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भारत-अमेरिकी संबंधों पर चीन की है गहरी नजर, पढ़ें डॉ बीआर दीपक का आलेख

China On India US: पेंटागन ने हाल में चीन पर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके मुताबिक, नयी दिल्ली के साथ तनाव घटने का सदुपयोग चीन अमेरिका-भारत नजदीकी को गहरा होने से रोकने के लिए करना चाहता है. इस रिपोर्ट ने बीजिंग को असहज कर दिया है.

डॉ बीआर दीपक
प्रोफेसर, अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विभाग, जेएनयू

China On India US: अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा कांग्रेस को प्रस्तुत चीन से संबंधित सैन्य और सुरक्षा विकास 2025 पर रिपोर्ट ने एक बार फिर एशिया में भू-राजनीतिक बहस तेज कर दी है. इस दस्तावेज में दोहराया गया है कि चीन तीन ‘मुख्य हितों’ को परिभाषित करता है-चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण का संरक्षण, आर्थिक विकास और संप्रभुता तथा क्षेत्रीय दावों की रक्षा व उनका विस्तार. रिपोर्ट कहती है कि इन ‘मुख्य हितों’ में से तीसरे को अब ताइवान, दक्षिण चीन सागर, सेनकाकू द्वीपसमूह और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य अरुणाचल तक विस्तारित कर दिया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर कम हुए तनाव की अवधि का उपयोग नयी दिल्ली के साथ संबंध स्थिर करने और अमेरिका-भारत रणनीतिक नजदीकी को गहरा होने से रोकने के लिए करना चाहता है.

इस पर चीन ने सावधानीपूर्वक एक संतुलित राजनयिक प्रतिक्रिया चुनी. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि चीन भारत के साथ संबंधों को ‘रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण’ से देखता है, ‘आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए’ तैयार है, और इस पर जोर देता है कि सीमा का मुद्दा पूरी तरह द्विपक्षीय है. उन्होंने आगे सीमा की स्थिति को ‘सामान्यतः स्थिर’ बताते हुए ‘बाहरी देशों’ की ‘गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियों’ की आलोचना की. चीनी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी पेंटागन की टिप्पणियों को ‘चीन के आंतरिक मामलों में गंभीर हस्तक्षेप’ करार देते हुए कहा कि रिपोर्ट में चीन के प्रति गलतफहमियां और भू-राजनीतिक पूर्वाग्रह भरे हैं, जो तथाकथित चीनी सैन्य खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गुमराह किया जा सके.

दूसरा, रिपोर्ट क्षेत्रीय दावों के आख्यानों को व्यापक राजनयिक संदर्भ में रखती है. यह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान अक्तूबर, 2024 में जिनपिंग और नरेंद्र मोदी के बीच हुई मुलाकात का उल्लेख करती है, और उसके बाद उत्पन्न संकेतों, जैसे नियंत्रण रेखा और टकराव वाले बिंदुओं पर तैनात सेना को पीछे हटाना, उड़ानों का पुनरारंभ, और लोगों के बीच बढ़ते संपर्क को रेखांकित करती है. वाशिंगटन के दृष्टिकोण से, बीजिंग नियंत्रण रेखा पर कम तनाव को संबंधों को स्थिर करने के अवसर के रूप में देख सकता है, साथ ही, वाशिंगटन-दिल्ली रक्षा सहयोग की गति को धीमा करने का प्रयास कर सकता है. फिर भी रिपोर्ट यह जोड़ती है कि चीन के इरादों को लेकर भारत सशंकित बना हुआ है. यह संदेह दरअसल उन संदेहों में निहित है, जो 2020 के गलवान संघर्ष में परिणत हुई.

बीजिंग वाशिंगटन के इस प्रस्तुतीकरण को ‘विभाजनकारी राजनीति’ के तौर पर देखता है. चीनी रक्षा मंत्रालय ने रिपोर्ट को बार-बार होने वाले हस्तक्षेप के रूप में खारिज किया, जो चीनी सैन्य खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है और अंतरराष्ट्रीय राय को प्रभावित करने का प्रयास करती है. चीन के मुताबिक, नियंत्रण रेखा पर अमेरिकी टिप्पणियां एक द्विपक्षीय विवाद में जानबूझकर हस्तक्षेप हैं, जिसका उद्देश्य भारत के साथ अमेरिकी तालमेल को मजबूत करना और चीन को अस्थिरता पैदा करने वाले तत्व के रूप में चित्रित करना है. इसी परिप्रेक्ष्य में, पाकिस्तान के साथ चीन के रक्षा संबंधों के संदर्भों को दोनों में ‘साठगांठ’ के रूप में पढ़ा जाता है हालांकि, आंतरिक रूप से, चीनी स्वप्न और उसकी आकांक्षाओं के बारे में चीन से बेहतर कोई नहीं जानता.

तीसरा, इतिहास सभी पक्षों के दावों को जटिल बनाता है. चीन-भारत सीमा को ब्रिटिश औपनिवेशिक और मांचू साम्राज्य के सीमांत विस्तार ने आकार दिया है, जहां किसी भी पक्ष ने एक साझा स्वीकृत रेखा नहीं मानी है. नयी दिल्ली का दावा है कि अरुणाचल प्रदेश का भारतीय संघ में लोकतांत्रिक एकीकरण पूर्ण संप्रभुता का प्रमाण है. बीजिंग इसका प्रतिवाद तिब्बती प्रशासन और मैकमोहन रेखा के अस्वीकार पर आधारित ऐतिहासिक तर्कों से करता है. भारत की प्रतिक्रिया विशिष्ट घटनाओं पर सख्त रही है. नयी दिल्ली ने पिछले साल नवंबर में शंघाई में अरुणाचल प्रदेश की एक महिला के साथ कथित उत्पीड़न की घटना के बाद कड़ा विरोध दर्ज कराया, और दोहराया कि अरुणाचल भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है. व्यवहार में, यह राज्य पूर्णतः भारतीय संवैधानिक ढांचे के भीतर कार्य करता है; इसलिए बीजिंग की मानचित्र-आधारित कूटनीति जमीनी वास्तविकता को बहुत कम बदलती है. फिर भी, ऐसे कदम विवाद को जीवित रखते हैं.

इस पृष्ठभूमि में, चीन का बयान तीन उद्देश्यों को पूरा करता है. यह भारत को आश्वस्त करता है कि चीन स्थिरता और संवाद को प्राथमिकता देता है. यह द्विपक्षीय ढांचे को पुनः स्थापित करता है, तृतीय-पक्ष की टिप्पणियों को खारिज करता है और अप्रत्यक्ष रूप से वाशिंगटन की विश्लेषणात्मक वैधता को चुनौती देता है. और यह ‘मुख्य हितों’ का स्पष्ट उल्लेख करने से बचते हुए रणनीतिक अस्पष्टता बनाये रखता है, जो चीनी कूटनीति की विशेषता है.

अंततः, पेंटागन की रिपोर्ट और बीजिंग की प्रतिक्रिया किसी नये संकट से अधिक एक परिचित रणनीतिक त्रिकोण को उजागर करती है : चीन बाहरी हस्तक्षेप को सीमित करना चाहता है, भारत संप्रभुता की रक्षा करते हुए संतुलन साध रहा है, और अमेरिका शक्ति-संतुलन को आकार देने का प्रयास कर रहा है. सीमा शांत है, लेकिन अनसुलझी, कूटनीति सक्रिय है. मानचित्रों पर नाम जमीन नहीं बदलते, लेकिन वे बातचीत अवश्य बदल देते हैं, और आज के हिंद-प्रशांत में प्रतिस्पर्धा अक्सर वहीं से शुरू होती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

Prabhat Khabar Digital Desk
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