ठंडई में क्या घोल दिया था पंडित!

Published at :15 Mar 2014 3:53 AM (IST)
विज्ञापन
ठंडई में क्या घोल दिया था पंडित!

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।। (वरिष्ठ साहित्यकार) पलाशवन की केसरिया पगडंडियों और सरसों के पीले खेतों की मेड़ों से चल कर होली गांव-नगर के दरवाजे तक आ ही गयी. लोगों का क्या कहें? जैसे अपना घर काट खा रहा हो; पर्व-त्योहार के दिन भी नकली संत समागमों और खिचड़ी कवि सम्मेलनों की तरफ दौड़ते हैं. उन्हें […]

विज्ञापन

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।

(वरिष्ठ साहित्यकार)

पलाशवन की केसरिया पगडंडियों और सरसों के पीले खेतों की मेड़ों से चल कर होली गांव-नगर के दरवाजे तक आ ही गयी. लोगों का क्या कहें? जैसे अपना घर काट खा रहा हो; पर्व-त्योहार के दिन भी नकली संत समागमों और खिचड़ी कवि सम्मेलनों की तरफ दौड़ते हैं. उन्हें ये पंक्तियां सुना दूं- देखा सारे तीरथ करके, सबसे पावन अपना घर है. जिनका मन अपने घर में नहीं लगता, उनको दुनिया के किसी आश्रम में शांति नहीं मिलेगी. इस फगुनहट में जिसे अपने परिवार के लोगों और मित्रों के साथ हंसी-मजाक कर खुशी नहीं मिलेगी, उसे शराब की बोतलों, पाइरेटेड कवियों के लतीफों और टीवी चैनलों के ऊल-जलूल प्रोग्रामों से क्या रस मिलेगा? मोको कहां ढूंढ़त बंदे, मैं तो तेरे पास में. जो मुक्तिबोध भगवान शिव की बूटी छान कर होता है, वह अंगूर की बेटी में कहां! उस भितरिया मस्ती को बनारसी या मैथिल लोग ही समझते हैं. बनारस के बेनजीर शायर ‘नजीर बनारसी’ फरमाते हैं:

ठंडई में क्या घोल दिया था पंडित।

हम रात भर उड़ते रहे नभमंडल में।।

लेकिन लोग हैं कि अपने सिल-बट्टे पर की भांग छोड़ कर घंटे भर से शराब की दूकानों पर लाइन लगाये हैं, जैसे गरीब बस्ती में राशन की दूकान खुली हो. वैसे, ये लोग मन से तो गरीब होते ही हैं. पुराने रईस जीवन का आनंद लेना जानते थे, इसलिए वे कविता और कला के पारखी भी होते थे. होली के मौके पर उनके दरवाजे पर फाग के रंग शब्दों और स्वरों में ढल कर उतरते थे. समय बदल गया है, जीवन की गुणवत्ता भी निम्नतम स्तर पर पहुंच गयी है, इसलिए ये सब नजारे देखने को मिलते हैं. इस समय मौज उन हास्य कवियों की है, जो लतीफों को कविता के नाम पर पेश करने की कलाकारी जानते हैं. सो लगे रहो मुन्ना भाइयों! वैसे, यह नयी पीढ़ी बहुत समझदार है. वह कविता के नाम पर या तो लतीफे बुनती है या लंगड़ई कविता लिखती है. एक पैसा कमाने का रैपिड कोर्स है, तो दूसरा रातोंरात कवि बन जाने का. वह कविता को साधने के लिए लंबी तपस्या में वक्त जाया नहीं करती. बाजारवाद के इस दौर में गली-गली में इन्हीं दो नस्लों के कवि पाये जाते हैं. नये गीतकार तो अति दुर्लभ लुप्तप्राय प्राणियों में गिने जाते हैं.

कुछ ऐसे कलमजीवी भी हैं, जिनकी होली पत्र-पत्रिकाओं में एक-दो रचनाएं छप जाने से ही मन जाती है. इसके लिए वे दीवाली के बाद से ही लग जाते हैं. उनका लेख ‘सखि वसंत आया’ से प्रस्थान कर, गीतों के गांव के बगल से गुजर कर, सीधे बेसुरे लोगों के टोले में पहुंच जाता है, क्योंकि वहां प्रगतिशीलता की भांग की पकौड़ी छनती है. वे दया के पात्र जीव अल्पप्राण पत्रिकाओं में छपी अपनी रचनाओं को फेसबुक पर डाल कर उसे मित्रों के ‘लाइक’ से महाप्राण बनने की कोशिश करते हैं. आजकल ‘मुख्यधारा’ की तमाम लंगड़ी कविताएं जबर्दस्ती ठूंस कर बकरी के ‘गोबर’ से आंगन लीपा जाता है. जिन प्रगतिशीलों के लिए होली सांप्रदायिक या सामंतवादी उत्सव है, वे रंग-अबीर और गुङिाया-मालपुआ से विरक्त होकर किसी चंडूखाने में मदिरा-पूरित वाणी में अंतरराष्ट्रीय मसलों पर बहस करते मिलेंगे.

होली उन सबकी है, जो मुक्तभाव से रंग-अबीर एक दूसरे को लगाते हैं और जिस-किसी के दरवाजे पर बैठ कर ढोल पर गा उठते हैं, सदा आनंदा रहे ओही द्वारे, मोहन खेले होरी हो.. खेद है कि बचपन में होली के ये गीत जहां अपने अग्रजों से हमने सुने थे, वहां भी अब लोकगायकों के अभाव में लाउडस्पीकरों पर ‘चिपका ले फेवीकोल से’ जैसे फिल्मी गाने ही सुनने को मिलते हैं. भोजपुरी गानों ने तो और भी हद कर दी है.

होली का नाम लेते ही बनारस की होली मेरे सर पर चढ़ क र बोलने लगती है. याद आती हैं, नजीर साहब की ये काव्य पंक्तियां:

पवन के पांव में यह किसने डाल दी पायल/ हरेक झोंके में घुंघरू छनक रहे हैं आज/ शरारतों पे तुली हैं हवाएं फागुन की/ संभालने पे भी आंचल सरक रहे हैं आज..

ये है होली का असली मिजाज, जिसे बनारसी कवि ही भीतर तक महसूस कर सकता है. कहते हैं- भर फागुन बाबा देवर लागे. मुङो नहीं मालूम कि कलकत्ता के बरहम बाबा उर्फ पं कृष्ण बिहारी मिश्र ‘बेहया के जंगल’ में पद्मासन मार कर बनारस के किस आचार्य से ‘नेह के नाते अनेक’ निवेदित कर रहे हैं. दूसरे बाबा दादा छबिनाथ मिश्र वैदिक ऋषिका सूर्या सावित्री के साथ बैठ कर बसंती मुद्रा में ‘सुकिंशुकं शल्मलि विश्वरूपम्’ के अनुवाद के बहाने कविताई करते पकड़े गये हैं.

हमारे साथ दिक्कत यह है कि हमारे समय की युवा कवयित्रियां अब दादी-नानी हो गयी हैं और वे फागुन को उसी उच्चपद से हांक रही हैं. मसलन, कभी कोसी नदी की प्रबल धार की तरह तेजस्विनी शांति सुमन जबसे मुजफ्फरपुर छोड़ कर जमशेदपुर अपने सुपुत्र के पास रहने लगी हैं, तबसे उनका फागुन भी ‘वरिष्ठ नागरिक’ की श्रेणी में आ गया है:

हंसती है तो घर को/ फागुन फागुन करती है/ यशी नाम की हंसी/ अहर्निश गुनगुन करती है..

मगर टाटानगर के ही अन्य कवि दिनेश्वर प्रसाद सिंह ‘दिनेश’ कुछ-कुछ ‘महंगी के मारे मोरा बिरहा बिसरिगा’ के अंदाज में आहें भरते हैं:

महंगाई की नदिया, कागज की नाव।

डूब रहे नगर सभी, डूब रहे गांव।।

इस दुख का अनुभव एक दूसरा कवि भी करता है, जब उसे लगता है कि सही जगहों पर गलत लोग बैठाये गये हैं:

बंसबिट्टी में कोयल बोले, महुआ गाछ महोखा।

आया कहां वसंत इधर है, तुम्हें हुआ है धोखा।।

मौसम आने पर कोयल बोलेगी ही. वैसे, कोकिल राशि के जीवों को नौकरी करनी भी नहीं चाहिए-निषिध चाकरी भीख निदान. और जब चाकरी नहीं करेंगे, तो भिक्षाटन पर जीना ही पड़ेगा- बाभन के धन केवल भिच्छा. मगर यह आभासी लोकतंत्र है; इसमें कुर्सी पर आसीन गधे पूजे जाते हैं और वक्त के मारे उदयनाचार्य बीपीएल कार्ड की लाइन में खड़े दिखायी देते हैं. रामकृष्ण परमहंस कहते हैं-जैसी दृष्टि, तैसी सृष्टि. सो हम अभी अपनी दृष्टि वैचारिक कंटीली झाड़ियों से हटा कर पगडंडी की दोनों ओर खिले उन तमाम रंग-बिरंगे फूलों की ओर करते हैं, जिनका खिलना प्रकृति के सोलहो श्रृंगार का द्योतक है:

राजा की अगवानी है/ मामूली बात नहीं/ वे भी पौधे फूले दम भर/ जिनकी जात नहीं// चार दिनों का सिंहासन भी/ बड़ा नशीला है/ बांट रहे सबको अशर्फियां/ बड़े गरीबनवाज..

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola