Pitru Paksha: नदी-तालाब में तर्पण कर लोग पितरों को कर रहे याद, इस संकेत से समझे पितर आपसे नाराज है या खुश
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 19 Sep 2022 5:16 PM
Pitru Paksha 2022: पितृपक्ष में पितरों की पूजा होती है. जिससे पितर प्रसन्न होकर अपने परिवार के लोगों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. इन्हीं कामना से श्रद्धालु तालाब घट पर पुरोहितों से विधि विधान पूर्वक पूजन कराकर पूर्वजों को याद कर तिल कुश आदि से जल अर्पण किया.
Pitru Paksha: पितृपक्ष में पूर्वजों के निमित्त पिंडदान व तर्पण के लिये आश्विन माह खास माना गया है. पितृपक्ष भादो माह की पूर्णिमा तिथि को अगस्त्य मुनि के जल अर्पण से शुरू होकर आश्विन माह के कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को तर्पण का समापन होगा. पूर्वजों को जल अर्पण करने को लेकर जिलेभर के छोटे-बड़े तालाब घाटों व नदियों में श्रद्धालुओं की भीड़ दिख रही है. पितृपक्ष पितरों को याद करने व तर्पण करने का महापर्व माना जाता है. दस सितंबर से शुरू हुए पितृपक्ष का समापन 25 सितंबर को होगा.
इन 16 दिनों तक श्रद्धालु अपने पितरों का तर्पण कर जल अर्पण करेंगे. धार्मिक मान्यता है कि पितरों के निमित्त पिंडदान या तर्पण करने से उनकी आत्मा को मोक्ष मिलता है. जिस तरह देवी देवताओं की पूजा की जाती है, उसी तरह पितृपक्ष में पितरों की पूजा होती है. जिससे पितर प्रसन्न होकर अपने परिवार के लोगों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. इन्हीं कामना से श्रद्धालु तालाब घाट पर पुरोहितों से विधि विधान पूर्वक पूजन कराकर पूर्वजों को याद कर तिल कुश आदि से जल अर्पण किया.
बतादें कि भादव महीने की पूर्णिमा से शुरु हुई पितृपक्ष आश्विन मास के कृष्ण पत्रा की अमावस्या तिथि को समाप्त होगी. इन पक्ष में विधि विधान से पितरों से संबंधित कार्य करने से पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है. माना जाता है कि इससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. पितृपक्ष को श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है.
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पितृपक्ष में पितरों का आगमन दक्षिण दिशा से होती है. शास्त्रों के अनुसार दक्षिण दिशा में चंद्रमा के उपरी कक्षा में पितृलोक स्थित है. इस दिशा को यम की दिशा भी माना गया है. इसलिये दक्षिण दिशा में पितरों का अनुष्ठान किया जाता है. रामायण में उल्लेख है कि जब दशरथ जी की मृत्यु हुई थी तो भगवान राम ने स्वप्न में उन्हें दक्षिण दिशा की ओर जाते हुये देखा था. रावण की मृत्यु से पहले त्रिजटा ने सवप्न में रावण को गधे पर बैठकर दक्षिण दिशा की ओर जाते देखा था. इन्हीं कारणों से पितरों को दक्षिण दिशा की ओर जल अर्पण करने का विधान है.
पुराण के अनुसार व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि को हुई होती है. उसी तिथि अमें उनका श्राद्ध करना चाहिए. यदि जिनकी मृत्यु के दिन का सही पता न हो. उनका श्राद्ध अमावस्या तिथि को कराना चाहिए. श्राद्ध मृत्यु वाली तिथि को किया जाता है. मृतयु तिथि के दिन पितरों को अपने परिवार द्वारा दिये अन्न जल को ग्रहण करने की आज्ञा है. इसलिये उस दिन पितर कहीं भी किसी लोक में जिस रुप में होते हें. उसी अनुरुप आहार ग्रहण कर लेते हैं. विदित हो कि श्राद्ध पक्ष में तिल व कुश का विशेष महत्व है. गरुड़ पुराण के अनुसार तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु व महेश कुश के क्रमश: जड़, मध्य और अग्र भाग में रहते हैं. कुश का अग्र भाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्य का और जड़ भाग पितरों का माना गया है. वहीं तिल पितरों का प्रिय है और दुरात्माओं को दूर भगाने वाला माना गया है.
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