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खुशहाली में संस्थानों की भूमिका की नयी दुनिया

Updated at : 14 Oct 2024 10:45 PM (IST)
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Nobel Prize in Chemistry Goes to Scientists David Baker, Demis Hassabis and John Jumper / X

अर्थशास्त्र की विशेष भूमिका को जिस तरह इन दिनों परिभाषित किया जा रहा है, वह एक अद्भुत अर्थशास्त्र और जीवन के प्रबंधन की स्थापना का नया युग है

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इस वर्ष का अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार की घोषणा से फिर अर्थशास्त्र की नयी व्याख्या का सिलसिला शुरू हुआ है क्योंकि उनके शोध में कहा गया है कि आने समय में संस्थाओं की भूमिका को विशेष तौर पर सरकारों की नीतियों को आम लोगों के लिए खुशहाली की तलाश का जरिया बनाना होगा. रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में डारोन ऐसमोग्लू, साइमन जॉनसन और जेम्स ए रॉबिन्सन को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की है. इन्हें यह सम्मान संस्थान कैसे बनते हैं और लोगों की खुशहाली को कैसे प्रभावित करते हैं, इसके अध्ययन के लिए मिला है. डारोन ऐसमोग्लू, अर्मेनियाई मूल के तुर्क-अमेरिकी अर्थशास्त्री हैं, जो मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पढ़ाते हैं. उन्होंने अपने शोध में राजनीतिक और आर्थिक संस्थाओं के प्रभाव को समझने का प्रयास किया है. उनका काम दर्शाता है कि कैसे संस्थाएं विकास और समृद्धि को प्रभावित करती हैं. साइमन जॉनसन और जेम्स ए रॉबिन्सन भी अर्थशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले विद्वान हैं, जिन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है.
अर्थशास्त्र की विशेष भूमिका को जिस तरह इन दिनों परिभाषित किया जा रहा है, वह एक अद्भुत अर्थशास्त्र और जीवन के प्रबंधन की स्थापना का नया युग है. इस वर्ष के विजेता अर्थशास्त्रियों का मत है कि अब नये अध्ययन, नयी परिभाषा एवं नये द्वार की आवश्यकता है. अर्थशास्त्री एवं विशेषज्ञ कहते हैं कि आगामी दिनों में अर्थशास्त्र की ऐसी क्रियाशील भूमिका हमें हर स्थान पर देखने को मिलेगी तथा सरकार और समुदाय अलग-अलग तरह से अर्थशास्त्र की व्याख्या करेंगे क्योंकि अब निजता के साथ-साथ छोटे समुदाय तथा समूहों में नयी आर्थिकता के सपने देखे जाने लगे हैं. माइक्रोइकोनॉमिक्स का फार्मूला बहुत से देशों ने अपनाया भी है, पर वह असफल भी हुआ है. कॉर्पोरेट घरानों तथा मध्यवर्गीय व्यापार संगठनों के साथ मध्यवर्गीय परिवारों के साथ लोगों के आगे जब-जैसे सवाल आता है, तो फिर आपको सोचना पड़ेगा कि आर्थिक शास्त्र के मूल्य कितने कारगर हैं. इस पर और शोध की जरूरत है. इन अर्थशास्त्रियों की राय तथा उनका निष्कर्ष यही है कि विश्लेषकों, आर्थिक विशेषज्ञों, पार्टियों तथा नेताओं को यह सोचना होगा कि वे अपने-अपने देश में कैसे अर्थ तंत्र तथा आर्थिक स्वतंत्रता के साथ-साथ अर्थशास्त्र के नये नियमों को लागू कर भविष्य को तथा मानवीय समस्याओं को किस तरह से हल कर सकते हैं.  

यह अद्भुत है कि किस तरह से एक नयी दुनिया हमारे सामने आती है और उस दुनिया को नये अर्थशास्त्र के आने से किस तरह से भविष्य में तथा एक सुखद सभ्यता के लिए आने वाले दिनों में इसको सुरक्षित रखा जा सकता है. यह भी मजेदार बात है कि यह पुरस्कार इस बार युवा अर्थशास्त्रियों को मिले हैं. उदाहरण के तौर पर, डारोन 57 वर्ष के हैं. सितंबर 1967 में जन्मे डारोन ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद में अमेरिका तथा लंदन में पढ़ाई की. उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है. उन्होंने पूरी दुनिया में अपने शोध के कारण 60 से ज्यादा ऐसे शोध पत्रों पर तथा विद्यार्थियों के साथ काम किया है. वे अपने कई लेखों के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते रहे हैं. एक राजनीतिक शास्त्री होने के साथ-साथ उनका मानना है कि उन्होंने अपनी पुस्तक इकोनॉमिक ओरिजिन ऑफ डिक्टेटरशिप एंड डेमोक्रेसी, स्ट्रेंथ ऑफ सिविल सोसाइटी आदि अनेक पुस्तकों में एक नयी भूमिका को अदा किया है.
तीनों अर्थशास्त्री विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की पढ़ाई के लिए आगे चलते गये, परंतु जब भी उन्होंने अर्थशास्त्र के नये संदर्भों की बात की, तो फिर पीछे लौटकर नहीं देखा. यही उनकी सफलता का राज है. एक इंटरव्यू में वे कहते हैं कि जब तक दुनिया में इस तरह का प्रबंधन रहेगा, अर्थशास्त्र के ऊपर शोध की एक नयी व्याख्या तथा सीमाओं से आगे देखने की परंपरा को जिंदा रखना होगा. उनके अनुसार सचेत रहना ही एक अच्छे अर्थतंत्र की निशानी है और इसी अर्थ तंत्र को बचाकर रखना चाहिए ताकि हम अपना भविष्य सुरक्षित कर सकें. इन अर्थशास्त्रियों की आर्थिक तंत्र की थ्योरी अब जब नोबेल पुरस्कार के बाद पूरी दुनिया में पहुंचेगी, तो एक बार फिर से चर्चा का विषय बन जायेगी क्योंकि अर्थ तंत्र के साथ अर्थशास्त्र का विश्लेषण राजनीतिक संस्थाओं तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़े तथा नये मूल्यों तथा संदर्भ में नयी खोजों का आवाहन और उसकी नयी परिभाषा का एक ऐसा अनुभव है, जिस पर पूरी दुनिया को सोचना चाहिए. नोबेल पुरस्कार समिति ने जिस तरह से इस पुरस्कार को विश्व के तीन वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों को देते हुए अपनी प्रस्तावना में लिखा है, वह भी बेहद आशाजनक है तथा नोबेल पुरस्कार कमेटी ने अर्थशास्त्र में उन्हें यह पुरस्कार देकर एक ऐसा कार्य किया है जिस पर फख्र किया जा सकता है.

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डॉ कृष्ण कुमार रत्तू

लेखक के बारे में

By डॉ कृष्ण कुमार रत्तू

डॉ कृष्ण कुमार रत्तू is a contributor at Prabhat Khabar.

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