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छोटे सुधारों से आर्थिक विकास को गति

Economic Development: चुनौती भरे वैश्विक परिदृश्य में मौजूदा वित्त वर्ष की शुरुआती दो तिमाहियों में शानदार आर्थिक विकास दर भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के बारे में बताती है. निचली मुद्रास्फीति, कम राजकोषीय घाटा, संतुलित कर्ज-जीडीपी अनुपात, सहनीय चालू खाते का घाटा तथा मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के जरिये भारत आर्थिक रूप से एक स्थिर देश बन चुका है. लखपति दीदी योजना, मुद्रा लोन तथा किसानों के उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को मदद जैसे कदमों के सुखद परिणाम दिखने लगे हैं. भले ही ये कदम 1991 के आर्थिक सुधार जैसे न हों, लेकिन ये आर्थिक विकास को मजबूती दे रहे हैं.

Economic Development: चुनौतियों से भरे वैश्विक परिदृश्य में भी भारत नये साल में सबसे तेज विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है. जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट बरकरार रहने का संकेत दिया है. भारतीय उत्पादों पर अमेरिका द्वारा लगाया गया 50 फीसदी टैरिफ जारी है. इसके बावजूद मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 फीसदी की और दूसरी तिमाही में 8.2 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर बेहद उल्लेखनीय है. इतना ही नहीं, दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रों का योगदान भी बढ़िया रहा, प्राथमिक, यानी कृषि क्षेत्र का 3.5 फीसदी, द्वितीयक में उद्योग क्षेत्र का 7.7 फीसदी तथा विनिर्माण क्षेत्र का 9.1 प्रतिशत, एवं टर्शियरी, यानी सेवा क्षेत्र का 9.2 फीसदी योगदान रहा. इनसे भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का पता चलता है. भारतीय अर्थव्यवस्था के लगातार शानदार प्रदर्शन, जाहिर है, मजबूत फंडामेंटल्स के ही सबूत हैं.

भारत की आर्थिक मजबूती को संदेह की नजर से देखने वालों को, जैसे कि पिछले दिनों आइएमएफ ने हमारी आर्थिक विकास दर के मानक पर सवाल उठाये, ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है. भारतीय अर्थव्यवस्था के विविध क्षेत्रों का प्रदर्शन उनका संदेह दूर करने के लिए काफी है. पिछले साल अर्थव्यवस्था का नोबेल पाने वाले जोएल मोकिर ने 2010 में प्रकाशित अपनी किताब, ‘द इनलाइटेेंड इकोनॉमी : एन इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन 1700-1850’ की शुरुआत में ही लिखा था, ‘हर दौर में आर्थिक बदलाव ज्यादातर अर्थशास्त्रियों की सोच के अनुरूप नहीं होता, बल्कि लोग जो सोचते हैं, उसके अनुरूप होता है’. लिहाजा, हम यह सवाल पूछ ही सकते हैं कि भारत की आर्थिक विकास यात्रा के बारे में लोग क्या सोचते हैं? यह स्पष्ट है कि कोरोना महामारी के बाद न केवल देश की अर्थव्यवस्था सुस्ती के चक्र से बाहर निकल गयी, बल्कि हर साल देश की आर्थिक विकास दर अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों के अनुमान से कहीं ज्यादा रही है. वर्ष 2000 से भारत की दीर्घावधि आर्थिक विकास दर 6.5 फीसदी रही है. अब भारत की विकास दर औसतन सात फीसदी से ऊपर हो गयी है.

यह पिछले एक दशक में केंद्र सरकार द्वारा किये गये आर्थिक सुधारों के कारण संभव हुआ है. खंड-खंड में विभाजित अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को एकीकृत जीएसटी में लाना तथा पिछले साल इसे और व्यावहारिक बनाने का कदम, दीवाला और शोधन अक्षमता संहिता , रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी तथा मौद्रिक नीति समिति जैसे आर्थिक सुधार इसके उदाहरण हैं. वर्ष 2013 में भारत दुनिया की पांच भंगुर अर्थव्यवस्थाओं में से एक था. तब मॉर्गन स्टेनले ने यह शब्द गढ़ा था और इसके केंद्र में भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका तथा तुर्किये की अर्थव्यवस्थाएं थीं. पर उसके बाद से निचली मुद्रास्फीति, कम से कम राजकोषीय घाटा, संतुलित कर्ज-जीडीपी अनुपात, सहनीय चालू खाते का घाटा तथा 696 अरब डॉलर से भी अधिक के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के जरिये भारत आर्थिक रूप से एक स्थिर देश बन चुका है.

रिजर्व बैंक की दिसंबर में प्रकाशित ‘स्टेट ऑफ द इकोनॉमी’ रिपोर्ट बताती है, ‘व्यापक आर्थिक फंडामेंटल्स पर निरंतर फोकस और आर्थिक सुधार उत्पादक लाभ को बनाये रखेंगे, जिनके कारण तेजी से बदलते वैश्विक माहौल के बीच अर्थव्यवस्था की तेज वृद्धि जारी रहेगी’. सरकार ने अपनी तरफ से आर्थिक सुधार के कदम जारी रखे, तो बैंकों और कॉरपोरेट कंपनियों की बैलेंस शीट में सुधार, डिजिटल विभाजन को पाटने के लिए नेशनल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का गठन, भारी पूंजीगत खर्च के जरिये ढांचागत सुधार तथा पिछले पांच साल में राजकोषीय घाटे में 500 बेसिस पॉइंट की कमी लाने जैसी उपलब्धियों ने अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल दी. इसके अतिरिक्त, पिछले दशक में शुरू की गयी लखपति दीदी योजना, मुद्रा लोन तथा किसानों के उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को मदद जैसे सकारात्मक कदमों के सुखद परिणाम अब सतह पर दिखाई देने लगे हैं.

एक सामान्य-सा अनुमान यह है कि 2025 के अंत तक देशभर में लखपती दीदियों का आंकड़ा एक करोड़ पार कर गया है. ऐसे ही, मुद्रा लोन योजना के तहत जरूरतमंदों को अब तक 33 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक वितरित किये गये हैं. राष्ट्रीय कृषि बाजार, जिसे ‘ई-एनएएम’ दिया गया है, देश का इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है और इसने कृषि उत्पाद विपणन समिति तथा निजी किसानों के मंच के रूप में खुद को देश के कृषि उत्पादों के एकीकृत राष्ट्रीय बाजार के रूप में पेश किया है. इसका मजबूत स्वरूप बताता है कि राष्ट्रीय स्तर पर किसानों को उनके उत्पादों का लाभकारी मूल्य मिलना अब सपना नहीं रहा. सरकार द्वारा उठाये गये इन सकारात्मक कदमों से लोगों और किसानों को वित्तीय मदद मिलने लगी है, रोजगार सृजन को गति मिली है, कौशल विकास को बढ़ावा मिला है, क्षमता निर्माण हुआ है, योजनाओं को बाजार से जोड़ा गया है, जिनसे ग्रामीण इलाकों में और खासकर कृषि से जुड़े लोगों का सशक्तीकरण तथा समाज के निचले स्तर के लोगों का सामाजिक समावेशन संभव हो पाया है.

ग्लोबल कैपेसिटी सेंटर्स ने भी भारत का आर्थिक कद बढ़ाया है, जिनकी संख्या 1,800 से अधिक हो गयी है और जिनमें करीब 19 लाख लोग कार्यरत हैं. पिछले वित्त वर्ष में इनका राजस्व 64.6 अरब डॉलर था. इनके राजस्व में सालाना 9.8 फीसदी की वृद्धि हो रही है और इसका लक्ष्य 2030 तक 100 अरब डॉलर को पार करना है. हाल के दौर में अनेक ब्रिटिशकालीन कानूनों की समाप्ति, बैंकों तथा बीमा व म्यूचुअल फंड्स कंपनियों द्वारा दशकों से पड़े पैसों को संबंधित लोगों और उनके परिजनों को लौटाने की प्रक्रिया, हाल में लागू की गयी श्रम संहिताएं, एमएसएमइ क्षेत्र का बोझ कम करने की पहल तथा प्रतिभूति बाजार संहिता जैसे कदम आने वाले दिनों में आर्थिक विकास को और गति देंगे. भले ही ये कदम 1991 के व्यापक आर्थिक सुधार जैसे न लगते हों, लेकिन एक के बाद एक उठाये जाने वाले कदम आर्थिक विकास को मजबूती दे रहे हैं.

अलबत्ता 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए सालाना आठ फीसदी से अधिक की विकास दर की जरूरत पड़ेगी, जो भूमि और बिजली के क्षेत्रों में सुधार के अलावा न्यायपालिका, लोक प्रशासन, पुलिस आदि क्षेत्रों में सुधारों से ही संभव होगी. यह समझना होगा कि फिलहाल निवेश का सिर्फ एक ही इंजन पूरी क्षमता से चल रहा है. यह सार्वजनिक निवेश का इंजन है. जबकि निजी क्षेत्र का निवेश अब भी सुस्त बना हुआ है. निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ाने के लिए सरकार को व्यापार और उद्योग क्षेत्रों को प्रोत्साहित करना होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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