Dhan ki Kheti: बिहार में सुखाड़ से मचा हाहाकार, बारिश नहीं होने से धान की खेती हो रही चौपट, किसान चिंतित

Dhan ki Kheti: बिहार कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से भागलपुरी कतरनी उत्पादक संघ की ओर से भागलपुर प्रक्षेत्र अंतर्गत भागलपुर, बांका व मुंगेर जिले में कतरनी की खेती दुगुने रकबे में करने की तैयारी थी. कमजोर मानसून ने इसके विपरीत किसानों के उम्मीद पर पानी फेर दिया.
पटना. बिहार में लगातार तपिश और कड़ाके की गर्मी से किसान मायूस हैं. दनियावां व फतुहा प्रखंड के लगभग 133 राजस्व गांवों में धान की अभी आंशिक रोपनी ही शुरू हुई है. कई जगह धान के बिचड़े गर्मी से लाल और पीले हो रहे हैं. हसनपुर के रामनाथ सिंह, कुंडली के बब्बन सिंह, सरथुआ के सतीश कुमार और शाहजहांपुर के झूलन सिंह ने बताया कि हाइब्रिड नस्ल के बिचड़े तय समय पर नहीं रोपे गये तो उपज पर काफी खराब असर पड़ेगा. इस सप्ताह अगर वर्षा न हुई तो इस वर्ष धान की खेती लक्ष्य से काफी पीछे रह जाना तय है. जो किसान अपने खेतों में धान के बिछड़े की रोपाई कर दिये हैं उसे बचाने के लिए बिजली व पंप सेट के सहारे हैं. फिर भी भीषण गर्मी में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. दोनों प्रखंड में बिडिंग का जलस्तर नीचे चला गया है जिससे किसानों के समक्ष सुखाड़ होने की आशंका है. इस संबंध में प्रखंड कृषि पदाधिकारी ने बताया कि किसानों को डीजल अनुदान सहित हरसंभव मदद की जायेगी.
बिहार कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से भागलपुरी कतरनी उत्पादक संघ की ओर से भागलपुर प्रक्षेत्र अंतर्गत भागलपुर, बांका व मुंगेर जिले में कतरनी की खेती दुगुने रकबे में करने की तैयारी थी. कमजोर मानसून ने इसके विपरीत किसानों के उम्मीद पर पानी फेर दिया. कतरनी उत्पादक किसानों की मानें तो सुखाड़ की स्थिति में 25 फीसदी से अधिक तक कतरनी की खेती में कमी आयेगी. जगदीशपुर के कतरनी उत्पादक किसान राजशेखर ने बताया कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय के साथ मिलकर भागलपुर कतरनी उत्पादक संघ ने किसानों को जागरूक किया था.
यहां के किसान कतरनी की खेती के लिए दुगुना रकबा करने का मन बनाया था. यहां जैविक खेती को बढ़ावा मिल रहा था. कतरनी के उत्पाद को मुंहमांगी कीमत मिल रही थी, लेकिन बारिश नहीं होने पर समय पर किसान बिचड़ा भी नहीं बो पा रहे हैं. कतरनी का बिचड़ा बोने का समय 10 से 12 जुलाई तक था, लेकिन अब 15 जुलाई भी पार कर लिया. 50 फीसदी कतरनी उत्पादक किसान बिचड़ा नहीं बोये हैं. 50 फीसदी किसानों ने बिचड़ा समय से पहले बोया, लेकिन बिचड़ा बचाना चुनौती हो रही है. हालांकि किसानों को अब भी बारिश हाेने की उम्मीद है और कम से कम पहले की तरह कतरनी के रकबा को बनाये रख सकें.
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कृषि वैज्ञानिक मंकेश कुमार ने बताया कि कतरनी की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों की परेशानी को कम करने के लिए शोध जारी है. कतरनी के पौधे को छोटा किया जा रहा है. कतरनी की खेती अन्य सामान्य धान से बाद में होता है, लेकिन सुखाड़ की ऐसी स्थिति में बिचड़ा का समय भी निकलने लगा है. भागलपुर प्रक्षेत्र अंतर्गत भागलपुरजिले के जगदीशपुर, सन्हौला, शाहकुंड व सुल्तानगंज प्रखंड, मुंगेर, बांका के अमरपुर, रजौन, बाराहाट व बौंसी में 1500 एकड़ से अधिक भूमि में कतरनी की खेती हो रही है. इस बाररकबा बढ़ाना मुश्किल लग रहा है. दरअसल सामान्य रकबा को कवर करना चुनौती होगी.
करीब दो दशक बाद जुलाई माह में किसानों की उमंगों पर पानी फिर गया है. कांटी के बकटपुर गांव के किसान अनिल ओझा उर्फ मुन्ना ने बताया कि बरसात नहीं होने के कारण खेतों में बीज बर्बाद हो रहा है. जो किसान किसी तरह धान की रोपनी कर चुके थे, उनके खेतों में दरार आ गयी है. घर की लगी पूंजी भी खत्म होने की कगार पर है. परेशान किसान अब खेतों में जाना भी छोड़ दिये हैं. किसान अनिल ओझा कहते हैं कि पहले एक घंटे में बोरिंग से चार से पांच कट्ठा खेत में पटवन हो जाता था. वर्तमान में एक से डेढ़ कट्ठा खेत में भी पटवन ठीक से नहीं हो पा रहा है.
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