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केंद्र सरकार भी शुरू करे जेपी सेनानी सम्मान पेंशन योजना

Updated at : 13 Mar 2020 7:03 AM (IST)
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केंद्र सरकार भी शुरू करे जेपी सेनानी सम्मान पेंशन योजना

यदि सरकार बदल गयी, तो मध्य प्रदेश में जेपी सेनानी सम्मान पेंशन योजना के तहत राशि मिलनी फिर शुरू हो जायेगी. गत साल जांच के नाम पर पेंशन को कमलनाथ सरकार ने बंद कर दिया.

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सुरेंद्र किशोर

राजनीतिक विश्लेषक

यदि सरकार बदल गयी, तो मध्य प्रदेश में जेपी सेनानी सम्मान पेंशन योजना के तहत राशि मिलनी फिर शुरू हो जायेगी. गत साल जांच के नाम पर पेंशन को कमलनाथ सरकार ने बंद कर दिया. उससे पहले मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने मीसा के तहत आपातकाल में जेलों में बंद चार हजार जेपी सेनानियों को हर माह 25 हजार रुपये देना शुरू किया था. याद रहे कि बिहार में पेंशन पाने वालों की संख्या मध्यप्रदेश की अपेक्षा काफी कम है, जबकि बिहार में जेपी आंदोलन का सघन प्रभाव था.

कमलनाथ सरकार की देखादेखी राजस्थान की गहलोत सरकार ने भी जेपी सेनानियों की पेंशन बंद कर दी है. दरअसल कांग्रेस ने इस पेंशन योजना को कभी पसंद ही नहीं किया. बिहार में जब यह योजना शुरू हुई थी, तो कुछ लोगों ने उसका भी विरोध किया था. वैसे लोगों ने आपातकाल में उन जुल्म -पीड़ितों के प्रति कभी कोई सहानुभूति नहीं दिखाई, जो राजनीतिक नेताओं ,कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों पर 1974 से लेकर 1977 तक ढाये गये थे. अनेक लोगों को आपातकाल में भारी प्रताड़नाएं दी गयीं.

आपातकाल में जो फरार थे,उन्हें भी भारी कष्ट झेलने पड़े थे, तो क्या सरकारें बदलती रहेंगी और जेपी पेंशन बंद और चालू होती रहेगी ? इस स्थिति में केंद्र सरकार को ऐसा कोई उपाय करना चाहिए कि राज्यों में सरकारें बदल जाने के बाद पेंशन बंद न हो या फिर बेहतर हो कि केंद्र सरकार भी अपनी ओर से उन्हें पेंशन दे. तब एक जगह के पैसे बंद हो जाने के बाद दूसरी जगह से तो कुछ पैसे मिलते रहेंगे. याद रहे कि सारे जेपी सेनानी विधायक या मंत्री नहीं बन पाये, उनमें से कई भारी आर्थिक तंगी में रहते हैं. पेंशन देने के कड़े प्रावधानों के कारण बिहार के अनेक जेपी सेनानी पेंशन से वंचित हैं.

समय रहते बाढ़ सुरक्षा कार्य जरूरी : दानापुर अनुमंडल के करीब आधा दर्जन प्रखंड अक्सर बाढ़ और कटाव से पीड़ित होते हैं. बचाव के उपाय पहले से हो, तो राहत अधिक मिलेगी. जानकार लोग बताते हैं कि बाढ़ से मुकाबले के लिए सुरक्षात्मक कार्य यदि हर साल 15 मई से पहले पूरा हो जाये, तो लोगों को बाढ़ से अपेक्षाकृत कम कष्ट पहुंचेगा. वैसे यह बात पूरे राज्य पर भी लागू होती है, पर प्रादेशिक राजधानी पटना के पास के इलाकों के बचाव से पटना में भी निश्चिंतता रहती है. गंगा, सोन और पुनपुन सहित कुल पांच नदियों की बाढ़ से दानापुर अनुमंडल की पांच दर्जन पंचायतों के करीब ढाई सौ गांव पीड़ित होते हैं.

एक अच्छी खबर भी : खराब खबरों के बीच दो अच्छी खबरें भी आयी हैं. एक दिल्ली से और दूसरी दानापुर से. दानापुर जमाल शाह कब्रिस्तान कर्बला की लावारिस जमीन पर 55 शाॅपिंग कॉम्प्लेक्स बनवा कर सभी जाति -धर्म के लोगों को दुकानें आवंटित की गयीं. उधर दिल्ली की खबर है कि दिल्ली वक्फ बोर्ड ने दंगाग्रस्त इलाकों के क्षतिग्रस्त मकानों और दुकानों की मरम्मत के लिए पैसे दिये हैं. यह आर्थिक मदद उन सभी समुदायों के लोगों को मिल रही है जिनके मकान-दुकान क्षतिग्रस्त हुए हैं.

बाबरी मस्जिद मुकदमे का निर्णय जल्द : लगता है कि एक तरफ राम मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू होगा, तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में अदालत अपना निर्णय देगी. याद रहे कि 1992 के विध्वंस कांड मुकदमे की सुनवाई लखनऊ की सीबीआइ अदालत में चल रही है. ताजा खबर के अनुसार सीबीआइ ने अदालत में अपना पक्ष रखने का काम पूरा कर लिया है. यानी, अब सुनवाई पूरी होने में अधिक समय नहीं लगेगा.

डीजे पर प्रतिबंध लगाये सरकार : डीजे यानी डिस्क जाॅकी के भारी शोर के कारण अक्सर जहां-तहां कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो जाती है. लोगों के स्वास्थ्य पर इसके प्रतिकूल असर की समस्या तो अलग से है ही. तेज आवाज पर कई लोग एतराज करते रहते हैं. शोर के विरोध पर कई बार लोगबाग हिंसा पर उतारू हो जाते हैं. वैसे भी डीजे की आवाज सामान्यतः इतनी तेज होती है कि वह कानों के स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदेह है. विशेषज्ञ बताते हैं कि 100 डेसिबल आवाज को यदि 14 मिनट तक लगातार सुना जाये, तो कान को क्षति पहुंच जाती है.

50 से 75 डेसिबल आवाज में सुनने की शासकीय अनुमति है, पर उस सीमा का अक्सर उल्लंघन होता है क्योंकि नियम को लागू करने वाला कोई अफसर हर जगह उपलब्ध नहीं हो सकता. 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने डीजे पर प्रतिबंध लगा दिया था. मामला हाइकोर्ट गया था. उस पर क्या निर्णय हुआ,यह नहीं मालूम. कई साल पहले पटना के एक बड़े होटल में एक सामाजिक समारोह में शामिल होने के लिए मैं गया था, पर हाॅल में इतने जोर से डीजे बज रहा था कि मैं वहां दो मिनट भी नहीं रुक सका था.

और अंत में : इस देश पर जब भी कोई बाहरी या भीतरी संकट आता है, तो इसी देश के कुछ लोग ऐसी भूमिका में आ जाते हैं मानो वे ‘विश्व नागरिक’ हों. उनके बयानों ,लेखों और व्यवहार से ऐसा लगता है कि वे पहले अघोषित विश्व नागरिक हैं और बाद में भारतीय नागरिक. वैसे विश्व नागरिकता नाम की कोई चीज अभी है नहीं. वैसे लोग भारत छोड़कर दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं पाये जाते क्योंकि किसी अन्य देश के लोग अपने देश को धर्मशाला कतई नहीं समझते.

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Pritish Sahay

लेखक के बारे में

By Pritish Sahay

12 वर्षों से टीवी पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सेवाएं दे रहा हूं. रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से पढ़ाई की है. राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय विषयों के साथ-साथ विज्ञान और ब्रह्मांड विषयों पर रुचि है. बीते छह वर्षों से प्रभात खबर.कॉम के लिए काम कर रहा हूं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद डिजिटल जर्नलिज्म का अनुभव काफी अच्छा रहा है.

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