विकास पर केंद्रित है रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति

संजय मल्होत्रा
RBI monetary policy : मौद्रिक नीति के माध्यम से एक ओर महंगाई पर काबू पाया जा रहा है, तो दूसरी ओर वृद्धि भी बेहतर हो रही है. डिजिटलीकरण बैंकों की लागतों को कम कर रहा है. ऐसे में विकसित राष्ट्र के लक्ष्य की ओर ले जाने में रिजर्व बैंक की भूमिका महत्वपूर्ण होगी.
RBI monetary policy : अप्रैल माह के प्रथम सप्ताह में रिजर्व बैंक द्वारा घोषित मौद्रिक नीति में रेपो रेट और अन्य नीतिगत ब्याज दरों को समान और अपने रुख को तटस्थ रखते हुए, केंद्रीय बैंक ने संदेश दिया है कि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, आपूर्ति शृंखला में बाधाओं, अंतरराष्ट्रीय मार्ग अवरुद्ध होने और विश्व में उथल-पुथल के बावजूद भारत के नीति निर्माता देश के बुनियादी बातों के बारे में तो आश्वस्त हैं ही, देश में विकास के वातावरण को बनाये रखने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं.
हालांकि, मौद्रिक नीति घोषणा से पूर्व यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि 2025 के दौरान रेपो रेट में लगातार कमी का जो मार्ग अपनाया गया था, उसमें अवरोध आ सकता है और मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं के चलते रेपो रेट में वृद्धि हो सकती है अथवा कम से कम मौद्रिक नीति रुख को डाउनग्रेड कर उसे तटस्थ से उदार किया जा सकता है. पर उन आशंकाओं को निर्मूल सिद्ध करते हुए रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था का जो खाका देश के समक्ष प्रस्तुत किया है, वह बताता है कि वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है और उसके विकास के मार्ग को प्रशस्त रखते हुए रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर ही रखना एक उचित नीति है.
गौरतलब है कि मौद्रिक नीति में रेपो रेट को कम रखते हुए देश में निवेश, चिरस्थायी वस्तुओं और घरों की मांग को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, जिससे विकास का मार्ग प्रशस्त होता है. लेकिन रेपो रेट को घटाने की पहली शर्त यह होती है कि देश में मुद्रास्फीति कम हो. यदि मुद्रास्फीति अधिक हो अथवा भविष्य में मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं ज्यादा हों, तो रेपो रेट को घटाने से मुद्रास्फीति और बढ़ सकती है. इसलिए केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति अधिक होने की स्थिति में रेपो रेट घटाने का जोखिम नहीं ले सकता. मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान है कि यह 2026-27 में 4.5 से 4.6 प्रतिशत रह सकती है.
हालांकि, यह 2025-26 की मुद्रास्फीति 2.1 प्रतिशत से काफी अधिक है, फिर भी इसके मौद्रिक नीति समिति के लिए निर्धारित लक्ष्य दो से छह प्रतिशत के बीच ही रहने का अनुमान है. मौद्रिक नीति बनाते हुए इस बात का ध्यान रखना होगा कि यह मुद्रास्फीति की सीमा चार प्रतिशत, जमा-घटा दो प्रतिशत के बीच ही रहे. ऐसे में, जैसे ही इस सीमा के उल्लंघन होने का खतरा हो, रेपो रेट को बढ़ाना और मुद्रा के संकुचन के अन्य उपाय अपनाना आवश्यक हो जाता है. रिजर्व बैंक ने 2026-27 में विकास संभावनाओं को 6.2 प्रतिशत पर रखा है. गौरतलब है कि 2025-26 में जीडीपी वृद्धि 7.4 प्रतिशत रहने की उम्मीद है.
समझना होगा कि तरलता को आदर्श स्तर पर रखना भी उतना ही जरूरी है, जितना रेपो रेट को नीचे रखना, ताकि अल्पकाल में ब्याज दरें, रेपो रेट के आसपास बनी रहें. तरलता का प्रबंधन करने के लिए रिजर्व बैंक खुले बाजार की क्रियाओं, परिवर्तनशील रेपो रेट और परिवर्तनशील रिवर्स रेपो रेट जैसे उपायों की मदद लेता है. इन उपायों के माध्यम से रिजर्व बैंक सुनिश्चित करता है कि उपयुक्त तरलता (न कम न अधिक) बनी रहे, ताकि कॉल दर, खासतौर पर भारित औसत कॉल दर भी रेपो रेट से 0.10 से 0.15 से ज्यादा न होने पाये.
कॉल दर, वह ब्याज दर होती है, जिस पर बैंक अन्य बैंकों से अल्पकाल में उधार लेता है. रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति के माध्यम से विभिन्न प्रकार के लक्ष्य और उद्देश्यों को साधने का प्रयास करता है. उपयुक्त नीतिगत उपायों से भारतीय बैंक गैर निष्पादित परिसंपत्तियों की समस्या से लगभग निजात पा चुके हैं. मौद्रिक नीति के माध्यम से एक ओर महंगाई पर काबू पाया जा रहा है, तो दूसरी ओर वृद्धि भी बेहतर हो रही है. डिजिटलीकरण बैंकों की लागतों को कम कर रहा है. ऐसे में विकसित राष्ट्र के लक्ष्य की ओर ले जाने में रिजर्व बैंक की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की पूर्ति के लिए बैंकों को उधार का उपयुक्त प्रवाह भी सुनिश्चित करना होगा और उस उधार की अदायगी भी होती रहे, ऋणों को देय क्षमता की कसौटी पर कसना भी होगा. अप्रैल माह की मौद्रिक नीति विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोगी होगी, ऐसी आशा की जा सकती है.
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, रिजर्व बैंक नीतिगत उपायों और विदेशी मुद्रा बाजारों में सीधे हस्तक्षेप के सही तालमेल के जरिये, कम समय में चार प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट के बाद भी रुपये को काफी हद तक स्थिर रखने में सफल रहा है. इनमें सट्टेबाजी वाली गतिविधियों पर रोक भी शामिल है. अब रिजर्व बैंक के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि युद्धों और संघर्षों, वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में रुकावटों, और बाधित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों वाले वैश्विक परिदृश्य से विकास की संभावनाओं पर कोई बुरा असर न पड़े. एक मजबूत मौद्रिक नीति, जो स्थिरता के साथ विकास पर केंद्रित हो, ब्याज दरों में बढ़ोतरी को रोककर, विकास को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त तरलता उपलब्ध कराकर, मुद्रास्फीति की प्रवृत्तियों को नियंत्रण में रखकर, इस काम में अहम भूमिका निभायेगी. हालांकि, पर्याप्त ऋण प्रवाह सुनिश्चित करना, तरलता का प्रबंधन करना, मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना और विकास को गति देना भी रिजर्व बैंक के लिए एक बड़ी चुनौती होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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