क्यों नेपाल जाने का मन बना रहे मनमोहन!

Published at :12 Mar 2014 2:17 AM (IST)
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क्यों नेपाल जाने का मन बना रहे मनमोहन!

।। पुष्परंजन।। (ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक) अब तक सबने यही समझ लिया था कि 3 मार्च, 2014 को म्यांमार में ‘बिम्सटेक’ शिखर बैठक में शामिल होकर मनमोहन सिंह ने अपनी अंतिम कूटनीतिक यात्रा का समापन कर लिया है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत जल्द नेपाल जायेंगे. ऐसा संकेत भारतीय विदेश […]

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।। पुष्परंजन।।

(ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक)

अब तक सबने यही समझ लिया था कि 3 मार्च, 2014 को म्यांमार में ‘बिम्सटेक’ शिखर बैठक में शामिल होकर मनमोहन सिंह ने अपनी अंतिम कूटनीतिक यात्रा का समापन कर लिया है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत जल्द नेपाल जायेंगे. ऐसा संकेत भारतीय विदेश मंत्रालय ने दिया है और इसकी पुष्टि काठमांडो में हो रही तैयारी से होती है.

नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने लाजिमपाट में माओवादी नेता ‘प्रचंड’ के निवास पर सोमवार को बैठक की. यह 17 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की आधिकारिक नेपाल यात्रा होगी. 1997 में इंद्र कुमार गुजराल नेपाल की यात्रा पर गये थे. 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी काठमांडो गये भी, तो वह दक्षेस की शिखर बैठक थी. भारतीय प्रधानमंत्री ऐसे समय नेपाल यात्रा पर जायेंगे, जब नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला टनकपुर पर दिये बयान के कारण विवाद में फंसे हुए हैं. पिछले हफ्ते सुशील कोइराला ने बयान दिया था कि टनकपुर नदी और उस पर बना बांध भारत का हिस्सा है. नेपाल के प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर गठबंधन में शामिल नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ‘एमाले’ (नेकपा-एमाले) और प्रतिक्रियावादियों ने बवाल काट दिया है.

टनकपुर समझौते के कारण 1993 में नेपाल के ताकतवर प्रधानमंत्री कहे जानेवाले गिरिजा प्रसाद कोइराला को पद से इस्तीफा देना पड़ा था. पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्री रहते दिसंबर, 1991 में गिरिजा प्रसाद कोइराला नयी दिल्ली आये, और महाकाली नदी पर शारदा बांध, टनकपुर बांध और पंचेश्वर परियोजना पर समझौता किया. इसे ‘महाकाली संधि’ के नाम से भी जानते हैं. उत्तराखंड के चंपावत जिले का हिस्सा टनकपुर में सिंचाई और बिजली के लिए बांध और जल विद्युत परियोजना भारत-नेपाल के सहकार से आरंभ हुई, जिसके लिए नेपाल ने 2.9 हेक्टेयर (577 वर्ग मीटर) जमीन उपलब्ध करायी थी. उस समय नेकपा-एमाले विपक्ष में थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला पर सर्वोच्च अदालत तक का दबाव बन गया कि महाकाली संधि को संसद में दो-तिहाई मतों से पास कराएं. 1993 में गिरिजा प्रसाद कोइराला सरकार इसी बात पर गिर गयी. 20 सितंबर, 1996 को नेपाली कांग्रेस के प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा के दौर में दो-तिहाई बहुमत से महाकाली समग्र विकास परियोजना (जिसमें टनकपुर जल विद्युत परियोजना भी शामिल था) का प्रस्ताव पास हो गया और इस विवाद को लोग समय के साथ भूल भी गये. टनकपुर के भारतीय हिस्से में बहनेवाली नदी शारदा है, और नेपाल वाले हिस्से में इसी नदी को महाकाली कहते हैं. शारदा नदी पर 120 मेगावाट की ‘टनकपुर जल विद्युत परियोजना’ एनएचपीसी की देखरेख में चल रही है.

वक्त ने करवट बदला, 21 साल पहले जो नेकपा-एमाले, टनकपुर परियोजना के बहाने नेपाली कांग्रेस सरकार पर हमले कर रही थी, वही एमाले अब गंठबंधन सरकार में है. लेकिन नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने जैसे ही कहा कि टनकपुर भारत का हिस्सा है, उनके गंठबंधन पार्टनर बयानों के पक्षेपास्त्र चलाने लगे. प्रधानमंत्री कोइराला के इस बयान पर एमाले नेता वामदेव गौतम तक ने गुस्सा जाहिर किया. सीपीएन-माओवादी नेता मोहन वैद्य किरण ने तो बाकायदा एक परचा जारी कर प्रधानमंत्री से माफी मांगने को कहा. सवाल यह है कि प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को टनकपुर के गड़े मुर्दे को फिर से उखाड़ने की जरूरत क्यों पड़ी? वह भी उस समय जब भारतीय प्रधानमंत्री के लिए नेपाल में पलक-पांवड़े बिछाये जा रहे हैं. सुशील कोइराला यदि यह मानते हैं कि टनकपुर वाले बयान से मनमोहन सिंह खुश हो जायेंगे, तो यह उनकी गलतफहमी है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कदाचित नहीं चाहेंगे कि नेपाल में वह कदम रखें और टनकपुर को लेकर उनके खिलाफ कोई पोस्टरबाजी हो.

पिछले सप्ताह म्यांमार के बिम्सटेक शिखर बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके समकक्ष सुशील कोइराला की मुलाकात के बाद यह मान लिया गया था कि नेपाली प्रधानमंत्री अब भारत नहीं आ रहे हैं. यों, तब भी भारतीय विदेश मंत्रलय की ओर से इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गयी कि म्यांमार बिम्सटेक शिखर बैठक में मनमोहन सिंह अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल की आखिरी यात्र कर रहे हैं. लेकिन कूटनीतिक हलकों में यह मान लिया गया था कि मनमोहन सिंह अब विदेश यात्र पर नहीं जायेंगे. इससे संबंधित खबरें भी छपीं, जिसका खंडन विदेश मंत्रलय ने नहीं किया था. फिर ऐसी क्या बात हुई कि अब मनमोहन सिंह नेपाल यात्र के लिए हामी भर रहे हैं?

अब तक प्यासा कुएं के पास जाता था, लेकिन इस बार कुआं ही प्यासे के पास जा रहा है. यह रवायत रही है कि नेपाल में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद शासनाध्यक्ष नयी दिल्ली का रुख करते थे, लेकिन इस बार प्रधानमंत्री बनने के बाद सुशील कोइराला पर दबाव था कि वह भारत नहीं, चीन की आधिकारिक यात्र पर जायें. सवा चार साल पहले, दिसंबर, 2009 में एमाले नेता माधव कुमार नेपाल प्रधानमंत्री बनने के बाद आधिकारिक रूप से चीन की यात्र पर गये थे- यह अवसर उनके बाद बने प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल और बाबुराम भट्टराई को भी नहीं मिला. इस साल जून में होनेवाले कुनमिंग ‘एक्सपो’ में चीन ने नेपाल को ‘थीम कंट्री’ (प्रसंग देश) के रूप में प्रस्तुत किया है. कुनमिंग ‘एक्सपो’ में हर वर्ष दक्षिण एशियाइ देशों और चीन के सहकार से व्यापार मेला लगता है. कुनमिंग ‘एक्सपो’ में चूंकि नेपाल ‘थीम कंट्री’ है, इसलिए उसके उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को आमंत्रित करने की योजना बना ली गयी है, जिसके लिए यूनान के गवर्नर नेपाल आयेंगे. तीन महीने के बाद चीन कोई खेल करे, उसके काट की तैयारी नयी दिल्ली में चल रही थी.

इतना ही नहीं, बीते कुछ वर्षो से चीन नेपाल में बड़ी तेजी से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) कर रहा है और इसमें भारतीय कंपनियां पीछे छूट रही हैं. पिछले वित्त वर्ष में नेपाल ने 97 चीनी कंपनियों को एफडीआइ की अनुमति दी, जबकि भारत की मात्र 41 कंपनियों को ही यह अनुमति मिली. अब तक 575 चीनी कंपनियों का पदार्पण नेपाल में हो चुका है. ऐसा माना जा रहा है कि चीन के इस व्यूह को भेदने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नेपाल जाने का मन बना लिया है.

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