत्पादन 15 लाख टन घटकर 130 लाख टन रह गया है. भारत में उत्तर प्रदेश और बंगाल के अतिरिक्त बिहार, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, असम, झारखंड और मध्यप्रदेश में भी आलू की खेती होती है, लेकिन इन राज्यों में जरूरत के हिसाब से उत्पादन कम होता है, जिसकी वजह से इन्हें यूपी और बंगाल की शरण लेनी पड़ती है.

आलू की कीमत का क्या है गणित?

आलू एक ऐसी सब्जी है, जिसकी कीमत मौसम के अनुसार बदलती रहती है. सर्दियों में आलू की कीमत कम होती होती है क्योंकि इस समय इसकी नई फसल बाजार में मौजूद रहती है, जबकि गर्मी और बारिश के मौसम में हमें स्टोरेज का आलू उपलब्ध होता है इसलिए उस वक्त कीमतें बढ़ जाती हैं. आलू के उत्पादन में कमी होने की वजह से पूरे देश में ही आलू की कीमत में वृद्धि नजर आ रही है. इस सप्ताह आलू की कीमत औसतन 38 रुपए किलो पूरे देश में देखी गई थी.

राज्यों के बीच जंग की वजह है राजनीतिक

झारखंड और ओडिशा में आलू की कीमत को लेकर जनता परेशान है. वहीं बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट कहा है कि वे पहले अपने राज्य में आलू की कमी को पूरा करेंगी, उसके बाद ही वे अन्य राज्यों को आलू उपलब्ध कराएंगी. उनके इस फैसले से झारखंड और ओडिशा में आलू की कमी हो गई है और वे बंगाल सरकार से आलू की मांग कर रही हैं, क्योंकि आलू एक ऐसी सब्जी है, जिसका प्रयोग खास और आम सभी रसोई में होता है. आलू की कीमत बढ़ने से सरकारों की प्रतिष्ठा पर भी आघात होता है. बस इसी वजह से सरकारें यह नहीं चाहती हैं कि आलू की कीमत बढ़े और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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