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माओ बनने की राह पर जिनपिंग

चीनी इतिहास का यह शी-करण चीनी इतिहास के माओकरण जैसा ही है. भारत और अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए यह चिंता का विषय है.

By शिवकांत
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माओ बनने की राह पर जिनपिंग
माओ बनने की राह पर जिनपिंग
File Photo

साल 2017 की विश्व आर्थिक मंच की बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दावोस में दुनियाभर से जुटे मुक्त बाजार और वैश्वीकरण हिमायतियों को आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की नसीहतें दी थीं. बीते दिनों ग्लासगो में जमा हुए 192 से अधिक देशों के नेता उनसे किसी वैसी ही करामात की उम्मीद कर रहे थे. लेकिन उन्होंने सबको निराश किया और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने फब्ती कसते हुए कहा कि जलवायु सम्मेलन में न आकर उन्होंने ‘बड़ी भूल’ की है.

पर चीनी विशेषज्ञों का कहना है कि शी जिनपिंग अपनी राजनीतिक ताकत और विरासत पक्की करने में लगे हुए थे, जो सबसे बड़ा प्रदूषणकर्ता देश होते हुए जलवायु सम्मेलन में जाकर आलोचना झेलने से कहीं बेहतर विकल्प था. पिछले सप्ताह बीजिंग में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के छठे महाधिवेशन की सबसे खास बात यह थी कि इसमें एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के सौ वर्षों के इतिहास की उपलब्धियों और अनुभवों का आकलन किया गया और भावी दिशा तय हुई.

पार्टी के इतिहास में अभी तक केवल दो ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किये गये हैं. पहला माओ ने 1945 में पारित कराया था, जिसका उद्देश्य था कम्युनिस्ट पार्टी में अपने आलोचकों का सफाया करना. इस प्रस्ताव के बाद माओ की विचारधारा को ही पार्टी के लिए सही रास्ता मानते हुए उन्हें पार्टी का निर्विवाद नेता स्वीकार कर लिया गया था. उनसे असहमत हजारों विरोधियों को खत्म कर दिया गया था.

दूसरा प्रस्ताव देंग शियाओपिंग ने 1981 में पारित कराया, जिसका उद्देश्य आर्थिक उदारीकरण और सुधारों की नीति को पक्का करना था. उसके लिए माओ की दिवालिया करनेवाली नीतियों से पिंड छुड़ाना जरूरी था. इसलिए माओ के ग्रेट लीप और सांस्कृतिक क्रांति को भूलों के रूप में स्वीकार किया गया और उस दौर की गलत नीतियों से पड़े अकाल में हुई करोड़ों की मौत,

लाखों बुद्धिजीवियों की हत्या, अराजकता और बदहाली की आलोचना हुई. लेकिन इस भूल के लिए माओ को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार न मानते हुए चीन की क्रांति में उनके योगदान के लिए पार्टी इतिहास में उनके निर्विवाद नेता के स्थान को बरकरार रखा गया. देंग का स्थान चीन को आगे ले जाने के लिए सही दृष्टि रखनेवाले नेता के रूप में पक्का हुआ.

अब ऐतिहासिक महाधिवेशन में जिनपिंग नया ऐतिहासिक प्रस्ताव लेकर आये, जिसका उद्देश्य चीन को बलशाली बनाना और साझा खुशहाली लाना है. पिछले दोनों प्रस्तावों में पार्टी ने अतीत की भूलों को स्वीकार कर नये युग का प्रवर्तन करने की कोशिश थी. जिनपिंग के प्रस्ताव में इतिहास की भूलों की बात न करते हुए उसका आदर करने और देश को नये युग के लिए तैयार करने की बातें हैं. इसके कई कारण हैं.

शी कम्युनिस्ट पार्टी के खानदानी नेता हैं. उनके पिता शी जोन्गशुन माओ के उन साथियों में थे, जिन्हें माओ की विचारधारा में पूरी निष्ठा न रखने के शक में यातनाएं झेलनी पड़ी थीं. पार्टी का नेतृत्व बदलने के साथ उनके दिन भी फिरे और शी जिनपिंग पार्टी के शिखर पर आ पहुंचे. वे अपने को माओ का उत्तराधिकारी मानते हैं. वे केवल 68 वर्ष के हैं. पार्टी के ऐतिहासिक प्रस्ताव को पार्टी और प्रशासन में एक अलिखित संविधान की तरह देखा जाता है. इसलिए इस पर सभी शीर्ष नेताओं की सहमति जरूरी होती है.

जिनपिंग भी माओ और देंग वाला मुकाम हासिल करना चाहते हैं, लेकिन ऐसा वे पूर्ववर्ती नेताओं की नीतियों पर सवाल उठाते हुए नहीं, बल्कि उन्हें चीन के उदय की सीढ़ियों के रूप में स्वीकार करते हुए देश में राष्ट्रवाद की भावना को जगाते हुए करना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि उनका स्थान चीनी इतिहास के महान नेताओं की त्रिमूर्ति में पक्का हो सके. किसी भी तरह की असहमति की संभावना को खत्म करने के लिए उन्होंने 2012 में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक देशव्यापी मुहिम शुरू की थी.

दूसरे कार्यकाल में उन्होंने पार्टी को अपनी विचारधारा में रंगने का काम शुरू किया. साल 2018 के पार्टी अधिवेशन में शी एक ऐसा प्रस्ताव लेकर आये, जिसमें उन्हें माओ और देंग की तरह पार्टी का ‘कोर’ या मूल नेता घोषित कर दिया गया. उसके बाद शी के विचार और संदेश स्कूलों के पाठ्यक्रमों में और पार्टी के सिद्धांतों में शामिल किये गये. उसी साल राष्ट्रपति को दो कार्यकालों से लंबे समय तक सत्ता में न रखने की उस परंपरा को समाप्त कर दिया गया, जिसकी शुरुआत देंग ने माओ की व्यक्तिपरक संस्कृति को खत्म करने के लिए की थी. इन प्रस्तावों ने शी के लिए माओ की तरह जीवन भर सत्ता में बने रहने और व्यक्तिपरक संस्कृति को पुनर्जीवित करने का रास्ता खोल दिया है.

शी जानते हैं कि चीन में आर्थिक विषमता की खाई तेजी से बढ़ी है. आर्थिक विकास दर गिर रही हैं. इन समस्याओं से निपटने के लिए निर्माण को बढ़ावा देने के साथ चीनियों से इतिहास, पार्टी, देश और चीनी माल में गौरव की भावना रखने को कहा जा रहा है. उनका प्रस्ताव माओ और देंग के प्रस्तावों की तरह नेतृत्व के सवाल को लेकर चले संघर्षों, ग्रेट लीप और सांस्कृतिक क्रांति जैसी भूलों और तियानन्मैन चौक जैसी घटनाओं पर प्रश्न उठाने के बजाय उन पर लीपापोती करता है तथा आर्थिक विकास, सैन्य शक्ति, गरीबी उन्मूलन, हांगकांग और मकाओ की वापसी और चीन की बढ़ती धाक जैसी बातों पर गौरव करने की बात करता है. इसमें ताइवान के विलय और दक्षिण चीन सागर में चीनी हितों की रक्षा के प्रण भी शामिल हैं.

चीनी इतिहास का यह शी-करण बदलती दुनिया के परिप्रेक्ष्य में चीनी इतिहास के माओकरण जैसा ही है. इसीलिए भारत और दूसरे पड़ोसी लोकतांत्रिक देशों के लिए यह चिंता का विषय है. शी केवल अपनी सत्ता और विरासत को ही पक्का नहीं कर रहे, बल्कि चीनी जनता को ताइवान, दक्षिण चीन सागर, हांगकांग, तिब्बत, शिन्जियांग, अरुणाचल प्रदेश, अक्साई चिन और नदी जल जैसे मुद्दों पर दुनिया के साथ होनेवाले टकराव में अपनी हिमायत के लिए भी तैयार कर रहे हैं. उनका सपना चीन को एक बलशाली और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में तैयार करना है, पर दुनिया के लिए चुनौती यह है कि अपने विकास के लिए निर्यात और विदेश व्यापार पर निर्भर न रहकर अंतर्मुखी और आत्मनिर्भर बने चीन को सही रास्ते पर लाने के लिए कौन सा रास्ता बचेगा.(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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