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पेट्रो डॉलर की कमजोरी के मायने

अगर हम अर्द्ध विनिमय अर्थव्यवस्था की ओर लौटते हैं, तो यह पूरी दुनिया के लिए नुकसानदेह होगा, लेकिन लगता है कि डॉलर की शाही स्थिति को चुनौती मिल रही है.

By अजीत रानाडे
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पेट्रो डॉलर की कमजोरी के मायने
पेट्रो डॉलर की कमजोरी के मायने
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इस वर्ष भारत का निर्यात प्रदर्शन बहुत दमदार होगा. निर्मित वस्तुओं का निर्यात 400 अरब डॉलर से अधिक होगा, जो अब तक का अधिकतम है. यह बीते साल से 40 फीसदी से ज्यादा है और सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की वृद्धि दर से पांच गुना अधिक है. यह वाणिज्य मंत्रालय द्वारा पूरा ध्यान देने से संभव हो सका है, जिसने उत्पाद और देश के स्तर पर लक्ष्य निर्धारित किया था और उस पर निगरानी रखी गयी.

विभिन्न निर्यात प्रोत्साहन काउंसिलों को भी लक्ष्य दिये गये थे. सरकार ने उत्पादन से संबंधित प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) भी शुरू की. सबसे बड़े निर्यातित पदार्थ पेट्रोलियम, कीमती पत्थर, आभूषण, इंजीनियरिंग वस्तुएं और रसायन रहे. उल्लेखनीय है कि 100 डॉलर शोधित पेट्रोलियम निर्यात करने के लिए हमें 90 डॉलर का कच्चा तेल आयात करना पड़ता है.

इसलिए जहां हमारा निर्यात बढ़ा है, वहीं आयात में भी वृद्धि हुई है. कच्चे तेल और मोबाइल फोन जैसी चीजों का आयात करीब 600 अरब डॉलर है. सोने का आयात भी एक हजार टन पार कर गया, जिसका मतलब है कि 70 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा बाहर चली गयी. इस वित्त वर्ष में कुल व्यापार घाटा संभवत: 200 अरब डॉलर हो जायेगा. निर्यात की तुलना में आयात अधिक होने से डॉलर की कमी होती है.

यह संतोषजनक है कि भारत सेवाओं, विशेषकर सॉफ्टवेयर, आईटी से जुड़ी सेवाओं, के निर्यात से भी डॉलर हासिल करता है. इसके अलावा पर्यटन, जो महामारी के कारण दबाव में है तथा कंसल्टेंसी जैसे क्षेत्र भी हैं. भारत दूसरे देशों में कार्यरत नागरिकों के भेजे धन को पानेवाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है. यह आंकड़ा करीब 80 अरब डॉलर है, जो सोने के आयात से बाहर जानेवाले धन के बराबर है. इस प्रकार, हमारा घाटा कम हो जाता है.

फिर भी डॉलर की कमी है. इसकी भरपाई निवेशकों की पूंजी से होती है, जो स्टॉक मार्केट, निजी हिस्सेदारी और कर्ज में पैसा लगाते हैं. डॉलर का अंतरराष्ट्रीय प्रवाह और भुगतान संतुलन शांति की स्थिति में ठीक रहते हैं. लेकिन यूक्रेन युद्ध ने इसमें अस्थिरता पैदा कर दी है. अमेरिका के नेतृत्व में विभिन्न देशों द्वारा रूस पर लगायी गयीं पाबंदियों का मतलब यह है कि रूसी निर्यात का भुगतान डॉलर में नहीं किया जा सकता है.

ऐसा इसलिए है कि भुगतान के लिए न्यूयॉर्क की मंजूरी चाहिए और अमेरिका रूसी निर्यातकों के ऐसे किसी दावे को मानने के लिए तैयार नहीं है. रूसी धनिकों के विदेशी धन को भी जब्त किया जा रहा है. अमेरिका स्विस बैंकों पर भी निश्चित ही दबाव डालेगा. अचानक रूस के लिए उसका 630 अरब डॉलर का विशाल मुद्रा भंडार बेकार दिख रहा है. यह धन अमेरिकी सरकार या यूरोपीय संघ के बॉन्ड के रूप में रखा गया है. इन्हें उन सरकारों से या व्यापार से नहीं भुनाया जा सकता है. लेकिन अगर इन्हें जारी करनेवाले संप्रभु राष्ट्र इनको अमान्य कर देते हैं, तो ये भी बेकार हो जायेंगे.

निश्चित ही रूस यह सब बैठ कर नहीं देख रहा है. तेल और गैस उसके बड़े निर्यात हैं. जो देश इनका रूस से आयात करते हैं, वे तुरंत किसी और स्रोत से इनकी खरीद शुरू नहीं कर सकते. इनमें प्रमुख आयातक जर्मनी है और खरीदारों में भारत भी है. इसलिए रूस इन पदार्थों पर बड़ी छूट दे रहा है. भारत अपनी जरूरत का एक फीसदी से भी कम तेल रूस से खरीदता है.

लेकिन अगर उसे आधे दाम पर तेल मिलेगा, वह भी तब, जब कच्चे तेल की कीमत सौ डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है तथा इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को खतरा हो गया है, तो उसे यह अवसर क्यों छोड़ना चाहिए? वास्तव में, यह भारत के हित में है तथा इससे मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने और वित्तीय घाटे को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी. रूसियों को इससे खुशी ही होगी कि उनका कुछ तेल बिक रहा है.

लेकिन भारत रूस को डॉलर में भुगतान नहीं कर सकता है, भले ही उसके पास इसका बड़ा भंडार है क्योंकि ऐसे भुगतान को भी न्यूयॉर्क से मंजूरी लेनी होगी और अमेरिकी इसमें अड़ंगा जरूर लगायेंगे. ऐसी स्थिति में भारत और रूस को रुपये-रूबल व्यापार के लिए कोई समझौता करना होगा, जिसके तहत भारत तेल के आयात के लिए रुपये में भुगतान करेगा और उस रुपये से रूस भारत से वस्तुओं की खरीदारी करेगा.

यह व्यवस्था बहुत अच्छी तरह काम कर सकती है, अगर रूस के साथ हमारा आयात और निर्यात संतुलित हो. दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है और बड़ा असंतुलन है. ऐसी स्थिति में हमें रूस को निर्यात करने के लिए अधिक वस्तुओं को खोजना होगा ताकि वे हमारे द्वारा भुगतान किये गये रुपये का इस्तेमाल कर सकें और हमसे अधिक चीजें खरीद सकें. जब ईरान प्रतिबंधों के तहत था, तब हमने उसके साथ इसी तरह से कारोबार किया है.

राष्ट्रपति निक्सन के कार्यकाल में सऊदी अरब ने अमेरिका से एक समझौता किया था कि वे अपने तेल निर्यात का भुगतान केवल डॉलर में ही लेंगे. डॉलर के वैश्विक वर्चस्व का यही आधार है. पहले तेल झटके के बाद सत्तर के दशक के मध्य में सऊदी अरब और मध्य-पूर्व के अन्य तेल उत्पादक देशों की कमाई अकूत थी और वह सब डॉलर में थी. हथियारों और गोला-बारूद की बड़ी खरीद के बाद भी वे इस कमाई को खर्च भी नहीं कर पाते थे.

ऐसे में, डॉलर को वाल स्ट्रीट में जमा किया जाता था और वहां से उसे दक्षिणी अमेरिका में कर्ज के रूप में दिया जाता था. इसका नतीजा वहां ऋण संकट के रूप में सामने आया. यह पेट्रो डॉलर और उसके वर्चस्व की कहानी थी. अब डॉलर के इस स्थापत्य में, जिसे हम पेट्रो डॉलर कहते हैं, पहली दरारें दिखने लगी हैं.

सऊदी अरब पहली बार चीनी मुद्रा के बदले चीन को तेल देने को तैयार हो गया है. शायद इस मुद्रा का इस्तेमाल चीनी वस्तुओं के भुगतान के लिए किया जायेगा. यह भारत और रूस के रुपया-रूबल व्यापार की तरह ही है. अगर चीनी युआन के एवज में सऊदी तेल का कारोबार शुरू होता है, तब अन्य देश भी इसी तरह के समझौतों की मांग कर सकते हैं.

इससे निश्चित ही डॉलर एकाधिकार की जमीन हिल जायेगी. हमारे पास कोई वैश्विक मुद्रा नहीं है और न ही अभी अमेरिकी डॉलर का कोई समर्थ विकल्प नजर आ रहा है. अगर हम अर्द्ध विनिमय अर्थव्यवस्था की ओर लौटते हैं, तो यह पूरी दुनिया के लिए नुकसानदेह होगा. लेकिन वर्तमान रुझानों को देखते हुए ऐसा लगता है कि लेन-देन और भुगतान में डॉलर की शाही स्थिति को चुनौती मिल रही है.

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