रोकनी होगी हिंसा

Published by : संपादकीय Updated At : 19 Oct 2021 2:11 PM

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कश्मीर की घटनाओं से पंजाब और असम के उस वक्त के जख्मों की याद आना स्वाभाविक है, जब आतंकवाद के दौर में बिहार के मजदूरों की हत्याएं होती थीं.

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बीते कुछ दिनों से कश्मीर घाटी में आतंकवादियों द्वारा नागरिकों की हत्या का सिलसिला चल रहा है. अब तक इस महीने 11 निर्दोष नागरिकों को मारा गया है, जिनमें पांच अन्य राज्यों से हैं. मृतकों में बिहार और उत्तर प्रदेश के गरीब मजदूर भी शामिल हैं. पिछले कुछ वर्षों से घाटी में नागरिकों की हत्या की घटनाओं में कमी आयी थी और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी से बड़ी संख्या में आतंकवादियों को मौत के घाट उतारा गया है.

लेकिन अल्पसंख्यकों और मजदूरों को निशाना बनाने की हालिया घटनाएं यह संकेत देती हैं कि आतंकी गिरोह फिर एक बार सक्रिय हो रहे हैं तथा वे घाटी को अस्थिर करना चाहते हैं. इन आतंकियों को न केवल पाकिस्तान का खुला समर्थन प्राप्त है, बल्कि कई वारदातों में पाकिस्तानी घुसपैठियों के शामिल होने की सूचनाएं भी सामने आ रही हैं. बिहार और उत्तर व पूर्वी भारत के अन्य राज्यों के मजदूर तथा ठेला-पटरी वाले गरीब लोग मेहनत से अपनी जीविका तो कमाते ही हैं, साथ में वे उन राज्यों के विकास में भी अहम योगदान देते हैं.

कश्मीर, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों के विकास और समृद्धि में ऐसे कामगारों, विशेषकर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश से आनेवालों ने बड़ी भूमिका निभायी है. यह भी याद रखना चाहिए कि इन्हें उचित मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा भी नहीं मिलती है. कठिनाइयों के साथ उन्हें अपमान और हिंसा का सामना भी करना पड़ता है, पर वे उसी लगन से काम करते रहते हैं.

कश्मीर की घटनाओं से पंजाब और असम के उस वक्त के जख्मों की याद आना स्वाभाविक है, जब आतंकवाद के दौर में बिहार के मजदूरों की हत्याएं होती थीं. कश्मीर में उनका दोहराव नहीं होना चाहिए. केंद्र सरकार तथा जम्मू-कश्मीर शासन की ओर से बाहरी कामगारों की सुरक्षा के इंतजाम हो रहे हैं. इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए. कश्मीर के राजनीतिक दलों, संगठनों तथा नागरिकों को भी बाहर से कमाने आये कामगारों में व्याप्त भय और असुरक्षा की भावना निकालने के लिए आगे आना चाहिए.

यदि घाटी से मजदूरों का पलायन होता है या उनके रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ता है, तो इससे कश्मीर का विकास प्रभावित होगा, जो किसी के हित में नहीं है. शेष देश से भी आवाज उठनी चाहिए कि ये कामगार अकेले नहीं हैं. इन घटनाओं से एक बार फिर साबित हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार शर्मसार होने तथा वैश्विक संस्थाओं द्वारा दोषी ठहराये जाने के बावजूद पाकिस्तान अपनी कायराना हरकतों से बाज नहीं आ रहा है.

नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर चौकसी सख्त करने तथा घाटी में सुरक्षा बढ़ाने के साथ पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी भी देने की जरूरत है. अन्य देशों को भी इन घटनाओं की जानकारी देकर पाकिस्तान के विरुद्ध कूटनीतिक गोलबंदी भी की जानी चाहिए. हम सभी को यह सुनिश्चित करना है कि कश्मीर घाटी में नब्बे के दशक की स्थितियां फिर से पैदा नहीं होने पाएं.

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