चुनावी माहौल में शेयर बाजार का उत्साह

Published at :13 Mar 2014 5:57 AM (IST)
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चुनावी माहौल में शेयर बाजार का उत्साह

।। राजीव रंजन झा।। (संपादक, शेयर मंथन) सेंसेक्स ने इस हफ्ते पहली बार 22,000 के ऊपर जाकर नया रिकॉर्ड बनाया है. निफ्टी भी 6,500 के ऊपर नये रिकॉर्ड स्तर पर दिख रहा है. सिर्फ महीने भर पहले यानी फरवरी के पहले हफ्ते में बाजार फिसलता दिख रहा था और सेंसेक्स 20,000 के नीचे चला गया […]

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।। राजीव रंजन झा।।

(संपादक, शेयर मंथन)

सेंसेक्स ने इस हफ्ते पहली बार 22,000 के ऊपर जाकर नया रिकॉर्ड बनाया है. निफ्टी भी 6,500 के ऊपर नये रिकॉर्ड स्तर पर दिख रहा है. सिर्फ महीने भर पहले यानी फरवरी के पहले हफ्ते में बाजार फिसलता दिख रहा था और सेंसेक्स 20,000 के नीचे चला गया था. तो फिर इन चंद हफ्तों में ऐसा क्या हुआ, जिससे बाजार ने 10 प्रतिशत से ज्यादा की छलांग लगा ली? दरअसल, इस दौरान लगभग हर चुनाव-पूर्व जनमत सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा और इसके सहयोगी दलों का गंठबंधन बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों के आंकड़े के करीब पहुंच रहा है.

कांग्रेस को 2009 में जितनी सीटें मिलने पर बाजार में ऊपरी सर्किट लग गया था, उससे कहीं ज्यादा सीटें इस बार भाजपा को मिलने की उम्मीदें बनने लगी हैं. इसलिए बाजार इन उम्मीदों को पहले से ही भुनाने में लग गया है. वह चुनावी नतीजों की औपचारिक घोषणा तक इंतजार नहीं करना चाहता. महीने-दो महीने पहले तक स्थिति इतनी साफ नहीं थी. तसवीर बदलनी शुरू हुई थी दिसंबर, 2013 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद. पांच राज्यों में से चार में भाजपा को बढ़त मिली थी, भले ही वह दिल्ली में बहुमत से पीछे रह गयी. इसके बाद भी बाजार में उछाल आया था, जिसमें निफ्टी उस समय तक के ऐतिहासिक शिखर 6,357 को पार करके 6,415 का नया रिकॉर्ड स्तर छू सका था.

जनवरी, 2014 के अंत तक भी स्थिति बहुत नहीं बदली थी. लोकसभा के लिए चुनाव प्रचार अभियान शुरू होने के बाद भी जनमत सर्वेक्षण वही निष्कर्ष दे रहे थे. इसीलिए फरवरी, 2014 के निवेश मंथन में मैंने लिखा था कि ‘अब यह तो स्पष्ट है कि कांग्रेस अपनी अब तक न्यूनतम संख्या की ओर बढ़ रही है, पर क्या भाजपा अपनी अधिकतम संख्या की ओर बढ़ पायेगी? यह आज भी एक बड़ा प्रश्न है.’

लेकिन अब एक तरफ तो भाजपा के लिए हर नये जनमत सर्वेक्षण में सीटों के अनुमान पहले से कुछ बढ़े हुए दिखने लगे हैं, दूसरी ओर कांग्रेस और यूपीए को मिलनेवाले सीटों की संख्या का अनुमान लगातार घटता दिख रहा है. सीएसडीएस ने जुलाई, 2013 के सर्वेक्षण में कहा था कि भाजपा को 161 सीटें मिल सकती हैं. यह अनुमान अक्तूबर, 2013 में बढ़ कर 191 पर और जनवरी, 2014 में 201 पर पहुंच गया. उसके सबसे ताजा सर्वेक्षण में भाजपा को तकरीबन 213 सीटें मिलना बताया गया है. इसी तरह नीलसन ने जनवरी, 2014 में भाजपा को 210 सीटें मिलने का आकलन किया था. फरवरी, 2014 के सर्वेक्षण में यह संख्या बढ़ कर 217 हो गयी. पिछले साल से ही सी-वोटर के सर्वेक्षणों के आकलन भाजपा के लिए सबसे ज्यादा संकोची रहे हैं. लेकिन इनमें भी हर बार भाजपा की संख्या बढ़ती गयी है. इसने जुलाई, 2013 में भाजपा को 131 सीटों का अनुमान जताया था. अक्तूबर, 2013 में यह अनुमान 162 का और जनवरी, 2014 में 188 सीटों का हो गया. फरवरी, 2014 में इसका अनुमान भी 202 हो गया. इन सर्वेक्षणों के अनुमान किस हद तक सही होंगे, कौन सबसे सटीक साबित होगा, यह कहना आसान नहीं है, लेकिन इन सबका एक संदेश बड़ा स्पष्ट है. भाजपा अपनी जमीन लगातार पुख्ता करती जा रही है. साथ ही संदेहों को पीछे छोड़ते हुए एनडीए का कुनबा भी फैल रहा है. 2002 के गुजरात दंगों के बाद सबसे पहले एनडीए छोड़नेवाले राम विलास पासवान वापसी करने में भी सर्वप्रथम हो गये. उनकी वापसी से एनडीए को सीटों की संख्या के मामले में भले ही बहुत फायदा न हो, लेकिन उनके लौटने का सांकेतिक महत्व है और भाजपा उसे भुनाने में भी लग गयी है. इसी स्थिति को बाजार भी भुना रहा है.

अगर हम विकास दर (जीडीपी) के ताजा आंकड़ों और भविष्य के अनुमानों को देखें, तो ऐसा नहीं लगता कि अर्थव्यवस्था की स्थिति में कोई बड़ा सुधार आया है या तुरंत आने की कोई उम्मीद है. लेकिन अर्थव्यवस्था से जुड़ी कई बातों पर बाजार ने राहत महसूस की है. वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भले ही आंकड़ों की बाजीगरी का सहारा लिया हो, लेकिन सरकारी घाटा (फिस्कल डेफिसिट) और चालू खाते का घाटा (सीएडी) नियंत्रण में रहने से बाजार कुछ आश्वस्त हुआ है. डॉलर के मुकाबले रुपये में स्थिरता लौटी है, जिसके पीछे यह मुख्य कारण है. रुपये की स्थिरता से शेयर बाजार पर भी सकारात्मक असर पड़ा है. साथ ही, अंतरिम बजट के बाद से ही विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआइआइ) ने लगातार खरीदारी का रुझान अपनाया है, जबकि इससे पहले फरवरी महीने में वे अकसर बिकवाली कर रहे थे.

साल 2013-14 की तीसरी तिमाही के नतीजों ने भी बाजार का हौसला बढ़ाया है. ज्यादातर कंपनियों के नतीजे बाजार के अनुमानों के मुताबिक या कुछ बेहतर रहे हैं. नकारात्मक ढंग से चौंकानेवाली कंपनियों की संख्या कम हो रही है. इसी के चलते ब्रोकिंग फर्मो ने कंपनियों के संभावित इपीएस अनुमानों में वृद्धि की है. सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मुनाफा बढ़ने की रफ्तार पिछली सात तिमाहियों में से सबसे अच्छी रही है. मोतीलाल ओसवाल सिक्योरिटीज (एमओएसएल) ने इन तिमाही नतीजों की समीक्षा रिपोर्ट में बताया है कि तीसरी तिमाही में समीक्षा में शामिल कंपनियों का कुल मुनाफा साल-दर-साल 13.3 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि नतीजों से पहले अनुमान था कि यह वृद्धि 10 प्रतिशत होगी.

सेंसेक्स कंपनियों का तिमाही मुनाफा साल-दर-साल 20 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि यह दर 2013-14 की पहली तिमाही में -4 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 11 प्रतिशत थी. आइसीआइसीआइ सिक्योरिटीज ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि सेंसेक्स की 30 में से 24 कंपनियों (बैंक, एनबीएफसी और सेसा स्टरलाइट को छोड़ कर) का मुनाफा अक्तूबर-दिसंबर, 2013 के दौरान पिछले साल की समान अवधि से 28.3 प्रतिशत ज्यादा रहा है. अगर ठीक पिछली तिमाही, यानी 2013-14 की दूसरी तिमाही से तुलना करें तो सेंसेक्स कंपनियों का इस बार का मुनाफा 14.4 प्रतिशत ज्यादा है. केवल एक तिमाही के दौरान ही एमओएसएल ने अपने इपीएस अनुमानों को दूसरी बार बढ़ाया है. अब इसका कहना है कि 2014-15 में सेंसेक्स इपीएस 1,542 रुपये रहेगी, जो 2013-14 में अनुमानित 1,326 रुपये की इपीएस से 16 प्रतिशत ज्यादा होगी. इसके अगले साल 2015-16 के सेंसेक्स इपीएस अनुमान को भी 1.5 प्रतिशत बढ़ा कर 1,792 रुपये कर दिया गया है, जो 2014-15 से 16.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाता है.

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