चढ़त चैत चित लागे न रामा..

Published at :19 Mar 2014 5:51 AM (IST)
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चढ़त चैत चित लागे न रामा..

चंचल सामाजिक कार्यकर्ता एक बात जान लो, इस चुनाव में बापू के हत्यारे नहीं जीतेंगे. जीतेंगी बापू की औलादें. उनमें कांग्रेस ही नहीं है, राहुल और सोनिया ही नहीं हैं, उनमें नीतीश, शिवानंद तिवारी, ममता बनर्जी और लालू भी हैं. फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ ऋतुराज वसंत विदा हो जाते हैं. […]

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चंचल

सामाजिक कार्यकर्ता

एक बात जान लो, इस चुनाव में बापू के हत्यारे नहीं जीतेंगे. जीतेंगी बापू की औलादें. उनमें कांग्रेस ही नहीं है, राहुल और सोनिया ही नहीं हैं, उनमें नीतीश, शिवानंद तिवारी, ममता बनर्जी और लालू भी हैं.

फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ ऋतुराज वसंत विदा हो जाते हैं. महीने भर उड़ा रंगों का गुबार थम जाता है. रंग बाज दफे प्रफुल्लित हो जाया करते हैं. इसमें से कविता, कहानी या यादें उगती हैं. ‘लोक’ इन्हें संजो कर रखता है. संगीत, नृत्य, कला में, रंग मंच पर ये बेबाक हस्ताक्षर बनते हैं. ओ सुनो सामुझ निगरुनिया गा रहा है- कोठवा पे ढुंढ़लीं, अटरिया पे ढूंढ़लीं, सेजिया पे ढूंढ़तै लजा गेली रामा.. मद्दू पत्रकार लोक पर थे, कि अचानक लाल्साहेब ने रोक लगा दी- का बात है गुरु! आज अल्सुबहै लगे लसियाने? मद्दू ने पाला बदला-लोक गायब हो रहा है.

पहले गांव-गांव होली के गीत होते रहे. अब सब खत्म. पुरानी पीढ़ी चूक रही है, नयी पीढ़ी सैकड़ों चैनल के सामने आंख खोलती है, तो इसे कचड़ा पसंद है. अब गांवों में डीजे बजने लगा है. अब तो रामायण भी डीजे की धुन पर चल रहा है. इन कमबख्तों को इत्ता भी पता नहीं है कि यह जो ‘साउंड पलूशन’ है सारे पलूशनो का बाप है.

लोडस्पीकर हमने पहली दफा सत्तावन के चुनाव में सुना रहा, जब राजा बाजार के राजा चंद्रभान सिंह जनसंघ से लड़ रहे थे और चुनाव चिह्न् रहा ‘दीया’. उनके प्रचार में ढेला तेवारी एक्का पे गाना गा के प्रचार करते रहे हूबहू फोनूगिलाफी. ‘साझे-बूझे कैसे हरवा हम चाई सजनी’ और हार गये. उमर दरजी ने पूछा- साझे-बूझे..इ का है भाई. चिखुरी ने तरेर कर देखा. का जानोगे साझे-बूझे? जब से तुम जवान हुए हो सब मटियामत हो गया है. जमाना रहा जब उसूलों पे चुनाव होता रहा.

मुद्दों पर चरचा चलती रही. तब न जाति चलती थी न मजहब. हर दल के पास अपने सपने होते रहे. आज कमबख्त चेहरा दिखा कर ओट मांग रहे हैं! नवल ने दूसरी तरफ मुंह करके चुटकी ली- उसूल कैसा होता है, तुम देखे हो काका? नवल ने कयूम को छेड़ा. चिखुरी मुस्कुरा के रह गये. कयूम कब चुप रहनेवाले- नारियल देखे हो बच्चू? उसी माफिक होता है. एक जोर का ठहाका लगा और चौराहा गुलजार हो गया. लाल्साहेब की चाय की भट्ठी लपक उठी. ‘एक बरगद वाले रहे, दद्दा! याद है? तवा कड़ाही सस्ती हो, दवा पढ़ाई मुफ्ती हो / जो जमीन को जोते बोये, वही जमीन का मालिक है.. हम भी उसी बरगद के साथ रहे.

डाक्टर लोहिया का फरमान रेल का डब्बा एक समान..कयूम बोलते रहे, चिखुरी गुम होते रहे. बाकी जनता बुड़बक की तरह कयूम को निहारती रही. कीन ने सवाल पूछा- यह बरगद का है भाई? लाल्साहेब झल्ला गये- अरे सरवा! कुछ त काम क जानकारी रखा कर. बरगद समाजवादी पार्टी वाले बोले जाते रहे. आज जो सायकिल वाले हैं?

चिखुरी बोले- सुन नवल. इस मुल्क का तो बस एक ही नेता रहा. बापू. देश के गांव-गांव तक कांग्रेस को पहुंचाया. फकीर रहा. बांस का एक डंडा लेकर निकला और सारी दुनिया से बरतानी हुकूमत को गायब कर दिया. न हथियार उठाया, न माना. आम जनता के हाथ में सिविल नाफरमानी का हथियार देकर उसे खड़ा होना सिखाया. आज दुनिया को रोशनी दे रहा है.. और जो समज्बादी रहे? चिखुरी की आंख दूर अनंत तक खो गयी. यानी अब कोइ गंभीर बात निकलेगी..

चिखुरी शुरू हुए-समाजवादी सब गांधी की औलादे हैं. वे कांग्रेस से अलग हुए थे कुछ मुद्दों को लेकर. इनका कांग्रेस से मतभेद था, मन भेद नहीं. जब-जब कांग्रेस सत्तामद में आकर अधिनायकवाद की ओर चली है, समाजवादियों ने उसे रोका है. सत्ता में कांग्रेस की मनमानी पर डॉ लोहिया ने नकेल लगायी और गैरकांग्रेसवाद का नारा दिया. 67 में सात सूबों में कांग्रेस भसक गयी. 69 में इंदिरा गांधी ने समाजवादियों की सारी मांगे मान ली और उसको स्वीकार कर लिया. 1954 में कांग्रेस को जेपी ने एक चिट्ठी लिखी थी. चौदह सूत्री चिट्ठी के नाम से प्रसिद्ध है. जमीन का बटवारा, प्रिवीपर्स की समाप्ति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण आदि. कांग्रेस जी गयी. 75 तक आते-आते फिर कांग्रेस डगमगायी. आपातकाल लगा. 77 में चुनाव हुआ. कांग्रेस हारी. उधर जनता पार्टी सरकार बना रही है, इधर इंदिरा गांधी के घर पर जेपी और इंदिरा दोनों एक-दूसरे को पकड़ कर रो रहे हैं. जेपी ने कहा था-सब ठीक हो जायेगा..

एक बात जान लो, इस चुनाव में बापू के हत्यारे नहीं जीतेंगे. जीतेंगी बापू की औलादें. उनमें कांग्रेस ही नहीं है, राहुल और सोनिया ही नहीं हैं, उनमें नीतीश, शिवानंद, ममता, लालू भी हैं. मद्दू ने पूछा यह बात कुछ जम नहीं रही? चिखुरी ने कहा- तुम लोग चेहरा देखने के आदी हो चुके हो, विचार तो देखो. जिस दिन बापू का विचार मरेगा उस दिन भारत मर जायेगा. नवल उपाधिया ने सायकिल उठा ली- कयूम ने पूछा कहां चले? हम्मे अभी नहीं मरना है. आज से चैत लग गया है.. बाबा के भवनवा, चढ़त चैत चित लागे न रामा, बाबा के भवनवा. बीर बभनवा सगुनवा विचारो, कब होइहें सैंया से मिलनवा हो रामा.. बाबा के भवनवा..

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