हार्वर्ड में Non-American की नो एंट्री, क्या सरकार के इस फैसले से बर्बाद हो जाएगा ऐतिहासिक संस्थान

Edited by Rajneesh Anand
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विदेशी छात्रों में डर और चिंता

Harvard University : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन में अमेरिका बदल रहा है. यही वजह है कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, जो विश्व के तीन सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय में गिना जाता है, वहां विदेशी छात्रों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया है. ट्रंप प्रशासन के हालिया फैसले से यहां दाखिला लेने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों को दूसरे स्कूलों में ट्रांसफर लेना होगा. भारत के छात्र भी ट्रंप प्रशासन के इस फैसले का शिकार हैं, उन्होंने अगर दूसरे विश्वविद्यालय में ट्रांसफर नहीं लिया तो उनका वीजा कैंसिल हो सकता है.

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Harvard University : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में विदेशियों का प्रवेश बंद करने का फैसला किया है. ट्रंप प्रशासन ने यह स्पष्ट आदेश दिया है कि विदेशियों को हार्वर्ड से अपना एडमिशन दूसरे स्कूल में कराना होगा, अन्यथा उन्हें अमेरिका में रहने की अनुमति नहीं मिलेगी. ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से पूरे देश में हड़कंप मच गया है. भारत के भी 800 स्टूडेंट वहां हैं और उनका भविष्य अधर में लटक गया है.

ट्रंप प्रशासन ने हार्वर्ड में विदेशी स्टूडेंट को प्रतिबंधित क्यों किया?

डोनाल्ड ट्रंप ने जब अमेरिका के राष्ट्रपति पद का शपथ दूसरी बार लिया तो उन्होंने अमेरिका फर्स्ट की नीति को सबसे ऊपर रखा. इसी नीति के तहत विदेशी स्टूडेंट्‌स को यहां से ट्रांसफर किया जा रहा है. दूसरी ओर यह भी बताया जा रहा है कि हार्वर्ड से विदेशी छात्रों को निकालने के पीछे राजनीतिक कारण भी हैं. अमेरिका की सुरक्षा एजेंसियां यह मान रही हैं कि हार्वर्ड में अमेरिका विरोधी नीतियां पनप रही हैं, जिसमें विदेशी छात्रों का भी योगदान है, इसलिए उन्हें यहां प्रवेश लेने से रोका जा रहा है. विश्वविद्यालय पर यह आरोप भी लगा है कि उसका संबंध चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से है, इसलिए भी हार्वर्ड में विदेशियों के प्रवेश को रोका जा रहा है, ताकि अमेरिका विरोधी गतिविधियां यहां से संचालित ना हों.

हार्वर्ड में है डर और चिंता का माहौल

हार्वर्ड में विदेशी छात्रों की संख्या बहुत अधिक होती है. ट्रंप प्रशासन के फैसले से उनके मन में डर और चिंता की भावना घर कर गई है. न्यूयार्क टाइम्स में छपी खबर के अनुसार जिन छात्रों ने अभी यहां अपना दाखिला लिया है या दूसरे वर्ष में हैं, उनके मन में सबकुछ बिखर जाने का डर समा गया है. वे अपने भविष्य को लेकर आतंकित हैं. अखबार का दावा है कि ट्रंप प्रशासन ने विश्वविद्यालय पर भर्ती और प्रवेश प्रक्रियाओं को बदलने के लिए दबाव डाला है, साथ ही पाठ्‌यक्रम को भी बदलने का दबाव है, जिसकी वजह से विश्वविद्यालय प्रबंधन और सरकार के बीच ठन गई है. विश्वविद्यालय ने नीतियां नहीं बदलने की बात कही, तो ट्रंप प्रशासन ने $2 बिलियन से अधिक का अनुदान रोक दिया, जिसके बाद, हार्वर्ड ने बोस्टन में संघीय न्यायालय में मुकदमा दायर किया. उसके बाद से प्रशासन ने विश्वविद्यालय के अनुसंधान निधि को समाप्त कर दिया है, बजट में भारी बदलाव कर दिया है और नीतियों को बदलने के लिए मजबूर किया है.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय पर क्या पड़ेगा प्रभाव

Harvard University No entry for non-Americans
हार्वर्ड में एक चौथाई विदेशी छात्र

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में कुल छात्रों में से एक चौथाई विदेशी छात्र हैं. पिछले कुछ सालों से विदेशी छात्रों की संख्या और बढ़ी है. अब अंतरराष्ट्रीय स्टूडेंट्‌स को यहां से हटाने पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी पर भी प्रभाव पड़ेगा. खासकर ग्रेजुएशन प्रोग्राम के तहत जिन्होंने दाखिला लिया है, उनके डिग्री पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा. न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार केनेडी स्कूल में 59 प्रतिशत छात्र संयुक्त राज्य अमेरिका के बाहर से आते हैं. टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में 40 प्रतिशत और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में 35 प्रतिशत दाखिला विदेशी छात्रों का है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि विदेशी छात्र अपनी शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय को भुगतान भी अधिक करते हैं, इसलिए इनका एडमिशन यहां से हटाने पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के इनकम पर भी प्रभाव पड़ेगा. साथ ही विभिन्न देशों से आने वाले छात्र विश्वविद्यालय की चर्चाओं को समृद्ध भी करते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्टूडेंट्‌स को विश्वविद्यालय से हटाने के मुद्दे पर लैटिन अमेरिकी इतिहास में विशेषज्ञता रखने वाली प्रोफेसर और अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटी प्रोफेसर्स के हार्वर्ड चैप्टर की अध्यक्ष कर्स्टन वेल्ड ने न्यूयार्क टाइम्स से कहा है कि यह नीति विश्वविद्यालय को नष्ट कर देगी. हार्वर्ड भले ही संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित है, लेकिन इसके छात्र और फैकल्टी दुनिया भर से आते हैं. यह संस्थान के काम और मिशन के लिए मौलिक है. आप इसे दूर नहीं कर सकते और एक संस्थान को खत्म नहीं होने दे सकते.

भारतीय छात्रों पर व्यापक प्रभाव

ट्रंप प्रशासन की नीतियों की वजह से हार्वर्ड में पढ़ रहे विदेशी छात्रों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा. हार्वर्ड में भारत और चीन के छात्र बड़ी संख्या में यहां अभी भारत के लगभग 800 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, जिनमें से 321 ने इस शैक्षणिक वर्ष में प्रवेश लिया है. इन छात्रों को अब एडमिशन अन्य विश्वविद्यालयों में ट्रांसफर करना होगा अन्यथा अमेरिका में रहने का अधिकार खोना होगा. कुछ समय पहले अमेरिका ने 1000 से अधिक भारतीय छात्रों का वीजा कैंसिल कर दिया था, इसलिए भारतीय छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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