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अफगानिस्तान पर तालिबान का साया

Updated at : 30 Aug 2021 7:56 AM (IST)
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अफगानिस्तान पर तालिबान का साया

तालिबान की जीत से पाकिस्तान और चीन उत्साहित हैं, लेकिन शायद वे इतिहास से कोई सबक लेना नहीं चाहते हैं. अफगानिस्तान वह देश है, जहां बड़ी-बड़ी ताकतों को मुंह की खानी पड़ी है.

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पूरी दुनिया की निगाहें अफगानिस्तान पर लगी थीं और तालिबान धीरे-धीरे पूरे देश पर कब्जा करता जा रहा था. उम्मीद थी कि अफगान सेना उन्हें कड़ी टक्कर देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह हार न सिर्फ अफगानिस्तान की, बल्कि अमेरिका की भी मानी जा रही है. अफगानिस्तान में अमेरिका 20 साल से जमा हुआ था और उसने जंग में अरबों डॉलर खर्च किये थे.

खबरों के अनुसार, अमेरिका ने अफगानिस्तान के सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 88 अरब डॉलर खर्च किये थे. अफगान सरकार के तीन लाख सैनिकों की तुलना में तालिबान के पास 80 हजार सैनिक थे, लेकिन फिर भी लड़ाई कुछ ही हफ्ते चल सकी. अफगानिस्तान प्रकरण पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि तालिबान का विरोध किये बिना काबुल का पतन होना अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी हार के रूप में दर्ज होगा.

अमेरिका ने यह जंग 11 सितंबर, 2001 को आतंकवादी हमलों के बाद शुरू की थी. ओसामा बिन लादेन ने अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता के साये में बैठ कर उन हमलों की साजिश रची थी, लेकिन हमले के बाद अमेरिकी नेतृत्व ने तालिबान को सत्ता से उखाड़ फेंका था, मगर अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से असमय वापसी ने तालिबान को वापस ला दिया है.

इसके पीछे की कहानी यह है कि पाकिस्तान ने वर्षों तक तालिबान को पाल-पोस कर रखा और वह इंतजार कर रहा था कि कब अमेरिका हटे और वह फिर तालिबान को जंग में उतार दे. इस दौरान वह अमेरिका और तालिबान के बीच मध्यस्थ की भूमिका में नजर आता रहा, लेकिन आप यदि तालिबान के चेहरे से नकाब उतारेंगे, तो उसके पीछे आपको पाकिस्तानी सेना का घिनौना चेहरा नजर आयेगा.

अमेरिका और पश्चिमी देश वर्षों से इनके गहरे नाते के बारे में जानते हैं, लेकिन वे फिर भी आंख मूंदे रहे. तालिबान के सारे नेता सपरिवार पाकिस्तान में ठाठ की जिंदगी जी रहे थे. जो अमेरिकी सहायता पाकिस्तानियों को मिल रही थी, उसका एक बड़ा हिस्सा तालिबान और अन्य कई आतंकवादी संगठनों को तैयार करने में इस्तेमाल किया जा रहा था.

आइएसआइ के पूर्व प्रमुख हामिद गुल जिहादी मानसिकता के थे. उन्होंने हमेशा तालिबान का समर्थन किया. वे लादेन के समर्थक भी थे और 9/11 के अमेरिकी हमलों को भी अमेरिकी साजिश ही मानते थे. उन्हें भारत का कट्टर दुश्मन माना जाता था. रिटायर होने के बाद एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि जब इतिहास लिखा जायेगा, तो उसमें जिक्र होगा कि पाकिस्तान ने अमेरिका को अमेरिका की ही मदद से अफगानिस्तान में हरा दिया.

हामिद गुल का यह वीडियो एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन अमेरिका इतने सबूतों के बावजूद अब तक पाकिस्तान के दुष्चक्र से अपने को अलग नहीं कर पाया है. जैसे ही मौका आया, पाकिस्तान ने तालिबान को अफगानिस्तान के मैदान में उतार दिया. पहले भी पाकिस्तान ऐसा कर चुका है, लेकिन अंतर यह है कि तब अमेरिका के कहने पर सोवियत संघ के खिलाफ उन्हें उतारा था.

जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था, उस दौरान अमेरिका चाहता था कि किसी भी तरह सोवियत संघ को मुंह की खानी पड़े. इसके लिए उसने तालिबान को तैयार करने की जिम्मा पाकिस्तान को सौंपा था. भारी संख्या में हथियार और बेहिसाब पैसा पाकिस्तान को उपलब्ध कराया गया.

इसका नुकसान भारत को भी उठाना पड़ा. पाकिस्तान ने इसका इस्तेमाल भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ाने में किया, लेकिन इस दौरान अमेरिका आंखें बंद किये रहा. पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने मजहबी नेताओं को प्रशिक्षण और हथियार देकर अफगानिस्तान में भेजना शुरू कर दिया. इन्हीं में पश्तून समुदाय का एक अनजान-सा नेता मुल्ला उमर भी था, जिसने सोवियत संघ की हार के बाद तालिबान की स्थापना की और अमेरिका के गले की फांस बन गया.

तालिबान की जीत से पाकिस्तान और चीन उत्साहित हैं, लेकिन शायद वे इतिहास से कोई सबक लेना नहीं चाहते हैं. अफगानिस्तान वह देश है, जहां बड़ी-बड़ी ताकतों को मुंह की खानी पड़ी है. अफगानिस्तान पर रूस का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था. इसे रोकने के लिए और अफगानिस्तान को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने के लिए अंग्रेजों ने 1839 से 1919 के बीच तीन बार अफगानिस्तान पर नियंत्रण की कोशिश की.

यह वह दौर था, जब कहा जाता था कि ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त नहीं होता था, लेकिन हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी. अंतिम युद्ध रावलपिंडी की संधि के साथ समाप्त हुआ, जिसके बाद अफगानिस्तान पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो गया था. कई वर्षों की शांति के बाद 1978 से अफगानिस्तान में युद्ध का नया दौर शुरू हुआ. सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर नियंत्रण की कोशिश की और भारी नुकसान के बाद उसे पीछे हटना पड़ा. उसके बाद से अफगानिस्तान लगातार संघर्ष के दौर से गुजर रहा है. इस सबका खामियाजा आम अफगानिस्तानी को उठाना पड़ रहा है. इस सब में पाकिस्तान की भूमिका हमेशा शर्मनाक रही है.

भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में अहम भूमिका निभायी है. अफगानिस्तान के संसद भवन का निर्माण भी भारत ने किया, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था सुचारू रूप से चले. मैं अफगानिस्तान के कई पत्रकारों को जानता हूं और मैंने बातचीत में पाया है कि आम अफगानी के दिल में भारतीयों के प्रति बहुत प्रेम है, लेकिन पाकिस्तान के हमसाया तालिबान के दिल में भारतीयों के प्रति उतनी ही नफरत है. अफगानिस्तान के बिगड़ते हालात ने भारत में चिंता जतायी है.

आपके पड़ोस में आतंकवादी अड्डा बने, यह किसी भी देश के लिए चिंता की बात है. पिछली तालिबानी सत्ता के दौरान एक भारतीय विमान का अपहरण कर कंधार ले जाया गया था और यात्रियों की जान बचाने के बदले कई आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा था. हाल में अफगानिस्तान को लेकर दिल्ली में सर्वदलीय बैठक हुई, जिसमें सभी दलों ने चिंता जाहिर की. सब जानते हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद का सबसे बड़ा अड्डा है.

आइएसआइ की मदद से जैशे मोहम्मद ने बहावलपुर में मुख्यालय बना रखा है और इसका मुखिया मसूद अजहर यहीं से आतंकी गतिविधियां संचालित करता है. सब जानते हैं कि 26 नवंबर, 2008 को लश्कर के आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला किया था. भारत द्वारा पुख्ता सबूत देने के बावजूद पाकिस्तान हमेशा इस हमले में अपनी भूमिका को खारिज करता आया है. हमें इन बातों को विस्मृत नहीं करना चाहिए.

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Ashutosh Chaturvedi

लेखक के बारे में

By Ashutosh Chaturvedi

मीडिया जगत में तीन दशकों से भी ज्यादा का अनुभव. भारत की हिंदी पत्रकारिता में अनुभवी और विशेषज्ञ पत्रकारों में गिनती. भारत ही नहीं विदेशों में भी काम करने का गहन अनु‌भव हासिल. मीडिया जगत के बड़े घरानों में प्रिंट के साथ इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का अनुभव. इंडिया टुडे, संडे ऑब्जर्वर के साथ काम किया. बीबीसी हिंदी के साथ ऑनलाइन पत्रकारिता की. अमर उजाला, नोएडा में कार्यकारी संपादक रहे. प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के साथ एक दर्जन देशों की विदेश यात्राएं भी की हैं. संप्रति एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सदस्य हैं.

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