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अर्थव्यवस्था की दिशा में जरूरी पहल

By अभिजीत मुखोपाध्याय
Updated Date
अर्थव्यवस्था की दिशा में जरूरी पहल
अर्थव्यवस्था की दिशा में जरूरी पहल
प्रतीकात्मक तस्वीर

अभिजीत मुखोपाध्याय, अर्थशास्त्री, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशनabhijitmukhopadhyay@gmail.com

कोरोना महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लागू किये गये लॉकडाउन तथा उससे पहले की समस्याओं की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है. इस संकट से निकलने की कोशिशों के क्रम में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने एक और बड़े पैकेज की घोषणा की है. आत्मनिर्भर भारत अभियान के इस तीसरे पैकेज में 2.65 लाख करोड़ रुपये से अधिक के उपायों का प्रावधान किया गया है.

यदि इसमें हम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज, अन्न योजना, रिजर्व बैंक के उपायों आदि के साथ आत्मनिर्भर भारत योजना के तीनों हिस्सों को जोड़ दें, तो केंद्रीय पैकेज का कुल आकार लगभग तीस लाख करोड़ का है. निश्चित रूप से यह न केवल आंकड़ों में बहुत बड़ी राशि है, बल्कि अर्थव्यवस्था को संभालने और उसे फिर से पटरी पर लाने के लिए बेहद जरूरी कदम भी है. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना और फिर उसके तहत जरूरतमंद परिवारों को अनाज उपलब्ध कराने का कार्यक्रम त्वरित रूप से बहुत अहम था तथा इन उपायों से तात्कालिक राहत भी पहुंची है, लेकिन आर्थिक उपायों में पूर्ववर्ती योजनाओं में धन का आवंटन एक हद तक बढ़ाया गया था.

वह भी उल्लेखनीय है, किंतु माना जा रहा था कि वे आवंटन समस्याओं की गंभीरता को देखते हुए समुचित नहीं थे. उस कमी को आत्मनिर्भर भारत को दूसरे और तीसरे चरण में कुछ सीमा तक पूरा करने का प्रयास हुआ है, जो सराहनीय है. जहां तक ऋण वृद्धि का प्रश्न है, तो उसमें उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं होना चिंताजनक है, क्योंकि औद्योगिक विकास का यह एक विशेष आधार है. धन का वितरण हुआ है, पर अभी उसकी बड़ी जरूरत बनी हुई है. आपूर्ति पक्ष में सरकार ने कुछ ठोस पहल की है.

रियल एस्टेट को बढ़ावा देने के लिए घर खरीदनेवालों को कर में छूट देना, मुश्किलों का सामना कर रहे कई औद्योगिक क्षेत्रों को आपात ऋण उपलब्ध कराना, फर्टिलाइजर सब्सिडी के लिए बड़ी रकम का आवंटन आदि उपाय खासा अहम हैं. लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि मुश्किलों का सामना कर रहे उद्योगों की पहचान कोरोना काल से पहले की गयी है तथा ऋण के लिए उनके सामने उत्पादन बढ़ाने की शर्त भी है.

ऐसे में इस पहल का लाभ वे किस हद तक उठा पायेंगे, यह बाद में ही पता चल सकेगा, पर इतना जरूर है कि इसका कुछ फायदा तो उत्पादन में होगा ही. उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ मांग बढ़ने पर उत्पादन में भी तेजी आयेगी. कृषि क्षेत्र पहले से ही अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है और कोरोना महामारी में भी उस पर दबाव बढ़ा है. इसके बावजूद अच्छे उत्पादन और निर्यात में वृद्धि के कारण इस क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को बहुत सहारा दिया है. ऐसे में 65 हजार करोड़ रुपये की फर्टिलाइजर सब्सिडी और अन्य उपाय (गरीब कल्याण योजना के कुछ हिस्सों के साथ) खेती और किसानों के लिए बड़ी राहत हो सकते हैं.

कृषि से जुड़े अन्य क्षेत्रों, बिजली, बीज आदि, में भी आवंटन के बारे में सरकार को सोचना चाहिए. पीएम आवास योजना में 18 हजार करोड़ का आवंटन भी वित्तमंत्री की घोषणा का अहम हिस्सा है. गरीब कल्याण योजना में भी 10 हजार करोड़ रुपये डाले जा रहे हैं. यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आर्थिक मंदी की सबसे बड़ी मार गरीबों को झेलनी पड़ रही है और उन्हें सरकारी मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है. रक्षा और अन्य क्षेत्रों में व्यय बढ़ाने के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का निर्धारण भी उल्लेखनीय है. इससे इंफ्रास्ट्रक्चर भी बढ़ेगा. अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर में भी सरकार ने धन देने को कहा है. इन तमाम क्षेत्रों में कोई भी आवंटन स्वागतयोग्य है.

लेकिन यह भी कहा जाना चाहिए कि निकट भविष्य में इस आवंटन में ठोस बढ़ोतरी की संभावनाओं को खुला रखा जाना चाहिए, क्योंकि विभिन्न आर्थिक गतिविधियों में गति पकड़ने में समय लगेगा और वे स्वयं ही अनेक समस्याओं से घिरे हैं, सो सरकार द्वारा वित्त उपलब्ध कराने का ही मुख्य विकल्प हमारे सामने है. सरकार को इसका भान है, तभी वह इस तरह के प्रावधान कर रही है, भले ही आवंटित राशि अपेक्षाकृत कम हो. भविष्य निधि में सरकार द्वारा योगदान देने का प्रस्ताव भी सराहनीय है. यदि कंपनियां इसका लाभ उठाना चाहती हैं, तो उससे रोजगार सृजन के अवसर भी पैदा होंगे.

लेकिन इसके साथ यह सवाल भी है कि क्या इस मुश्किल के दौर में कंपनियां नये लोगों को रखकर अपना खर्च बढ़ाने का जोखिम उठायेंगी, क्योंकि बाजार अभी भी असमंजस में है. यह समझना जरूरी है कि राहत पैकेज की आवश्यकता तात्कालिक है और वह अभी मिलेगी, तभी अर्थव्यवस्था को जल्दी सामान्य बनाया जा सकता है. वित्तमंत्री की पहले और अब की घोषणाओं में तुरंत आवंटन और सहयोग के अनेक प्रयास हैं, किंतु कई उपायों को दो-चार सालों की अवधि का विस्तार दिया गया है. इसका एक अर्थ यह है कि पैकेज की तमाम घोषित राशि फिलहाल मुहैया नहीं करायी जा सकती है यानी उन्हें अभी खर्च नहीं किया जायेगा.

इसी के साथ यह भी संज्ञान लिया जाना चाहिए कि अनेक योजनाओं में पहले के आवंटन को भी जोड़ा गया है. इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने में भी समय लगेगा. इस लिहाज से कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था को सीधे धक्का देकर गतिशील करने के लिए जो पूरा प्रयास होना चाहिए, वह इस पैकेज में नहीं दिखता. अभी सरकार के सीधे वित्तीय हस्तक्षेप व आवंटन की बड़ी जरूरत है. यह सही है कि लॉकडाउन हटाने के बाद से अर्थव्यवस्था में कुछ उत्साहवर्धक संकेत हैं, लेकिन मंदी और संकट की गंभीरता ऐसी है कि आर्थिकी को पटरी पर आने में बहुत समय लगेगा.

यह भी सनद रहे कि कोरोना महामारी अभी भी बरकरार है तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था भी अनिश्चितताओं से घिरी है. सरकार के मुख्य उपाय अभी भी आपूर्ति पक्ष की ओर अधिक केंद्रित हैं, जबकि मांग बढ़ाने पर भी ध्यान देने की जरूरत है. इसके लिए सीधे धन का प्रवाह सुनिश्चित करना जरूरी है. मांग, उत्पादन और रोजगार का परस्पर संबंध है.

बहरहाल, सिलसिलेवार ढंग से सरकार ने बीते महीनों में कई कदम उठाये हैं और आशा है कि आगे भी स्थितियों के अनुरूप वित्तीय राहत के उपाय होंगे. इस संदर्भ में पिछले कुछ महीने में उत्पादन, मांग तथा अर्थव्यवस्था में सुधार के ठोस आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं. उन्हें देखने के बाद ही निश्चित रूप से यह कहा जा सकेगा कि आत्मनिर्भर भारत की पहलकदमी के क्या असर हैं और उनमें किन आयामों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है.

(बातचीत पर आधारित)

Posted by: Pritish Sahay

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