एक कहावत है कि दुनिया से किसी बुजुर्ग का उठना असल में एक चलती-फिरती लाइब्रेरी का खत्म हो जाना है. खुशवंत सिंह के निधन की खबर सुन सबसे पहले यही कहावत याद आयी. जवाहरलाल नेहरू अबुल कलाम आजाद के दिमाग को विश्वकोषीय कहते थे और हमारे वक्त में यह बात खुशवंत सिंह पर फिट बैठती है. नये और आजाद भारत के विचार को उन्होंने अपनी आंखों के सामने आकार लेते देखा.
यह एकरंगे नहीं, बल्कि बहुरंगे भारत का विचार था, जिसे साकार करने के लिए वे अपनी लेखनी के सहारे संघर्षरत रहे. उनका जाना, बहुरंगे भारत के विचार के एक दमदार पैरोकार का जाना है. 99 की उम्र पूरा कर विदा हुए खुशवंत सिंह की कलम अखबार के पन्नों पर 70 वर्षो तक अनथक चली. उनकी अविराम लेखनी ने ऐसी आभा अख्तियार कर ली थी कि उसके शाश्वत होने का भ्रम होता था.
इसलिए, जब दो साल पहले एक अंगरेजी पत्रिका ने घोषणा की कि खुशवंत सिंह अब लिखना बंद कर रहे हैं, तो लाखों पाठकों को सहसा यकीन नहीं हुआ. बहरहाल, अपने लेखन में खुद को हमेशा ‘एक शरारती बुजुर्ग’ के रूप में दिखाने के लिए सजग रहनेवाले खुशवंत सिंह ने जब कलम रख देने की घोषणा की तब भी शायद ही कोई कह सका कि वैराग्य की इस वेला में उनका बांकपन चला गया. बांकपन चला गया होता तो खुशवंत सिंह यह न कहते कि लेखनी को विराम देने के बाद मुङो बहुत याद आयेंगे वे रुपये जो मिला करते थे और ‘वे लोग जो अपने बारे में लिखवाने के लिए मेरी चापलूसी किया करते थे.’
पावनता के बीच किसी तुच्छता की यह छौंक या कह लें एक खास किस्म का बांकपन ही उनके पत्रकारीय शब्द-संसार की जान था. छोड़ दें उनके साहित्यकार, इतिहासकार और अनुवादक के रूप को और केंद्रित करें सिर्फ उनके पत्रकारीय कर्म पर, तो दिखेगा कि उनकी ‘शरारत’ व्यवस्था के प्रति असंतोष से उपजी और उसके दोषों को दूर करने के भाव से प्रेरित थी. उन्होंने गुदगुदी देकर चिकोटी काटने की खास शैली विकसित की और अपने लेखन से बड़े-बड़ों को तिलमिलाने पर मजबूर किया. वे ऐसा कर पाये, क्योंकि वे पत्रकार को न तो समाज-सुधारक की भूमिका में देखने के हामी रहे, न ही किसी राजनीतिक पंथ के भक्त या गुरु के रूप में देखने के पैरोकार.