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प्रवासी भारतीयों को देश से जोड़ने का मंच

Updated at : 08 Jan 2025 7:30 AM (IST)
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8th Pravasi Bharatiya Divas

प्रवासी भारतीय सम्मेलन

Pravasi Bharatiya Divas 2025 : भारतीय मूल के वे लोग, जो आजादी से पूर्व मजदूरों के रूप में ब्रिटेन के अन्य उपनिवेशों और अन्य देशों में गये हों, या आजादी के बाद यूरोप, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या अन्य देशों में जाने वाले भारतीय हों, चाहे उनके पास भारत के पासपोर्ट हों अथवा उन्होंने विदेशी नागरिकता ली हो, उन सबका भारत के साथ एक भावनात्मक संबंध है.

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Pravasi Bharatiya Divas 2025 : हर दो साल में एक बार देश में प्रवासी भारतीय सम्मेलन बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. इस बार आज से 10 जनवरी तक भुवनेश्वर में इसका आयोजन किया जा रहा है. यह 18वां ऐसा आयोजन है. पहला प्रवासी भारतीय दिवस नौ जनवरी, 2003 को मनाया गया था. वर्ष 2003 से 2015 तक यह सम्मेलन हर साल मनाया जाता था. पर उसके बाद से यह सम्मेलन हर दो साल में एक बार मनाया जाता है.

विदेश मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार, नवंबर 2024 तक दुनिया में भारतीय मूल और अप्रवासी भारतीयों की कुल आबादी 3.54 करोड़ थी. इनमें भारतीय मूल के 1.96 करोड़ और अप्रवासी भारतीय 1.58 करोड़ थे. यानी किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतवंशियों और अप्रवासी भारतीयों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है. भारतीय मूल के लोग यूरोप, ब्रिटेन के पूर्व औपनिवेशिक देशों, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अरब की खाड़ी के देशों में निवास करते हैं.

भारतीय मूल के वे लोग, जो आजादी से पूर्व मजदूरों के रूप में ब्रिटेन के अन्य उपनिवेशों और अन्य देशों में गये हों, या आजादी के बाद यूरोप, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या अन्य देशों में जाने वाले भारतीय हों, चाहे उनके पास भारत के पासपोर्ट हों अथवा उन्होंने विदेशी नागरिकता ली हो, उन सबका भारत के साथ एक भावनात्मक संबंध है. आजादी के बाद भारत से विदेश जाने वाले लोगों का अब भी अपने परिवारों से अभिन्न रिश्ता बना हुआ है, जिस कारण वे बड़ी मात्रा में धन भारत में भेजते हैं. लेकिन जो लोग आजादी से पहले भारत से चले गये थे, वे भी भारत को दिल में बसाये हुए हैं.


विश्व बैंक के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, अप्रवासी भारतीयों द्वारा भारत में कुल 120 अरब डॉलर की राशि भेजी गयी. यह राशि 2024 में 124 अरब डॉलर और 2025 में 129 अरब डॉलर पहुंचने का अुनमान है. वर्ष 2023-24 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पोर्टफॉलियो निवेश, दोनों मिलाकर मात्र 54 अरब डॉलर का रहा. यानी अप्रवासी भारतीयों द्वारा कुल विदेशी निवेश के दोगुने से भी ज्यादा धन प्रेषित किया गया. भारत की विदेशी मुद्रा की जरूरत की पूर्ति बड़े पैमाने पर अप्रवासी भारतीय ही करते हैं. विदेशी पूंजी का अभी तक का अनुभव यह रहा है कि यह नये मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में बहुत कम आती है. अधिकांशतः भारत की ही स्थापित कंपनियों को खरीदने का काम विदेशी निवेशक कर रहे हैं. यह भी सच है कि अपनी पूंजी के साथ वे यदा-कदा ही प्रौद्योगिकी लाते हैं. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की तुलना में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अच्छा माना जाता रहा है, क्योंकि यह विदेशी निवेश तुलनात्मक रूप से ज्यादा स्थिर था. पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फलस्वरूप भारत से बड़ी मात्रा में आय हस्तांतरण बढ़ता गया.

आज स्थिति यह है कि जितना प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हमें प्राप्त होता है, उससे ज्यादा विदेशी मुद्रा डिविडेंट, रॉयल्टी, टेक्निकल फीस, वेतन आदि के रूप में आय हस्तांतरण के नाम पर बाहर चली जाती है, और देश की विदेशी देनदारी बढ़ती जाती है. पर अप्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गयी राशि न केवल भरोसेमंद है, बल्कि इनसे विदेशी देनदारी नहीं बढ़ती, और यह देश का संसाधन बन जाती है.


वर्ष 2003 से पहले ऐसे आयोजन नहीं हुआ करते थे. वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में यह आयोजन शुरू हुआ और अब यह स्थायी एवं भव्य आयोजन होने के साथ-साथ प्रभावी भी होता जा रहा है. प्रवासी भारतीय सम्मेलन भारत सरकार के लिए प्रवासी भारतीयों से जुड़ने, उनकी चिंताओं को समझने और उन्हें भारत के विकास में शामिल करने के लिए एक मंच के रूप में कार्य कर रहा है. इसके माध्यम से प्रवासी भारतीयों को भारत में निवेश करने, साझेदारी करने और देश के विकास में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

इस अवसर पर भारत में निवेश के अवसरों को प्रदर्शित किया जाता है. इसमें एक तरफ बिजनेस से जुड़े लोग प्रवासी भारतीयों से बात कर व्यापार बढ़ाने का काम करते हैं, तो सरकार भी प्रवासी भारतीयों से व्यापार संबंधी संवाद करती है. इस प्रकार देश में निवेश और विकास को गति मिलती है. प्रवासी भारतीय सम्मेलन भारत और महत्वपूर्ण भारतीय प्रवासी आबादी वाले देशों के बीच व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देता है. सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह समय सांस्कृतिक विरासत के जश्न का भी होता है. यह सम्मेलन भारत और प्रवासी भारतीयों के बीच संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है. यही नहीं, शिखर सम्मेलन प्रवासी भारतीय समुदायों के बीच भारतीय संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों को संरक्षित करने में मदद करता है.


सम्मेलन में व्यापार, विज्ञान, कला और परोपकार जैसे क्षेत्रों में प्रवासी भारतीयों के उत्कृष्ट योगदान को मान्यता दी जाती है. इस वर्ष के सम्मेलन की थीम है, ‘विकसित भारत में प्रवासी भारतीयों का योगदान.’ इस अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा प्रवासी भारतीय सम्मान भी दिये जायेंगे. इस वर्ष 27 प्रवासी भारतीयों को यह सम्मान दिया जाना है. यह भारत सरकार द्वारा प्रवासी भारतीयों को दिया जाने वाला उच्चतम सम्मान है. कई बार चिंता व्यक्त की जाती है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारतीय युवा विदेशों में चले जाते हैं, इससे देश के विकास में उनका योगदान नहीं हो पाता. इसे ब्रेन ड्रेन की समस्या के रूप में जाना जाता है. यह भी माना जाता है कि यदि हमारे उच्च शिक्षा प्राप्त लोग भारत के विकास में योगदान करें, तो देश को विकसित बनाने में सहयोग मिल सकता है.

लेकिन इस संबंध में यह भी समझना होगा कि पूर्व में भारतीय युवाओं के पास पर्याप्त अवसरों का अभाव था, जिसके कारण उन्होंने अपना करियर विदेश में बनाने का प्रयास किया. प्रवासी भारतीय सम्मेलन वर्तमान समय में भारत में उभर रहे अवसरों और देश के विकास को प्रदर्शित करने का एक अवसर भी होता है. ऐसे में हम पूर्व में देश से स्थानांतरित हुए भारतीयों को देश में वापस बुलाने का आकर्षण भी दे सकते हैं कि यहां आकर वे देश के विकास में अपना योगदान करें. लेकिन इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि प्रवासी भारतीय भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भेजकर देश के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं. यह विदेशी मुद्रा भी आखिरकार देश के विकास में ही काम आती है. इस दृष्टि से देखें, तो प्रवासी भारतीय सम्मेलन बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस प्रकार के आयोजनों से प्रवासी भारतीयों को भारत के साथ जोड़ने के कार्य को भी सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा रहा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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प्रो अश्विनी महाजन

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By प्रो अश्विनी महाजन

प्रो अश्विनी महाजन is a contributor at Prabhat Khabar.

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