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फंसे कर्ज की वसूली में तेजी के कारण मजबूत हो रहे बैंक

RBI: आरबीआइ द्वारा जारी छमाही वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (जीएनपीए) अनुपात सितंबर, 2025 तक कम होकर 2.1 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया है. इसके प्रमुख कारण बड़े उधारकर्ताओं के पोर्टफोलियो की गुणवत्ता में लगातार सुधार, फंसे कर्ज की वसूली में तेजी, एनपीए खातों का राइट ऑफ करना, ऋण की मांग का स्थिर रहना आदि हैं.

RBI: भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 31 दिसंबर, 2025 को जारी छमाही वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (जीएनपीए) अनुपात सितंबर, 2025 तक कम होकर 2.1 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया है. रिजर्व बैंक का अनुमान है कि मौजूदा स्थिति के अगले महीनों में भी कायम रहने पर 46 बैंकों का जीएनपीए मार्च, 2027 तक घट कर 1.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच सकता है. यदि देश की आर्थिक स्थिति प्रतिकूल रहती है, तब भी यह अनुपात 3.2 से 4.2 प्रतिशत के बीच रहेगा. इससे पहले की स्थिरता रिपोर्ट में कहा गया था कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का जीएनपीए मार्च, 2018 में 14.58 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर था, वह सितंबर, 2024 में घटकर 3.12 प्रतिशत स्तर पर पहुंचा था.

परिसंपत्ति की गुणवत्ता में सुधार के प्रमुख कारण बड़े उधारकर्ताओं के पोर्टफोलियो की गुणवत्ता में लगातार सुधार, फंसे कर्ज की वसूली में तेजी, एनपीए खातों का राइट ऑफ करना, ऋण की मांग का स्थिर रहना आदि हैं. इसके साथ-साथ, परिसंपत्ति पर प्रतिफल (आरओए) और इक्विटी पर प्रतिफल (आरओइ) में भी हाल के वर्षों में वृद्धि हुई है और यह 10 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जिससे जीएनपीए अनुपात में निरंतर कमी देखी जा रही है. ताजा स्थिरता रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकों का पूंजी जोखिम भारित परिसंपत्तियों का अनुपात (सीआरएआर) सुधरा है. सितंबर, 2025 तक यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 16 प्रतिशत था, जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों में 18.1 प्रतिशत था. मार्च, 2015 में यह अनुपात 11.45 प्रतिशत था, जो सितंबर 2024 में बढ़कर 15.43 प्रतिशत हो गया. अधिक प्रतिशत का मतलब है कि बैंकों के पास पर्याप्त पूंजी है, जिससे वे जोखिम का सामना कर सकते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि 46 प्रमुख अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का कुल सीआरआर सितंबर, 2025 में 17.1 प्रतिशत से घटकर मार्च, 2027 तक 16.8 प्रतिशत हो सकता है. चूंकि इस अनुपात में मामूली कमी आने की संभावना है, इसलिए बहुत अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है. रिपोर्ट की मानें, तो अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की बड़े कर्जदारों पर निर्भरता कम हो गयी है, जो अच्छा संकेत है.

वर्तमान में, 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कारोबार बैंकिंग क्षेत्र के कुल कारोबार का लगभग 60 प्रतिशत है. वित्त वर्ष 2025-26 के पहले छह महीनों में इन्हें 93,675 करोड़ रुपये का लाभ हुआ, जो पिछले वर्ष अप्रैल से सितंबर तक के 85,520 करोड़ रुपये से लगभग 10 प्रतिशत अधिक है. ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के अंत तक यह मुनाफा दो लाख करोड़ रुपये के स्तर को पार कर सकता है. पिछले वित्त वर्ष में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये का लाभ कमाया, जबकि 2023-24 के दौरान, 1.41 लाख करोड़ रुपये का सबसे अधिक कुल शुद्ध लाभ दर्ज किया था. अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप, भारतीय रिजर्व बैंक ने 2015 में परिसंपत्ति की गुणवत्ता के पुनरीक्षण (एक्यूआर) की व्यवस्था शुरू की थी, ताकि पारदर्शी तरीके से दबावग्रस्त ऋणों को एनपीए में वर्गीकृत किया जा सके. इस कारण 2018 तक एनपीए में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिसके चलते बैंकों की ऋण देने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और अर्थव्यवस्था की वृद्धि भी बाधित हुई. हालांकि, जल्द ही सरकार और केंद्रीय बैंक की समीचीन नीतियों की वजह से बैंकों ने एनपीए के स्तर को कम करने और लाभ को बढ़ाने में सफलता प्राप्त की. बैंकों ने देश में वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 54 करोड़ से अधिक जनधन खाते खोले और विभिन्न प्रमुख वित्तीय समावेशन योजनाओं के तहत 52 करोड़ से अधिक बिना गारंटी के ऋण स्वीकृत किये.

बैंक महिलाओं को सशक्त भी बना रहे हैं. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के लाभार्थियों में महिलाएं लगभग 68 प्रतिशत हैं, जबकि प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के लाभार्थियों में महिलाएं लगभग 44 प्रतिशत हैं. इन पहलों के कारण मार्च, 2024 तक कुल सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम का अग्रिम स्तर 28.04 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो दर्शाता है कि छोटे कारोबारियों को मजबूती मिल रही है. बैंक लगातार किसानों और कृषि क्षेत्र को समर्थ बनाने का प्रयास भी कर रहे हैं. सितंबर, 2024 तक कुल किसान क्रेडिट कार्ड खातों की संख्या 7.71 करोड़ थी, और उनमें कुल बकाया राशि 9.88 लाख करोड़ रुपये थी. अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का सकल अग्रिम वित्त वर्ष 2004 से 2014 के दौरान 8.5 लाख करोड़ से बढ़कर 61 लाख करोड़ रुपये हो गया, और यह मार्च, 2024 तक 175 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. कहा जा सकता है कि 2015 के बाद सरकार, बैंक और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाये गये समीचीन कदमों से एनपीए की वसूली और उसके समाधान, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण और उनके समक्ष आने वाली अन्य चुनौतियों का सामना करने में मदद मिली है, जिससे बैंकों के कारोबार और लाभ में तेजी और एनपीए के स्तर में निरंतर कमी आ रही है. इससे बैंकिंग क्षेत्र और भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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